भारत के हिन्दुत्व प्रभावित क्षेत्र जहां दो प्रकार के हिन्दू रहते है। एक जो मन्दिर भी जा सकते हैं और घोड़ी पर बारात भी निकाल सकते है, दूसरे जो ये सब नहीं कर सकते।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने एक कार्यक्रम में बोला कि भारत में दो प्रकार के हिन्दू रहते हैं एक वो जिन्हे मन्दिर प्रवेश, घोड़ी पर बारात और युवकों को मुछे रखने की अनुमति होती है और दूसरे जिनके लिए यह सब सामाजिक अपराध माना जाता है।

आज सुबह की हिंदी अखबारों को देखे तो हैड लाइन में राजस्थान की किसी घटना का विवरण है जिसमे एक दलित दूल्हे की बारात पर पुलिस की मौजूदगी में पथराव किया गया जबकि दुल्हन के पिता ने दस दिन पहले पुलिस प्रशासन को सूचना दे दी थी कि उसके गांव के स्वर्ण जाति के लोग उसे धमकियां दे रहे हैं।

यद्धपि वृहद पंजाब में कभी ऐसी घटना सुनी नहीं गई ( पंजाब, हरियाणा और हिमाचल सहित ) यदि पंजाब में गुरुओं की शिक्षा का प्रभाव भी मान लिया जाए तब भी गैर सिख बहुल क्षेत्रों में भी जाति पाति का इतना घिनौना स्वरूप कभी सुनने में नहीं आया।

इसके अलावा एक और शोध का विषय होना चाहिए कि इस प्रकार की घटनाओं की टाइमिंग क्या होती हैं ? क्या इस प्रकार के दलित उत्पीड़न हमेशा ही होते रहते हैं ? क्या किसी विशेष क्षेत्र में अधिक होते है ? और सबसे महत्वपूर्ण कि कब कब और किस विचारधारा के मीडिया हाउस इन्हे जोर शोर से उछालते है ?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अचानक दलित उत्पीड़न के मामलो मे उछाल और उनको हाई लाइट करना बीजेपी की चुनावी रणनीति का हिस्सा है।

ख़ुद श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक बार कहा था कि यदि 31 प्रतिशत वोटर को अपने पक्ष में करके बाकी वोटों को विभिन्न दलों से बांट दिया जाए तो सत्ता पर काबिज होना आसान एवम् सुगम होता है।

क्योंकि उत्त प्रदेश सहित कई राज्यों में एंटी इंकमबेंसी है तो ऐसे में वोटर का एक तरफ रुझान बीजेपी के लिए समस्या पैदा कर सकता है दूसरा आरएसएस की आरक्षण विरोधी सोच के कारण भी पिछड़े एवम् दलित वर्ग का मोह भंग हो चुका है।

दलित या पिछड़े वर्ग के वोटो को यदि बीएसपी की ओर मोड़ दिया जाए तो बीजेपी का 17 प्रतिशत कोर वोटर और कुछ अन्य हिन्दुत्व वादी समूहों की मदद से भावनात्मक मुस्लिम अथवा पाकिस्तान विरोधी भाषण करके सरकार बनाने लायक जीत हासिल की जा सकती हैं ऐसा बीजेपी की सोच हो सकती हैं !

क्योंकि बेशक दलितों के लिए बीएसपी ने कुछ विशेष न किया हो लेकिन उनका भावनात्मक जुड़ाव तो रहा ही है और इसी के मद्दे नजर पूर्व सहयोगी अकाली दल ने पंजाब में बीएसपी से गठजोड़ किया है।

यदि दलित/पिछड़े वोटर फिर से टूट कर बिखर जाते है या बीएसपी की ओर मुड़ जाते है तो यह विपक्षी दलों के लिए नुकसानदेह साबित होगा।इसीलिए यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो बीजेपी समर्थक हिंदी समाचार पत्रों में इन खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है।

लेकिन क्या वर्तमान नई पीढ़ी आज भी यह महसूस कर सकती है कि पर्दे के पीछे क्या खेल चल रहा होगा तो इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा क्योंकि सदियों से दबे कुचले समाज का लक्ष्य उन्हे बतौर हिन्दू साबित करना है न कि शिक्षा और सोच के रास्ते पर आगे बढ़ना।

यदि पंजाब में सिख धर्म के प्रभाव के कारण छुआछात या जातिगत नफरत में कमी को छोड़ दिया जाए तब भी जातिगत घृणा के विरूद्ध महात्मा गांधी के बाद किसी ने भी कभी कोई मुहिम चलाई हो ऐसा महसूस नहीं होता।

बाकी तो वोटर्स को सोचना चाहिए कि उनकी आने पीढ़ियों के लिए क्या उचित है बेशक दिल्ली की सरहदों पर चल रहे किसान आंदोलन और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केवल किसान जाति की मुहिम ने एक दिशा दिखाई है लेकिन फिर भी मानना होगा --

दिल्ली दूर अस्त।।

 

 

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