घिनौनी सियासी साजिशों का शिकार होता पंजाब और पंजाबियत आज भी जिंदा क्यों है और कब तक रहेगी ?

रूहें जमीन पर दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप का एक हिस्सा जिसे पंजाब के नाम से जाना जाता है निसंदेह सबसे खूबसूरत और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है।

यहां की विराट संस्कृति जिसकी जड़ें सबसे पुरानी सभ्यता सिंधु घाटी ( Indus valley) से जुड़ी हुई है अपनी जीवटता और संघर्ष करने की क्षमता के कारण विश्व में एक अलग पहचान बना चुकी हैं तभी तो जिस प्रकार अफ्रीका की पहचान black skin से होती हैं तो भारत की पहचान सिख वेशभूषा से होती है बेशक सिख समुदाय भारत के अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक है।

पंजाब और पंजाबियत को यह सम्मान निसंदेह सिख गुरुओं की शिक्षाओं और सूफीज्म के प्रभाव के कारण भी मिला है क्योंकि जाति मूलक समाज होने के बावजूद पंजाब में कभी छुआछात, सती प्रथा या इंसानों में भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयां नहीं रही।

धर्म के आधार पर हिंदी भाषी क्षेत्रों की तरह कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुवे और यही कारण रहा कि महाराजा रणजीत सिंह के कार्यकाल से आज तक यदि पंजाब को कभी शिकस्त मिली तो उसके पीछे केवल धोखा और साजिशें रही। अंग्रेज़ो ने लगभग पूरा हिंदुस्तान फतेह कर लिया था किन्तु पंजाब को वो सीधे युद्ध में कभी शिकस्त नहीं दे पाए, यहां तक कि मुगलों के विरूद्ध भी बगावत करने वाले पंजाबी इस्लाम धर्म में आस्था रखते थे।

विभिन्न मार्शल कौमों की तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने नए वर्ल्ड ऑर्डर में पंजाब को भी बांट दिया गया और लाखो पंजाबी इधर से उधर या उधर से इधर आने पर मजबूर हुए।

वर्तमान पाकिस्तानी पंजाब से आने वाले खत्री और अरोड़ा पंजाबियों को एक साज़िश के तहत खुद को हिन्दू लिखने के लिए प्रेरित किया गया और समझाया गया कि क्योंकि अब उन्हें भारत में ही रहना होगा तो अपनी मातृ भाषा भी हिंदी बताना सुविधाजनक रहेगा ।

1947 के बाद आज चौथी पीढ़ी जवान हो रही हैं और भारत के विभिन्न हिस्सों में बसने वाले पंजाबी अपनी जड़ों से कट चुके है। साजिशें कैसे होती हैं इसका एक उदाहरण हरिद्वार के पंडो के बही खाते है। अभी तक वहां पिंड दान आदि के लिए जाने वाले पंजाबी परिवारों को अपना मूल स्थान बताना पड़ता था जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं लेकिन पिछले 5 - 7 साल से पंडों ने उसे बदलकर वर्तमान स्थान लिखना शुरू कर दिया अर्थात अगली दो पीढ़ी यह भी भूल जाएंगी कि उनके बुज़ुर्ग पंजाबी थे।

इसी प्रकार पंजाब में परम्परा थी कि एक बेटे को केश धारी जरूर बनाया जाता था बाकी आमतौर पर सहजधारी होते थे लेकिन अरोड़ा और खत्री समाज की आस्था गुरुद्वारों में ही थी इसका सबूत यह है कि पश्चिमी पंजाब के गांवों में गुरूद्वारे तो मिलते है किन्तु सनातनी मूर्ति पूजा वाले मन्दिर नहीं मिलते।

वर्तमान में हथेली जितना बड़ा पंजाब टूट टूट कर नाखून जितना रह गया और आजकल उसमे चुनावी दौर चल रहा है जिसमे पहली बार सुनाई दे रहा है कि "दलित मुख्यमंत्री" होगा या दलित मुख्यमंत्री बनाया गया है।

इसकी शुरुआत दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने की थी जब अरविन्द केजरीवाल ने पहली बार घोषणा की थी कि वो किसी "दलित" को उप मुख्यमंत्री बनाएंगे। रंग रेटा गुरु का बेटा वाली संस्कृति में गोबर पट्टी का दलित कार्ड और स्वर्ण कार्ड भविष्य में पंजाबियत के विनाश का कारक बनेगा यह पंजाबियों को अभी से समझ लेना चाहिए।

इसी कड़ी में कल राघव चड्ढा या आम आदमी पार्टी के मजीठिया ने बयान दिया है कि कांग्रेस ने सुनील जाखड़ को मुख्यमंत्री का चेहरा केवल इसलिए नहीं बनाया क्योंकि वो "हिन्दू" हैं। पंजाबी कब से हिन्दू, सिख या मुस्लिम होने लगे यह सवाल जनता को जरूर पूछना चाहिए।

यहां पश्चिमी पंजाब के एक पत्रकार द्वारा किसी अमेरिकन भारतीय से की गई बातचीत उसी के शब्दो मे दी गई है जिसमे उसे बताया गया कि पंजाब तो केवल वो है जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है, भारतीय पंजाब तो 47 के बाद आने वाले शरणार्थियों ने कहना शुरू कर दिया था जो आज भी पाकिस्तानी शरणार्थी है।

