ਅਵੇਸਲੇ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ, ਦਿੱਲੀ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਫ਼ੈਸਲਾ ਬਦਲੇਆ ਹੈ, ਸੋਚ ਨਹੀਂ ਬਦਲੀ।।

एक साल से भी अधिक की तपस्या के नतीजे में भारतीय किसानों की पहली बड़ी जीत दर्ज हुई और भारतीय संसद के दोनों सदनों से खेती विरोधी बिल वापिस ले लिए गए लेकिन जिस प्रकार धक्केशाही से बिल पास हुए थे वैसे ही वापस भी हो गए।

बिल वापसी के बाद NewsNumber टीम ने मोर्चे पर मौजूद किसानों से बातचीत में हालात ए हाजरा जानने की कोशिश की और महसूस किया कि मेहनत और पसीने से सफेद हुए केश अपने जीवन के अनुभव को सिद्ध करते हैं कि बाल धूप में सफेद नहीं हुए।

भारत के प्रधान मंत्री श्री मोदी जी ने टीवी घोषणा से बिल वापिसी के साथ देश से माफी भी मांगी थी लेकिन एक बुज़ुर्ग रिटायर सूबेदार साहब ने अपने मोबाइल पर संसद की कार्यवाही देखते हुए बताया कि मोड़ी 10:09 ते पार्लियामेंट बीच आया सी ते 10:10 ते गायब हो गया।

उनके अनुसार शायद सरकार को इन कानूनों के सम्बन्ध में अपनी गलती का अहसास नहीं हुआ है अपितु किसी मजबूरी या इलेक्शन के चलते सरकार ने बिल वापिस लिए है और अभी भी भरोसा नहीं है कि जैसे ही मौका मिलेगा ये कोई न कोई शरारत जरूर करेंगे।

किसान आंदोलन में लंबे समय से सक्रिय किसानों ने बाकी सब के साथ पंजाब, हरियाणा के स्वतंत्र पत्रकारों, विदेशी मीडिया, NRI पंजाबियों और छोटे छोटे यूटयूब वाले युवकों का विशेष धन्यवाद किया क्योंकि उनके अनुसार यदि ये मोर्चे को हाईलाइट न करते तो सरकार अपने मीडिया के माध्यम से मनोबल तोड़ने की साज़िश में कामयाब भी हो सकती थी बेशक दुनियां को मालूम हो कि भारतीय हिन्दी मीडिया का सच से कितना नाता है और क्या स्तर है।

विदेशो में बसे पंजाबी बेटे बेटियों के उदाहरण में कैलिफोर्निया के कार्डियोलोजिस्ट डॉ स्वेमन सिंह और उद्योगपति सरदार चटवाल का नाम ही काफी है हालांकि सेवा भावना से संगत के निशुल्क जूते चप्पल जोड़ने वाले मोची से लेकर लंगर पकाने वाली माताओं की भी अपनी महत्ता है।

इसी के साथ मोर्चे की सफलता में निहंग सिंह साहेबान को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता, 28 जनवरी को जब बीजेपी के गुंडों ने धरने पर पथराव किया था तो NewsNumber टीम कड़कती ठंड में रात भर वहीं थी और अकाल पुरुख की फौजों को तैयार पर तैयार देखा था।

भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए किसानों ने कहा कि उन्हें अलेसना ( आलस/लापरवाह ) नहीं होना है क्योंकि सरकार ने अभी फैसला बदला है, सोच नहीं बदली 

ज्यादातर बुजुर्गो की सोच थी कि सरकार धरने को उठाने के लिए ताकत के इस्तेमाल की भी सोच सकती हैं जिसके लिए अपने कुछ बंदे घुसाकर खालिस्तान के नारे लगवाए जा सकते है या छोटी मोटी हिंसक कार्यवाही कराई जा सकती हैं लेकिन उनके वालिंटियर इसके लिए भी तैयार है।

हालांकि ऐसी सोच वाले किसान भी मौजूद थे जिनके अनुसार मोड़ी के अहंकार को ज्यादा चोट ना पहुंचे इसके लिए सरकार रास्ता तलाश रही है और WTO तथा IMF की वजह से घुटने टेक कर एमएसपी को लीगल गारंटी नहीं दे रही।

इसके अलावा वर्तमान सरकार द्वारा की गई अन्य गलतियां भी सामने आने का खतरा मोदी जी के सलाहकारों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है जिसमे विदेशो में धार्मिक और अल्पसंख्यकों के विरूद्ध भेदभाव की खबरे या CAA जैसे मानवता के विरूद्ध बनाए गए कानून जिनमे कल ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स द्वारा कश्मीर के विषय पर भारत के विरूद्ध प्रदर्शन भी शामिल है।

कुल मिलाकर सरकार को समझदारी से काम लेते हुए सबसे पहले अपने मीडिया को नफरत फैलाने वाले कंटेंट्स खत्म करने का हुक्म देना चाहिए बेशक अब जनता ने भारत के न्यूज चैनल देखने कम कर दिए हो ( एक सर्वे के अनुसार भारतीय पंजाब और हरियाणा में 80% दर्शक वेब चैनल पर भरोसा करते हैं )

सरकार यदि किसानों से बातचीत शुरू करके नेक नियत से चाहे तो अभी भी समाधान निकल सकते है अन्यथा लस्सी ते लड़ाई, जिनी मर्जी वधा लो ।।

 

ਨਾ ਟਰੋਂ ਅਰਸੋ ਅਰ ਜਾਏ ਲਰੋ। ਨਿਸਚੈ ਕਰ ਅਪਨੀ ਜੀਤ ਕਰੋਂ ।।

जब आव की औध निदान परे, तब ही रण में तौंजूझ प्रौं । ना टरों अर्सुं अर जाय लरूं, निश्चय कर अपनी जीत करौं ।। अर्थात आवश्यकता और समय पर में युद्ध में युद्धरत हो जाऊं, निडरता से लड़ता हुआ, निश्चित रूप से अपने लिए विजय प्राप्त करूं।। ...

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