जिन्ना की चर्चा और बाहर से अंदर तक तनाव ही तनाव है। कारण सिर्फ एक और वो यूपी का चुनाव है।।

इसमें कोई शक नहीं है कि यदि राजनीति के घटिया स्तर और सियासी साजिशों को छोड़ दिया जाए तो हिंदुस्तान से बेहतर मुल्क कुर्रा ए अर्श पर दूसरा नहीं है। उसमे भी बहुल संस्कृति और सभ्यताओं वाला भारत लेकिन .....

और इसी लेकिन के साथ बहुत से किन्तु परन्तु जुड़ जाते है जिनमे से मुख्य है राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता पर काबिज होने की होड़ तथा राजनीति का अपराधीकरण जिसके लिए किसी एक विचारधारा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि हमाम में सब निर्वस्त्र होते है।

भारत में निरन्तर चलने वाले चुनावी उत्सवों में लोकसभा चुनाव के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण हिंदी भाषी या cow belt का उत्तर प्रदेश माना जा सकता है बेशक विकास के पायदान पर वो नीचे से ब्रोंज़ मेडल लेकर ग़रीबी में नाम रोशन कर रहा हो, स्वास्थ्य, शिक्षा और श्मशान भी वहां की सरकारों से हासिल करने की सोच अभी जनता में पैदा न हुई हो।

क्योंकि उत्तर प्रदेश की मानसिकता और कड़वी हकीकत दिल्ली या विदेशों में रहने वाले नहीं समझ सकते क्योंकि गांव कस्बों की सोच और एसी बंगलो के चिंतन शिविर उन्हे वहां तक सोचने की अनुमति नहीं देते। वैसे भी अपनी लक्सरी कारों से किसी क्षेत्र को देखने वाले कल्पना भी नहीं कर सकते कि सरकारी बसों में चढ़ने की सीढ़ियां भी गायब होती हैं।

फिर भी चुनाव होते है और सरकारें बनती हैं क्योंकि वोटिंग पैट्रन या तो जाति आधारित रहा है या अभी कुछ समय से धर्म और घृणा की संस्कृति को आधार बनाकर जीता - हारा गया।

कुछ समय पहले तक चुनावी विश्लेषकों की राय थी कि बेशक केंद्र सरकार की नीतियों से जनता को आर्थिक तकलीफों का सामना करना पड़ रहा हो लेकिन उत्त प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हिन्दुत्व वादी छवि और उत्तेजक भाषणों से बीजेपी ही दोबारा सत्ता में आएगी।

इसके पीछे एक कारण बीएसपी की बहन मायावती का उनके विरूद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों तथा ईडी सीबीआई द्वारा जेल भेजे जाने का डर बताया गया जिसके कारण वो बीजेपी का मुखर विरोध नहीं कर रही थी और राजनीति के हाशिए पर खुद ही धकेल दी गई थी।

समाजवादी पार्टी के साथ भी कुछ ऐसा ही बताया गया जिससे मुलायम सिंह को लालू प्रसाद बनने के दबाव में अखिलेश यादव ने विपक्ष की अहम भूमिका नहीं निभाई।

कांग्रेस क्योंकि लंबे समय से सत्ता से बाहर रही और कांग्रेस नेतृत्व के विरूद्ध चलाए गए व्हाटसएप यूनिवर्सिटी अभियान का असर यूपी में ज्यादा दिखाई दिया तो जब तक प्रियंका गांधी ने संघर्ष शुरू नहीं किया था तब तक कांग्रेस किसी खाते में भी नहीं मानी जाती थी। 

लेकिन जैसे जैसे चुनाव निकट आ रहे है परिस्थितियां भी बदल रही है और बीजेपी विरोधी जनता को समाजवादी पार्टी की रैलियों में भीड़ के रूप में देखा जा सकता है यद्धपि वो भीड़ वोटिंग के समय तक साथ देगी या नहीं कह नहीं सकते।

कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा की सभाओं में भी प्रधान मंत्री की रैलियों से अधिक भीड़ नजर आती हैं और बिना पैसा लिए या बिना लालच के आती हैं लेकिन बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का अभाव शायद कांग्रेस के लिए विचारणीय विषय हो सकता है।

