यूक्रेन, रूस, अमेरिका और नाटो की जबानी जमाखर्च के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ने वाले प्रभाव।

अचानक रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने देश को संबोधित करते हुए लगभग एक घंटे का भाषण देते है जिसमे किसी लिखित सामग्री या टेली प्रॉम्पटर का उपयोग नही किया गया।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपने देश के लिए विदेशों में अंडर कवर काम करने वाले से ज्यादा जोखिम भी किसी को नहीं होता और अपने देश के प्रति लगाव भी किसी में नहीं हो सकता क्योंकि उसको सरहद के इस पार और उस पार के साथ जिंदगी और मौत का अहसास बहुत बेहतर होता है और पुतिन तब बतौर केजीबी एजेंट जर्मनी में थे जब सोवियत संघ टूट गया था।

पुतिन के भाषण में उनका यह दर्द और गुस्सा साफ झलक रहा था तभी उन्होंने इतिहास के संदर्भ से बताया कि यूक्रेन कभी कोई देश नहीं रहा अपितु 1917 से रूस ने इस क्षेत्र को अपना बना कर संगठित किया था।

बहरहाल यूक्रेन के दो विद्रोही हिस्सो को रूस और सीरिया ने स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता भी दे दी और रूस ने दोनो से मैत्री तथा सुरक्षा सहयोग की सन्धि भी कर ली और रूसी सेनाओं का वहां प्रवेश भी हो गया तथा जनता द्वारा स्वागत भी।

यूरोप के देशों द्वारा अपने अपने हितों के दृष्टिकोण से औपचारिक बयान भी आ गए तथा धमकियां भी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी नाटो देशों की सुरक्षा का दम भर दिया ( यूक्रेन अभी तक नाटो देशों में शामिल नहीं है ) 

इन सबके बीच जो महत्वपूर्ण घटनाक्रम होने जा रहा है वो है पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का मॉस्को दौरा, आधिकारिक तौर पर इसे दो दिन का बताया जा रहा है बेशक चार दिन गिनती में आ रहे हो।

इमरान खान की यात्रा से पहले यूक्रेन के इस्लामाबाद (पाकिस्तान) स्थित राजदूत ने सार्वजनिक रूप से अपील की है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अपनी यात्रा में रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थता करते हुए शांति के लिए प्रयास करें।

इससे पहले इमरान खान ने रशियन टीवी को दिए गए लंबे इंटरव्यू में ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि वो बिना शर्त रूस के खेमे में खड़े होने जा रहे हैं। बेशक आदतन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना भी की और खुले मंच पर बहस की चुनौती भी दे डाली।

इन सबके विश्लेषण और पाकिस्तानी नेताओ के इतिहास से साफ होता है कि वो रूस से भी उसका साथ देने के लिए किसी बड़ी वसूली की योजना बना रहे हैं। 

आर्थिक निवेश के नाम पर तापी गैस परियोजना के अतिरिक्त कराची से लाहौर तक की एक अन्य पाइपलाइन योजना की मंजूरी रूस की कंपनियों से ले चुके है तो इससे आगे वो क्या चाहते होंगे ?

इसी क्या के पीछे भारत के लिए चुनौतियों के बादल मंडराने लगते है। क्योंकि पाकिस्तान को रूस के साथ लाने में चीन की अहम भूमिका रही है और इसके बावजूद अमेरिका अभी भी इस स्थिति में नहीं है कि पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कदम उठा सके हालांकि FATF से ब्लैक लिस्ट होने की तलवार जरूर पाकिस्तान के सिर पर लटका कर रखी हुई है लेकिन जिस प्रकार रूस और चीन पर प्रतिबंध लगने के बावजूद उनसे ज्यादा यूरोपियन और अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा है तो शायद अभी इस खेमे पर ज्यादा प्रतिबंध लगाने का अर्थ उन्हे वैकल्पिक बैंकिंग तथा अन्य व्यवस्थाएं बनाने के लिए प्रेरित करना होगा।

यदि विश्व से डॉलर का वर्चस्व खत्म कर दिया जाए तो यूएस का ताश के पत्तो का महल ढहने में देर नहीं लगेगी। 

प्रश्न यह है कि इनका भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा और भारत कहां खड़ा होता है ? कीव ( यूक्रेन ) में फसे भारतीयों को निकालने के लिए फिलहाल भारत सरकार की ओर से कोई उल्लेखनीय प्रयास नही किए गए, जो जहाज रेस्क्यू के लिए गए भी है वो भी दोगुना से तीन गुना अधिक किराया वसूल रहे हैं क्योंकि भारत सरकार की कोई आधिकारिक एयरलाइंस नही है।

यूरोपियन तथा यूएस नागरिकों को तुरंत सड़क मार्ग से पौलेंड भेज दिया गया था और रूस तथा चीन के नागरिकों को भी जो आवश्यक थे निकाल लिया गया। 

इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा सवाल इमरान खान द्वारा रूस से भारत के विरुद्ध किस प्रकार के सहयोग की मांग की जा सकती हैं यह प्रश्न भारत के नीति निर्धारकों के लिए चिंता का कारण होना चाहिए था।

इमरान खान ने हमेशा भारत के विरुद्ध साजिशें करते हुए कश्मीर को मुख्य भूमिका में बताया है और वर्तमान सरकार द्वारा 370 पर लिए गए निर्णय तथा लद्दाख क्षेत्र में चीनी कब्जे के मद्देनजर हो सकता है कि पाकिस्तान अपना कोई ख्वाब सच करने की कोशिश करे।

दो तरफा संबंधों और किसी भी दूसरे प्रधानमंत्री का दौरा दक्षिण एशिया में कोई हलचल पैदा नहीं करेगा या कुछ बदलाव नहीं आयेंगे ऐसा सोचना भी किसी शाखा मृग मरीचिका होगी।