भारत तो क्या हिंदुस्तान ( अविभाजित हिंदुस्तान ) की जनता के बारे में ऐसा सोचना भी कल्पना से उपर की बात है लेकिन तर्को के आधार पर झुठलाया भी नहीं जा सकता।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला हिन्दुस्तानी समाज बुद्ध, महावीर, नानक, गांधी और अपने पीर पैगम्बर की शिक्षाएं भुलाकर रवांडा की तरह अपने ही बहन भाइयों और बच्चो के खून से रंगे हाथ लेकर उत्सव मनाने की मानसिकता रख सकता है ?

हिंदुस्तान के आज तीन देश हमारे सामने है जिसमे भारत न जाने कितने धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों में बटा होने के बावजूद एक गुलदस्ते की तरह माना जाता रहा है। सदियों से छुआछूत जैसी बुराइयां भी रही, धार्मिक आस्थाओं के अंतर भी रहे लेकिन कभी कोई सामूहिक रूप से किसी के खून का प्यासा नहीं हुआ।

पाकिस्तान में केवल दो प्रतिशत अल्पसंख्यक है लेकिन इतने ही उग्र और चेतन रहते है जीतने वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम। शायद हिंदुस्तान का मुस्लिम बहुल एकमात्र ऐसा देश है जहां सिख परिवारों की गिनती से अधिक तो गुरूद्वारे होंगे।

बांग्ला देश का समाज इन दोनों से बिल्कुल अलग है जिसमे हिन्दू मुस्लिम बहुत बाद में होता है पहले बंगाली होते है, एक जैसे कपड़े पहनते हैं, एक जैसा खाना खाते हैं और दुर्गा पूजा के पंडाल भी मिलकर सजाते है लेकिन अपने अपने घरों में बहुसंख्यक मुस्लिम और अल्पसंख्यक हिन्दू होते है।

यदि राज्यों की बात की जाए तो पंजाब सिख बहुल क्षेत्र है किन्तु आजतक किसी गैर सिख पर उसके धर्म या जाति के आधार पर कभी किसी ने हाथ भी लगाया हो इसका उदाहरण नहीं मिलता।

मुख्य विषय पर आते है जिसमे जेनॉसाइड वाच नामक स्वतंत्र संस्था ने भारतीय मुस्लिम समाज पर स्मभविक नरसंहार के खतरे के प्रति अंतरराष्ट्रीय जगत को चेताया है।

जनोसाइड वाच के प्रमुख ने भारत में आरएसएस एवम् हिन्दुत्व वादी समूहों के सन्दर्भ में गत दिनों हरिद्वार में हुई कथित हिन्दू धर्म संसद का हवाला देते हुए भारतीय समाज में रवांडा जैसा कत्लेआम होने की आशंका जताई है।

उनके अनुसार किसी भी व्यापक नरसंहार के लिए दस चरणों में तैयारी की जाती हैं जिसमे से आठ स्तर भारत में कथित हिन्दुत्व वादी गिरोह पूर्ण कर चुके हैं।

उनके अध्ययन के अनुसार इस प्रकार के गृह युद्ध को भड़काने के लिए पहले समूह विशेष को धर्म या जाति/नस्ल के आधार पर चिन्हित किया जाता हैं।

फिर उनका आर्थिक बहिष्कार एवम् उन पर अनर्गल आरोप लगा कर उन्हे समाज का दुश्मन बताया जाता हैं।

इस दुष्प्रचार में मीडिया एवम् अफवाह तंत्र का सहारा लेना भी पूरी योजना का एक टूल होता है जिस प्रकार रेडियो रवांडा से निरन्तर अप्रत्यक्ष रूप से नफरत फैलाने वाले समाचार और कार्यक्रम प्रसारित किए जाते थे।

इनके बाद छोटे छोटे हंगामे करके टारगेटेड समूह को एक क्षेत्र विशेष में इकट्ठे रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता हैं और समाज में ध्रुवीकरण तेज हो जाता हैं जो दो विपरीत समाजो को एक दूसरे के विपरीत खड़ा कर देते है।

अन्तिम चरणों में सामूहिक रूप से एक समूह द्वारा दूसरे समूह से अपने अस्तित्व को खतरा बताते हुए उसका सामूहिक अंत करने का आह्वाहन किया जाता हैं जिससे वो आक्रमणकारी गिरोह जीवित रह सके।

जर्मनी में हिटलर ने भी यहूदियों पर कुछ ऐसे ही आरोप लगाए थे जिससे जब होलोकास्ट किया जा रहा था तो जर्मनी समाज को कोई आपत्ति नहीं हुई वैसे भी होलोकास्ट से पहले जर्मन जनता को उच्च रक्त के शुद्ध आर्यन नस्ल जैसे वाक्यों से एक विशेष कॉम्लेक्स में जकड़ दिया गया था।

यद्धपि यह समाचार एक सप्ताह पहले का है लेकिन विश्व मीडिया में आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है और कुछ भारतीय मीडिया तथा करन थापर जैसे पत्रकारों ने इंटरव्यू एवम् विश्लेषण प्रकाशित किए हैं।

भारत में गृह युद्ध अथवा अल्पसंख्यकों के नरसंहार के खतरे को देखते हुए पूर्व संयुक्त राष्ट्र सचिव ( धार्मिक स्वतंत्रता एवम् मानवीय सरोकार ) ने आज अल जजीरा को इंटरव्यू देते हुए उपरोक्त शंकाओं पर अपनी सहमति जताई है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से तुरन्त दखल की अपील की है।

शायद इसे वक्त का घूमता पहिया या किसी समाज पर उसके द्वारा किए गए पापो का रिएक्शन कह सकते है या कुछ भी लेकिन जिस प्रकार की आवाजे उठ रही हैं वो भयावह भविष्य का संकेत देती हैं।

Farmer's lives matters. लेकिन भारत के बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश एवम् हरियाणा में सरकार इसका अर्थ भी नहीं समझती।

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