तपती दुपहरी और झुलसाती गर्म हवाओं के बीच यदि पल भर को किसी पेड़ की छाया मिल जाए तो कैसा सकून होता है।

तपती दुपहरी और झुलसाती गर्म हवाओं के बीच यदि पल भर को किसी पेड़ की छाया मिल जाए तो कैसा सकून होता है। कुछ ऐसा ही अहसास तब होता है जब मारो काटो के युद्ध घोष और बहती रक्त की धाराओं में कोई शांति और प्रेम की बात कहे।

साहित्यकारों और कवियों के बिना आज के भौतिकवादी युग में किसी से आशा भी नही की जा सकती कि वो दार्शनिक वार्तालाप संवाद करेगा। पंकज चतुर्वेदी और आलोक धन्वा के बीच की बात !

आज आलोक धन्वा ने कहा : "ये जो यूक्रेन पर हमला किया है पुतिन ने, पागल है यह आदमी, 'सिक' है और 'पैरासाइट' है।"

मैंने पूछा : 'पैरासाइट' क्यों कह रहे हैं ?'

बोले : "इसलिए कि हथियारों का सौदागर है वह, उन्हीं के बल पर आगे बढ़ना चाहता है, और उसने किया क्या है हथियार इकट्ठा करने के अलावा ? उत्पादन का कोई तंत्र विकसित नहीं किया, न उसका मार्केट है, न सेब के बाग़ीचे, अबरक़ और कोयले की खानें हैं उसके पास।

वह याद नहीं करना चाहता कि रूस में ज़ारशाही कई सदियों पुरानी थी और कितनी लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी, तब बोल्शेविक क्रांति हुई। लेनिन के नेतृत्व में एक नया देश बना था। अंग्रेज़ी लेखक एच. जी. वेल्स जब मॉस्को गये, तो उनसे मिले। उन्हें आश्चर्य हुआ कि रात के दो बजे भी वह जाग रहे थे, क्रेमलिन में उनके आवास में रौशनी थी। 

वेल्स मिले, तो लेनिन मामूली कोट-पैंट पहने हुए, टिन के मग में क्वास (रूसी पेय) पी रहे थे। उन्होंने कहा कि शिक्षा, वैज्ञानिक विकास और सहकारी खेती के ज़रिए आगामी बीस वर्षों में रूस दुनिया की एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा। वेल्स को लगा कि अव्यावहारिक है, 'फ़िक्टीशियस' है यह बात और यह आदमी स्वप्नदर्शी है। उन्हें भरोसा नहीं हुआ, मगर लेनिन और उनके मुल्क ने ऐसा करके दिखाया। सोवियत संघ से ही संधि की नेहरू ने और पूरे भारत का नक़्शा बदल दिया था।

दूसरे विश्वयुद्ध में जब हिटलर ने हमला किया, तो क्या था रूस के पास ? आज की तरह अत्यन्त विकसित नहीं, बल्कि सामान्य हथियार थे ; लेकिन उस लड़ाई में तो वही 'हीरो' साबित हुआ और उसने स्टालिन के नेतृत्व में सारे फ़ासिस्ट तानाशाहों को मिट्टी का ढेर बना दिया। निकोलाई आस्त्रोवस्की की किताब 'अग्निदीक्षा' पढ़िए आप--जिसका हिंदी अनुवाद अमृतराय ने किया है--तो मालूम होंगी ये बातें।"

मैंने अचरज ज़ाहिर किया : 'क्रेमलिन में रहते हुए भी लेनिन मामूली कपड़े पहने थे ?'

आलोक जी का जवाब है : 'हाँ। चीन के राष्ट्रपति माओत्से तुंग भी मामूली कोट-पैंट पहनते थे। नये कपड़े सिर्फ़ ख़ास मौक़ों पर पहने जाते। यह बात मुझे दिनकर जी ने बताई, जब वह चीन यात्रा से लौटे और पटना के 'अप्सरा' होटेल में रुके। वहीं मुझे मिलने के लिए बुलवाया। बहुत सुदर्शन थे वह। आँखें वैसी ही, जैसी रवि (रवीन्द्रनाथ) ठाकुर की थीं : डबडबाई हुई रौशनी थी उनमें !