इन्हीं के बीच अभी तक अपराजित समझे जाने वाले योगी आदित्यनाथ की भाषण शैली में परिवर्तन उनकी बौखलाहट जाहिर करता है शायद हार की दहशत से वो वापस हिन्दुत्व और जिन्ना, अब्बजान , पाकिस्तान पर लौट आए हैं।

इससे बेशक बीजेपी के हार की आशंका हो या ना हो किन्तु निर्विवाद पूर्ण रूप से जीत पर जरूर शक होता है और यदि आज का सर्वे देखा जाए तो आज कह सकते हैं कि शायद किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल ना भी हो।

यदि त्रिशंकु विधानसभा बनती है या चुनावों के बाद गठजोड़ करके सरकार बनाने की नौबत आती हैं तो कौन किंग मेकर होगा और क्या सम्भावना हो सकती हैं ?

बीजेपी को समर्थन देने वाली सबसे पहली पार्टी बीएसपी हो सकती हैं और इस स्थिति में बीजेपी मायावती जी को भी मुख्य मंत्री बनाने पर राजी हो सकती हैं शायद बीजेपी शीर्ष नेतृत्व चाहता भी यही है जिससे मोदी जी के लिए भविष्य में चुनौती बन सकने वाले योगी आदित्यनाथ को वापिस अपने मठ मंदिर में लौटना पड़ेगा।

फिर भी जरूरी पड़ने पर समाजवादी पार्टी बीजेपी को बाहर से समर्थन दे सकती हैं क्योंकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष परिवार पर भी पुरानी फाइलों का दबाव बनाया जा सकता है और अखिलेश यादव की मजबूरी होगी कि वो बीजेपी को मदद करे बेशक फेस सेविंग के लिए विधान सभा से वाक आउट या अपने विधायकों का पाला बदल दिखाया जाए कुछ ऐसा ही जैसा हरियाणा में दुष्यंत चौटाला से गले पर अंगूठा रखकर समर्थन लिया जा रहा है।

छोटे छोटे दल या अन्य किसी को कभी भी किसी भी ओर खरीदा बेचा जा सकता है यह गोबर पट्टी क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा है कि जनता अपने नेताओ से सवाल करने लायक सोच समाप्त कर चुकी है।

कांग्रेस पार्टी बेशक बहुत मेहनत कर रही है लेकिन शायद पार्टी के पास पैसे की कमी और नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं का अभाव कांग्रेस के बहुमत हासिल करने पर सवाल खड़ा करता है। इसके अतिरिक्त पुरानी पीढ़ी के सामंती सोच वाले नेताओ के जमीन और समाज से दूरी बनाकर रखना भी कांग्रेस के लिए नेगेटिव रोल अदा करता है।

इन सब संभावनाओं के साथ साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के प्रभाव को भी नजरंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि राकेश टिकैत के नेतृत्व में जिस प्रकार सामाजिक सौहार्द बनाए जाने की मुहिम ने बीजेपी को नुकसान पहुंचाया है उसकी भरपाई और वहां से किसानों द्वारा दिया जाने वाला समर्थन भी सभी गणनाओं को बदल सकता है।

अभी कुछ दिन और इंतजार करना चाहिए क्योंकि यदि किसान आंदोलन समाप्त होकर किसानों का विरोध खत्म हो जाता है तो शायद बीजेपी की कुछ उम्मीद जाग सकती हैं।

भारत की बिगड़ती कानून व्यवस्था एवम् मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होने के बावजूद बीजेपी सरकार तथा नौकरशाही द्वारा किया जा रहा अमानवीय व्यवहार।

यद्धपि News Number आमतौर पर सनसनी फैलाने वाली या अपराधिक घटनाओं की विवेचना से परहेज़ करता है लेकिन कभी कभी कुछ वाकयात जब दिल दिमाग को झिंझोड़ते हैं तो साझा करना पत्रकारिता का धर्म बन जाता हैं। ...