किसान आंदोलन और बिल वापसी ! कितना सियासी, कितना मजबूरन ?

19 नवम्बर को भारत के प्रधानमन्त्री द्वारा खेती विरोधी कहे जा रहे पूंजीपति मित्रों की मदद वाले कानून वापिसी की घोषणा कर दी गई लेकिन किसानों ने आंदोलन वापिस लेने से इंकार कर दिया।

26 नवम्बर को फिर एक बार,आंदोलन के  एक साल पूरे होने पर सरकार को दिल्ली की सरहदों पर अपनी ताकत भी दिखा दी जिसके बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर का दिल्ली से वापिस लौट कर बयान आया कि एमएसपी पर कानून बनाना सम्भव ही नहीं है। उसी संदर्भ में मोदी सरकार के एक मंत्री रामदास आठवले ने बयान दिया कि अब किसानों को ताकत के इस्तेमाल से उठा देना चाहिए।

इसी दौरान कई बीजेपी नेताओ के बयान भी आए कि जरुरत पड़ने पर दोबारा कानून लाए जा सकते है जिसपर किसान नेताओ ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की शायद इसे सरकार की फेस सेविंग के लिए छोड़ दिया गया हो !

बीजेपी किसी भी कीमत पर यूपी चुनावों को ध्यान में रखते हुए यूपी सरकार से बाहर नहीं होना चाहती और प्रधान मंत्री श्री मोदी जी की सभाओं में खाली कुर्सियों ने उसकी यह चिंता और बढ़ा दी।

लेकिन किसान नेताओ ने भी मसल फ्लेक्सिंग जारी रखते हुए 22 नवम्बर की अपनी लखनऊ रैली से बीजेपी को चुनौती दी, 26 नवम्बर को भी अपनी ताकत दिखा दी जिसके दबाव में आज खेती मंत्री ने पराली को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने की घोषणा करते हुए फिर से आंदोलन वापिस लेने का निवेदन किया जिसके उत्तर में संयुक्त किसान मोर्चा ने 29 नवम्बर का अपना संसद तक ट्रैक्टर मार्च स्थगित कर दिया बेशक निरस्त नहीं किया।

एमएसपी पर सरकार कोई घोषणा WTO की बैठक के कारण नहीं कर रही थी जो फिलहाल करोना के कारण स्थगित हो गई है और सम्भव है कि इस विषय पर भारत सरकार एक स्थाई आयोग गठित करके किसानों को एमएसपी की लीगल गारंटी के लिए राज्य सरकारों से मांग करने की बात करके पल्ला झाड़ ले।

भारत सरकार के सियासी सलाहकार जितनी चतुराई से खेल खेल रहे हैं किसान नेता उनसे दो कदम आगे चलते हैं और इसी में उन्होंने मोदी मंडल से गृहराज्य मंत्री को बर्खास्त करने की मांग पर जोर देना शुरू कर दिया है जो मोड़ी सरकार के लिए गले की हड्डी बन चुका है क्योंकि यदि वो बरखास्त किया जाता हैं तो इसे किसान आंदोलन की बड़ी जीत समझा जाएगा और यदि नहीं तो फिर सब कुछ नहीं है।

इसके अतिरिक्त ऐसा भी समझा जा रहा है कि कुछ किसान नेता आने वाले चुनावों में अपना प्रतिनिधित्व विधान सभा में भेजने के इच्छुक है जिनके जीतने की बेहतर उम्मीद लगती हैं।

केंद्र सरकार के सामने चीन और पाकिस्तान की ओर से युद्ध भी एक चिंता का विषय था क्योंकि हरियाणा और पंजाब के किसानों के बच्चे ही अग्रिम मोर्चो पर तैनात है जिन्हे चीन द्वारा बड़े बड़े स्पीकर लगाकर पंजाबी गाने तथा भड़काऊ भाषण सुनाकर नकारात्मक दिशा में मोटिवेट करने के समाचार मिले हैं।

इन्हीं कारणों से भारत सरकार मजबूर होकर किसानों की मांगे माननी शुरू कर चुकी है लेकिन किसान भी जब इतनी कुर्बानियां दे चुके हैं तो फतेह बुला कर ही इतिहास बनाने पर आमदा है और उम्मीद है कि ऐसा ही होगा।

आज संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक के बाद प्रोफेसर दर्शन सिंह की प्रेस मीटिंग के बाद तो कुछ ऐसा ही अहसास हुआ बेशक सरकार सोच रही हो कि एक बार पांचों राज्यों के चुनावों में कामयाबी हासिल हो जाए फिर तो कानून क्या संविधान भी नया बना लेंगे हालांकि अब किसानों द्वारा जागृत की जा चुकी जनता शायद ऐसा ना होने दें।

फिर भी उम्मीद करनी चाहिए कि चुनावी आचार संहिता लागू होने से पहले कोई समाधान निकल जाएगा क्योंकि अनंत काल तक तो सरकार की भी हिम्मत नहीं है कि जलील होती रहे।

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