मैं जब वहाँ पहुँचा, तो दिनकर जी बड़े-से डाइनिंग हॉल में बैठे थे। मैंने झुककर उन्हें प्रणाम किया। बोले : 'मैंने आपके लिए भी ऑर्डर दे दिया है।' मैंने पूछा : 'मेरे लिए क्या ऑर्डर दिया ?' तो कहने लगे : 'मैं जानता हूँ कि आप काली चाय पीते हैं और जिस उम्र में आप हैं, वह तो हमने भी गुज़ारी है, इसलिए चीज़-पकौड़ा मँगाया है।' दिनकर जी ने बताया कि जब वह चीन पहुँचे, तो एक दिन हवाई अड्डे पर गहमागहमी थी। लोगों ने कहा : माओत्से तुंग विदेश जा रहे हैं। आज उन्होंने नये कपड़े पहने हैं। लोग उन्हें विदा करने आए हैं, क्योंकि वह विदेश बहुत कम जाते हैं।

अब पुतिन ने युद्ध शुरू कर दिया है। युद्ध के सबसे ज़्यादा 'विक्टिम' वे होते हैं, जो रोज़ रोटी कमाते और खाते हैं, 'डेली वेजेज़' पर जीते हैं। किसानों, मज़दूरों और बाज़ार पर निर्भर कमज़ोर निम्न वर्गों को भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। युद्ध सिर्फ़ आगे के मोर्चे पर नहीं लड़ा जाता, उसमें पीछे रहनेवाली स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े सबसे ज़्यादा 'सफ़र' करते हैं।

युद्ध का मतलब क्या है : दुनिया के सबसे ताक़तवर देश तय करते हैं कि हम कैसा जीवन जियेंगे : गैस, तेल और रोज़मर्रा की ज़रूरत के दूसरे सामान किस दाम पर बिकेंगे ! जिसके पास ताक़त होगी, दुनिया उसकी होगी। यही मतलब है इसका और इससे सबसे ज़्यादा निराशा लिखने-पढ़ने वाले लोगों को होती है, क्योंकि किताबों का, मानवीय ज्ञान का सबसे ज़्यादा निषेध हिंसा करती है।

टॉल्सटॉय ने एक शब्द नहीं लिखा है युद्ध के समर्थन में, जबकि ख़ुद उन्हें एक बार लड़ाई में जाना पड़ा था। आप मेरे जैसे कवि से क्या अपेक्षा करते हैं कि मैं युद्ध का समर्थन करूँ और प्यार और शांति की बात न करूँ, जो कि सबसे ज़रूरी बात है ? हिंदी का कोई साहित्यकार जाना चाहेगा युद्ध में ? रेणु हथियार लेकर लड़े थे, नेपाल की राजशाही के ख़िलाफ़।

लोगों ने दुनिया को सुंदर बनाने के लिए कितनी ऊँचाइयाँ हासिल कीं ! युद्ध करनेवाली ताक़तें इन ऊँचाइयों की शत्रु हैं। अगर सबसे सस्ती कोई चीज़ उनके लिए है, तो वह आदमी की जान है। वे हमेशा दिमाग़ चलाते रहते हैं कि कैसे इनसानों को मारा जाए, कैसे उनकी संप्रभुता ख़त्म की जाए ! यह सबसे बड़ा तमाशा है उनके लिए। उन्हें सबसे प्रिय है : मनुष्य को मारने का तमाशा। इसे देखने के लिए हम बैठे थोड़े रहेंगे, चले जायेंगे दुनिया से, जैसे मंगलेश (डबराल) चला गया हमारा !"

( चित्र सांकेतिक है जो यूक्रेन की वेशभूषा है)