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समाज की नजरों से ओझल रहने वाले बहुत से अच्छे लेखकों और पत्रकारों को सामने लाना भी हमारे कार्य का एक हिस्सा है। आज भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान की पुण्यतिथि पर Hafeez Kidwai साहब की कलम से निकले अल्फ़ाज़ जो भाषा और शैली के कारण दिल की गहराई तक छु जाते है बेशक साथ में सरहदी गांधी तो है ही।

और जब उन्होंने आजके रोज़ आखरी सांस ली तो युद्ध रोक दिया गया । आग उगलते युद्धक विमान खामोश हो गए । सिपाहियों ने अपने कदम रोक दिए,क्योंकि आज दुनिया में शांति और अहिंसा का दूसरा गांधी उनके बीच से चला गया था । अफगानिस्तान की धरती पर जब उनका जनाज़ा रखा था,तो युद्ध में शामिल सभी सेनाओं को हुक्म मिला,

खामोश हो जाओ । कम से कम उस इंसान की मय्यत की इज़्ज़त रख लो,जो इस मिट्टी के सुक़ून के लिए अपनी सारे सांसे ग़र्क़ कर चुका । जिसने अथाह कष्ट सहन किया । इस पूरे भूभाग के लिए त्याग,अहिंसा,समर्पण का बेजोड़ उदाहरण दुनिया के सामने रखा ।

लम्बे संघर्ष के बाद जब हमें आज़ादी मिली,मुल्क मिलें, तो उन्हें जेल मिली । उनका लोहे की मोटी मोटी जंज़ीरों से पैरों का गोश्त फट गया था। गोश्त और ख़ून दोनों बाहर आ रहे थे।

वोह बूढ़ा इंसान उस ज़मीन में क़ैद था जिसे उसका कहकर उसे दिया गया था।इशारों पर चलने वाले उसके दोस्तों की ज़बानों में हुक़ूमत का ज़ायका लग चुका था।साथ के लोग भी अब उसकी तरफ मुड़कर नही देखते की उसे देखते वक्त कहीं आँखे न झुक जाएँ।

जिस किसी ने ज़मीन के बटवारे को रोकना चाहा था उसे या तो क़ैद मिली या गोली।एक भीड़ थी जो महात्मा को मार देना चाह रही थी तो एक भीड़ दूसरे महात्मा की खाल ज़ंज़ीरो से खीच लेना चाह रही थी।मैं आज यह क्यों लिख रहा हूँ ताकि तुम देखो की भेड़िये कैसे होते हैं।

खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान को जब महात्मा गाँधी ने पाकिस्तान भेजा तब वोह दर्द के साथ बोले गाँधी जी आपने मुझे भेड़ियों के हवाले कर दिया मगर खान बाबा इधर के भेड़िये नही देख पाए।उधर के भेड़ियों ने सरहदी गाँधी को जंज़ीरों से बाँध कर कैद कर दिया और इधर के एक भेड़ियों के झुँड ने महात्मा गाँधी को शहीद कर दिया।

मेरी नज़रों के सामने गाँधी और सरहदी गाँधी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं।आज बादशाह खान की पुण्यतिथि है तो ठीक 10 दिन बाद महात्मा गाँधी की शहादत का दिन है।

दोनों की मोहब्बत और एक दूसरे के साथ हद दर्जे तक खड़े रहने की मिसाल कम ही हैं।खान बाबा हम सबकी रौशनी हैं।भारत से बेहद मोहब्बत और अपनेपन ने,उन्हें आज़ादी के बाद भी दशकों पाकिस्तानी जेल में रखा।हो सके तो आज ढूंढकर उनहे पढ़िए उनके ख़ुदाई खिदमतगार को महसूस कीजिये।

बादशाह खान की इंसानियत की देखिये।उनकी तरफ नज़रें कीजिये,एक सौंधी सी खुशबू आएगी जिसमे अथाह सुकून होगा।आज बेचैन दिलों के साथ मोहब्बत और ख़िदमत की मिसाल खान साहब को याद करने का दिन है...