उत्तर प्रदेश चुनावी नतीजों के बाद इतिहास के पन्नो से तहज़ीब ए अवध ।

भारत के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के बाद दो राज्यों पर विशेष ध्यान दिया गया। पंजाब और उत्तर प्रदेश के नतीजों ने जमीनी स्तर पर विश्लेषण करने वालो के सभी अनुमान गलत साबित कर दिए।

बेशक नतायेज के बाद कितने भी विवाद और आरोप लग रहे हो लेकिन हकीकत तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी। कभी अवध का क्षेत्र और अवध की दारुल हकुमत रहा लखनऊ अपनी शान ओ शौकत और तहजीब के लिए जाना जाता था, उसकी एक झलक मोहतरमा नुसरत साहिबा के शब्दो में। 

'मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं

    *लखनऊ के तब के चुनाव और तहज़ीब* 

*लखनऊ में पहले~पहल म्युनिसिपल कारपोरेशन के चुनाव हुए। चौक से अपने समय चौक की मशहूर तवायफ़ और महफ़िलों की शान दिलरुबा जान जब उम्मीदवार बनीं*। 

 *उनके खिलाफ कोई चुनाव लड़ने को तैय्यार नहीं हुआ। उन दिनों एक मशहूर हकीम साहेब थे ~ हकीम शम्शुद्दीन साहब। चौक में उनका दवाखाना था और अपने ज़माने के मशहूर हकीम थे। बहुत प्रसिद्धि थी उनकी। दोस्तों ने ज़बरदस्ती उनको चुनाव में दिलरुबा जान के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया*। 

*दिलरुबा जान का प्रचार ज़ोर पकड़ा। रीज़ चौक में महफ़िलें लगने लगी। अपने जमाने की मशहूर नर्तकियों जैसे जद्दन बाई के प्रोग्राम होने लगे और महफ़िलें खचा ख़च भरी रहती थीं। वहीं हकीम साहेब के साथ बस वो चंद दोस्त थे जिन्होंने उनको इलेक्शन में झोंका था*। 

   *अब हकीम साहेब नाराज़ हुए की तुम लोगों ने पिटवा दिया मुझे। मेरी हार तय है। मगर दोस्तों ने हार नहीं मनी और एक नारा आम कर दिया* :

      *है हिदायत चौक के हर वोटरे शौक़ीन को*

    * दीजिए दिल, दिलरुबा को, वोट शम्शुद्दीन को*

     *इसके जवाब में दिलरुबा जान ने नारा दिया* :~

     *"है हिदायत चौक के हर वोटरे शौकीन को*।

    *वोट तो दें दिलरुबा को, नब्ज़ शम्शुद्दीन को"*

तब का लखनऊ एक तरफ जहां फ़नकारों की इज़्ज़त भी करता था वहीं जम्हूरियत के लिये मुनासिब लियाक़त की पहचान भी रखता था।

   *कहना ना होगा वही हुआ जो मुनासिब था हकीम साहेब का नारा कामयाब हो गया और वो इलेक्शन जीत गए*। 

 *लखनऊ की शानदार तहज़ीब के मुताबिक़ दिलरुबा जान ने हकीम साहेब को घर आकर बधाई देते हुए कहाः~* 

 *मैं इलेक्शन हार गयी, आप जीते मुबारक हो, मुझे इस नतीजे का कोई रंज नहीं है। लेकिन चुटकी लेते हुए कहा "हकीम साहिब आप की जीत से एक बात यह भी बज़ाहिर साबित हो गयी कि लखनऊ में सेहतमंद मर्द कम और मरीज ज्यादा हैं।"

    ये भी कभी रही थी लखनवी चुनावों की तहज़ीब,शराफ़त सलीक़ा और तमीज़।

      *आज हम कहाँ पहुँच गए हैं*।

 

 

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