ਜਿੱਥੋਂ ਦੀ ਖੋਤੀ, ਓਥੇ ਆ ਖਲੋਤੀ ! अफगानिस्तान को भारत सरकार द्वारा भेजे जाने वाली मानवीय मदद सियासी दांवपेंचों में फसी !

23 नवम्बर 2021 को NewsNumber.Com पर भारत सरकार द्वारा अफगानिस्तान को 50 हजार टन गेंहू भेजने की घोषणा के साथ पाकिस्तान द्वारा सम्भावित प्रतिक्रिया की रिपोर्ट सच साबित हुई।

भारत सरकार ने पर्दे के पीछे बातचीत के साथ ही तालिबान को सर्दियों मे अन्न की कमी ना होने देने के लिए गेंहू की मदद देने का आश्वासन दिया गया था जिसकी 22 नवम्बर को आधिकारिक रूप से घोषणा कर दी गई।

भारतीय कैलेंडर के अनुसार 23 नवम्बर को इस खबर के सन्दर्भ में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई जिसमे भारत सरकार की वाघा अटारी बार्डर के माध्यम से वाया पाकिस्तान सहायता भेजे जाने की घोषणा के साथ होने वाली दिक्कतों की सम्भावना जताई गई थी।

और शब्दशः वही हुआ। पाकिस्तान सरकार द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि वाघा बॉर्डर से आगे भारतीय ट्रकों या ड्राइवर्स को जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और वाघा अटारी से आगे पाकिस्तानी ट्रक एवम् ड्राइवर ही सहायता सामग्री लेकर जाएंगे।जबकि भारत सरकार चाहती है कि भारतीय ट्रक पाकिस्तान में प्रवेश करके अफगानिस्तान तक गेंहू पहुंचाए।

इसके पीछे भारत सरकार की मदद से अधिक दिखावे की प्रवृति जिम्मेदार समझी जा सकती है क्योंकि भारत में भी गरीबों को बांटे जा रहे अनाज से ज्यादा उसके थैले और पैकिंग तथा थैलो पर प्रधान मंत्री श्री मोदी जी का बड़ा सा फोटो होने पर ज्यादा ध्यान रखा गया।

वैसे भी भारतीय प्रधान मंत्री को झोले से विशेष लगाव है ऐसा उन्होंने अपने भाषण में बोला था लेकिन यह अमानवीय एवम् निम्न प्रवृति की हरकत है कि मदद का दिखावा किया जाए और ऐसा ही पाकिस्तान सरकार भी कर रही हैं।

हालांकि पाकिस्तान सरकार का तर्क है कि कुल गेंहू के लिए 1200 ट्रकों की जरूरत होगी और  इसके लिए कम से कम 2400 ड्राइवर/हेल्पर उनकी सीमा में प्रवेश करेंगे जो व्यवहारिक नहीं है।

इसके लिए पाकिस्तान सरकार अपने ट्रक उपलब्ध कराने के लिए तैयार है लेकिन उनका भाड़ा किराया भारत सरकार को देना होगा।

क्योंकि यह मदद से अधिक सियासी और दिखावे के दांवपेंच है तो फिलहाल वार्ता ही चल रही है जैसी की कूटनीतिक वार्ताओं में बाते कम चाय पानी तथा सूट टाई ज्यादा होती है।

यदि वास्तव में इंसानियत है और मदद करना चाहते हैं तो केवल एक उपाय है जिसे दोनों पक्ष स्वीकार भी कर सकते हैं बशर्ते नियत साफ हो और वो है 

"मालगाड़ी पर कंटेनर लाद कर भेज दिया जाए, अटारी के बाद पाकिस्तानी इंजन लग सकता है"

पेशावर तक अमृतसर से सीधा रेलवे ट्रैक है, बंद कंटेनर में दिखाई भी नहीं देगा या तमाशा भी नहीं लगेगा कि किसका माल है और मालगाड़ी के रैंक से भी पता नहीं चलेगा कि मोदी जिंदाबाद हैं या इमरान जिंदाबाद।

बाद में पाकिस्तानी इंजन अटारी पर ही भारतीय इंजन को मालगाड़ी के रैक और खाली कंटेनर सौंप सकता है जैसा समझौता एक्सप्रेस के साथ होता था।

किन्तु चिड़िया का हक नहीं बनता कि वो दूसरे किसी को बारिश में भीगते देखकर उसे घोसला या घर बनाने की सलाह दे। फिलहाल तो दोनों ओर के ट्रक आमने सामने है।