रूस यूक्रेन विवाद से उत्पन्न आर्थिक संकट ! भारत एवम दक्षिण एशियाई देशों में संभावित प्रभाव।

यूक्रेन रूस विवाद का कारण बेशक यूक्रेनियन सरकार की मूर्खता हो या यूएस एवम नाटो देशों पर अंध विश्वास लेकिन इसका असर वैश्विक आर्थिक जगत पर नही होगा ऐसा सोचना भी गलती होगी।

भारत को वर्तमान सरकार के दौर में विश्व परिदृश्य में लगभग आइसोलेट किया जा चुका है बेशक भारतीय नेता चुनावी रैलियों में लम्बे चौड़े दावे करते रहे।

क्योंकि भारत सरकार घोषित रूप से यूएस की पिट्ठू करार दी जा चुकी हैं तो ऐसा संभव ही नहीं था कि भारत इस समय रूस के साथ खड़ा हो जाता।

यूक्रेन में फसे भारतीय विद्यार्थियों के sos वीडियो सार्वजनिक हो चुके है जिसमे वो कीव रेलवे स्टेशन से अपनी सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं और बता रहे हैं कि भारतीय एंबेसी का स्टाफ उन्हें उनके हालात पर छोड़कर भाग खड़ा हुआ है, वहां तक कि टेलीफोनिक संपर्क भी नहीं हो रहा।

इसी के साथ भारतीय शेयर बाजार सेंसेक्स में लगभग 2750 पॉइंट्स की गिरावट दर्ज की गई अर्थात कई लाख करोड़ रूपए निवेशकों के हाथ से हवा हो गए।

यदि यह विवाद कुछ समय और चलता रहा तो क्या होगा ?

वर्तमान में भारत और यूक्रेन का व्यापारिक संबंध बहुत सकारात्मक है, यूक्रेन भारत से बड़ी मात्रा में दवाएं, कपड़े और चमड़े का सामान इंपोर्ट करता है जिसका निर्यात रुकेगा, याद रखना चाहिए कि कई भारतीय दवा कंपनियों के दफ्तर कीव ( यूक्रेन की राजधानी ) में भी स्थित है।।

यूरोप को उसकी जरूरत की 25 % ऊर्जा ( गैस ) आपूर्ति रूस करता है और विश्व की कुल गेंहू का लगभग 25 प्रतिशत रूस और यूक्रेन से ब्लैक सी के माध्यम से होता है। यदि युद्ध बढ़ता है ( जिसकी उम्मीद बहुत ज्यादा नहीं होनी चाहिए ) तो भारत सहित विश्व में गेंहू की आपूर्ति पर फर्क पड़ेगा और शायद पाकिस्तान की तरह एक बार भारत को भी आटे की कमी तथा राशनिंग का मुंह देखना पड़े।

इसके अलावा शायद दवाओं की कीमतों में भी भारी वृद्धि से जनता को दो चार होना पड़े क्योंकि यदि भारत से निर्यात होता है तो उसका रॉ मैटेरियल भारत को आयत करना पड़ता है जिसके लिए अभी तक भारत सरकार ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नही की है।

इसके साथ ही अमेरिका को अपनी साख और महाशक्ति का ताज बचाने के लिए खुद को विजेता घोषित करना होगा नही तो यूएस का अपना वजूद खतरे में आ सकता है। फेस सेविंग के लिए पेंटागन चाहेगा कि भारत और चीन में चल रहा टकराव बढ़े जिसके बाद वो शांति के लिए सबको समझौते की मेज़ पर लाए।

किंतु क्या ऐसा संभव है ? चीन के लिए भी यही सुअवसर होगा जब वो साउथ चाइना सी पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित कर ले और भारत के जिन हिस्सो पर विवाद है उनका भी स्थाई हल निकाल ले क्योंकि चाणक्य नीति कहती हैं कि जब शत्रु राजा कमजोर हो या मूर्ख हो तो तुरंत राज्य का विस्तार कर लेना चाहिए।

बहरहाल भारतीय प्रधानमंत्री की बौद्धिक क्षमता पर तो कोई संदेह होना भी नही चाहिए और वैसे भी उनकी भाषा शैली का मुकाबला नहीं किया जा सकता, इसलिए यदि वार्ता की मेज पर आना पड़ा तो निश्चित रूप से मोदी जी ही सफल होंगे। 

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