भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान उर्फ सरहदी गांधी की पुण्य तिथि पर विशेष।

खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हे सरहदी गांधी के नाम से भी जाना जाता है आज उनकी पुण्यतिथि है और यदि गांधी का अर्थ सत्य और अहिंसा है तो उसको व्यवहार में सिद्ध करने का नाम भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान है।

नम अस्ते अर्थात मै झुकता हूं, यह शब्द एलाम में असफल हो चुकी आर्यन सभ्यता से आया है जिसमें दूर से ही हाथ जोड़ कर अभिवादन किया जाता हैं।

इस्लामिक सभ्यताओं से प्रभावित समाज में अभिवादन के बाद गले मिलने की भी रिवायत रही है।

हिंदुस्तान में पंजाबी समुदाय में यह आज भी प्रचलित है और अभिवादन के धार्मिक शब्दो के उच्चारण के बाद गले मिलते हैं।

ऐसा क्यों है ? यह वर्ण व्यवस्था के विरूद्ध पहला विद्रोह कहलाया जा सकता है जो छुआछूत को मान्यता नहीं देता और प्रत्येक इंसान को बराबरी का दर्जा देता है।

आज ही पख़्तून लीडर बादशाह खान की पुण्यतिथि भी है जिनका लाल कुर्ती आंदोलन खैबर पख्तुनख्वा में पठान आबादी के जिंदा रहने का एक बड़ा कारण बना।

रसूल पाक जब मक्का में आए तो उन्होंने पहला फरमान सुनाया कि आज के बाद माजी ने किए गए सभी कातिलों को माफी दी जाती है।

यह अहिंसा का पहला प्रयोग था जो सफल रहा, पख़्तून कबीलों की आंख के बदले आंख की सोच को भी बदलने के लिए खान अब्दुल गफ्फार खान ने गांधी जी के साथ मिलकर अहिंसा का आंदोलन चलाया जो सफल रहा क्योंकि त्याग करके दिखाना पड़ता है, शब्दो से फेंका फेंकी करने से सिर्फ जलालत ही नसीब होती हैं।

बादशाह खान के साथ गांधी जी भी अपने आश्रम में गोश्त पकवाते थे शायद अहिंसा और समभाव का इससे बेहतर व्यवहारिक उदाहरण नहीं हो सकता।

विभिन्न आंदोलनों में गैर मुस्लिम पंजाबन बहनों का गले मिलकर स्वागत, मिलजुलकर खाना पकाना और बादशाह खान की पुण्यतिथि है। सभी कुछ मिलकर सही हिंदुस्तान बनाते हैं।

कुछ काले दिनों को छोड़ दे तो हम सब ऐसे ही है और ऐसे ही रहेंगे क्योंकि 

अच्चा हुआ गांधी खान तुम वक़्त से चला गया 

आज ज़िंदा होती तो बहुत मायूस होती क्योंकि आज खबीस का औलाद तुमको हिंदुस्तान का शहरीयत भी नहीं देता, उदर पाकिस्तान तुमको गद्दार बोलता और तुम पहले स्टेट विहीन दरवेश बन जाते।

20 जनवरी 1988, पेशावर का छोटा सा मकान 

और अंग्रेज़ो से लोहा लेने वाली बहुत बड़ी शख्सियत जिसे हम बादशाह खान भी कहते है, जिसे सीमांत गांधी भी कहते है और जो सुर्ख लिबास के लिए पहचाना जाता था।

वो दरवेश नज़र बन्दी में अपनी आत्मा को आज़ाद कर देता है लेकिन अखंड भारत पर मोहर लगाते हुए अपनी आखरी आरामगाह जलालाबाद ( अफगानिस्तान ) में बनाने की वसीयत करता है।

ऐसे सरहदी गांधी को उनकी पुणयतिथि पर News Number परिवार का सलाम।।

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