इसके अतिरिक्त दिए गए चित्र वृहद पंजाब के दो शहरों के है और आज दोनों के बीच की दूरी लगभग पांच सौ किमी हो गई है। याद रखे कि राजनीति जब धर्म और संस्कृति पर हावी होने लगती हैं तो संस्कृति को बर्बाद कर देती हैं।

‏ایک آسامی انڈین سے ملاقات اور پنجاب :

ایک آسامی انڈین سے ملاقات ہوئی ، عمر لگ بھگ تیس سال ، پانچ سال سے امریکامیں مقیم ، بتانے لگا وہ آسام کا رہنے والا اور شیلانگ سے دس گھنٹے کے فاصلے پر بھوٹان کے قریبی پہاڑی علاقے کے ایک گاؤں کا رہائشی ہے لیکن اب والدین دہلی شفٹ ہو چکے ہیں تو امریکا سے دہلی جانا ‏ہوتا ہے، دہلی سے آسام بذریعہ بس دو دن لگتے ہیں، میں نےجب ہندی بولنے بارے پوچھا تو بولا بیس تیس سال پہلے آسامی ہندی نہیں بول سکتے تھے لیکن اب بول لیتے ہیں، اس کی وجہ بالی ووڈ موویز ہیں، میں نے اسے بتایا کہ تامل ناڈو، بنگلہ دیش اور افغانستان کا بھی یہی معاملہ ہے، اب یہ علاقے بھی فلموں کی وجہ سے ہندی بول لیتے ‏ہیں ، پھر اسے شک ہوا کہ میں انڈین نہیں ہوں بولا آپ کی زبان میں فرق ہے، پاکستان سے تو نہیں ہو؟ میں نے اثبات میں سر ہلایا اور بتایا کہ میرے دادا مشرقی پنجاب انڈیا سے آئے تھے تو فورا بولا ۔

‏“ نہیں ، پنجاب تو پاکستان میں ہے، انڈیا میں پنجابی زیادہ تر پاکستان سے آئے ہیں ، ہم پنجابی کو شرنارتھی ‏سمجھتےہیں ۔

‏میں نے بتایا کہ انڈیا میں بھی پنجاب ہےطتو وہ بولا کہ پاکستان سے آنےوالے پنجابیوں نےاس کا نام پنجاب رکھ دیا ہے، تب میں نے اسے پنجاب کی تقسیم بارے بتایا تو اس کا اگلا سوال یہ تھا کہ پنجابیوں نے ایک دوسرے کو قتل کیوں کیا؟ میں نے پھر وضاحت کی سارے ہی پنجابی قوم سے تھے لیکن مذہب الگ الگ ‏تھے جو تقسیم کی وجہ بنے، وہ آسامی حیران ہو کر کہنے لگا کہ یہ کیسی قوم ہےجو مذہب کی وجہ سے ایک دوسرے کوقتل کرنےلگی۔

‏یہ اسامی ایک عام سوچ اور عام مطالعے کابندہ تھا لیکن اس کی بات سے مجھے افسوس ہواکہ پنجابیوں نے مذہبی سیاست کا شکار ہو کرخود کو تباہ و برباد کر لیا اور انھیں اپنی تباہی کا احساس بھی نہیں۔

‏انڈیا میں پنجابی کو پاکستان سے آنے والا شرنارتھی جبکہ پاکستان میں بھی پنجابی کو انڈیا سے آنے والا پناہ گیر کہا جا رہا ہے، سارے پنجاب کو سرائیکی وسیب بنا دیا گیا ہے، دونوں طرف کا پنجابی تقسیم پنجاب کی وجہ سے اپنی ہی دھرتی پر پناہ گیر بن گیا ہے ، مذہبی پاگل پن کی وجہ سے حق قومیت کھو بیٹھا ہے، وہ پنجاب جسے رنجیت سنگھ نے طاقتور ملک بنایا تھا وہی پنجاب مذہب کی بنیاد پر تقسیم ہو کر ٹکڑے ٹکڑے ہو چکا، اپنی دھرتی کا وارث بھی نہیں رہا۔ ‏ستم ظریفی یہ کہ پنجابیوں کو اپنی بربادی کا احساس بھی نہیں بلکہ کئی پنجابی متعصب اور تنگ نظر قرار دیتے ہوئے الٹا مجھے نصیحت کرتے ہیں کہ ہمیں انسانیت کی بات کرنی چاہئیے، دنیا گلوبل ہے، اب ایسے بے وقوفوں کو کون سمجھائے کہ خطہ زمین، کلچر اور قومیت الگ چیز ہے اورگلوبل ورلڈ، انسانیت ‏دوسرا ٹاپک، افسوس کہ پنجابیوں کا سیاسی قومیتی شعور پست ترین سطح پر ہے اور یہ دونوں ملکوں میں ٹارگٹ بنے ہوئے ہیں لیکن اس غلط فہمی کا شکار ہیں کہ ان کے مذاہب ان کی وجہ سے قائم ہیں۔

شہزاد ناصر، نیویارک