पंजाब चुनाव प्रचार या पंजाबियत को खत्म करने की साज़िश ?

कुल पांच राज्यों के चुनावों में भारत के सभी बड़े राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण उत्त प्रदेश एवम् पंजाब ही है क्योंकि बीजेपी की केंद्र सरकार के लिए भी अलग अलग कारणों से इनकी महत्ता समझी जा रही है।

उत्त प्रदेश के चुनावों को महत्व देना इसलिए जरूरी है क्योंकि सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है और लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें वहीं से आती हैं बेशक श्री नरेंद्र मोदी जी भी उसी प्रदेश से सांसद चुने गए हैं।

पंजाब के चुनावों का महत्व किसान आंदोलन के अतिरिक्त पंजाबी बहुल राज्य के कारण तो है ही साथ ही सीमावर्ती राज्य होने और पंजाबियों का सेना में महत्वपूर्ण योगदान एवम् विदेशो में भारत सरकार की साख के लिए भी बहुत अहमियत रखता है।

लेकिन जिस संस्कृति और सभ्यता के लिए पंजाब या पंजाबी विश्व भर में जाने जाते हैं और जिस दिलेरी एवम् हक हलाल से मेहनत की कमाई की शिक्षा के साथ बड़े होते है उसी का विनाश करने की मुहिम शुरू हो चुकी हैं।

कहते हैं कि यदि किसी देश को खत्म करना मुश्किल लगता हो तो पहले उसकी संस्कृति खत्म कर दो और लालच की अफीम से सभ्यता खत्म करने के बाद आसानी से जीत लो।

खुशवंत सिंह जो खुद सिख परिवार में जन्म लेने के बावजूद खुद को घोर नास्तिक कहते थे उन्होंने एक बार लिखा था कि शायद भविष्य में राजनीतिक साजिशों के कारण पंजाबियत किताबो की कहानियों तक सीमित रह जाएगी।

वर्तमान में उनके कथन को हकीकत में बदलता महसूस किया जा सकता है जिसकी शुरुआत आरएसएस से प्रशिक्षित दिल्ली के मुख्यमंत्री ने की और पहली घोषणा में घरों के लिए कुछ बिजली मुफ्त तथा महिलाओ को एक एक हजार रूपए महीने देने के वायदे के साथ की क्योंकि वो जानता है कि पंजाब में कुची/झाड़ू की सफलता फिलहाल तो सम्भव नहीं है।

उसको देखकर बाकी दलों ने भी मुफ्त मुफ्त मुफ़्त के बोर्ड लगा दिए बेशक बाद में सबके वायदे 15 लाख वाले निकल जाए। इसमें कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह हो या अकाली दल के बादल परिवार आजकल सभी अन उत्पादक क्षेत्रों के लिए मुफ्तखोरी की स्कीमें लेकर बैठे है।

ध्यान रखें कि किसानों को मदद के तौर पर दी जाने वाली फ्री बिजली या पानी आखिरकार ज्यादा रिटर्न देती हैं क्योंकि उससे उतना ही उत्पादन बढ़ता है लेकिन घरों में बैठकर मुफ्त पैसा बांटना पंजाबियों की मेहनतकश संस्कृति के विरूद्ध है और केजरीवाल ने ऐसी घोषणा केवल पंजाब पर काबिज होते जा रहे भैय्या समाज के लिए की है या किसी के इशारे पर दान दक्षिणा की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए।

केजरीवाल की देखा देखी वर्तमान मुख्यमंत्री चन्नी ने भी घोषणाएं शुरू कर दी और अकाली दल के बादल साहब ने भी, जिसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना कह सकते हैं।

यहां सबसे बड़ी जिम्मेदारी पढ़े लिखे पंजाबी युवा पीढ़ी की बनती हैं जो सवाल खड़े करे कि कांग्रेस से लेकर अकाली दल और आम आदमी पार्टी वाले भी नए रोजगार, नए स्कूल कॉलेज, नए अस्पताल आदि की बात क्यों नहीं करते ?

ब्रेन ड्रेन या मेहनत का पलायन देखना हो तो दोआबा पंजाब के किसी भी गांव में जाकर देखा जा सकता है और रूपनगर ( रोपड़ ) या नवां शहर जैसे शहरों के शानदार मकानों में देखा जा सकता है जहां के युवा विदेशों में खून पसीना एक करके वहां के विकास में योगदान देने के लिए मजबूर हैं और उनके शहर, गलियों, घरों और खेतो में बिहार या उत्त प्रदेश के भैय्या लोग काबिज है।

क्यों नहीं वर्तमान राजनीतिक पार्टियां अपने वोटरों को यकीन के साथ कोई ऐसी योजना बताते जिससे पंजाब से बिछड़े बच्चे वापस आकर अपनी धरती पर कुछ करके दिखाए क्योंकि जो दूसरे कोने में बसे कनाडा को बसा सकते है वो अपना घर क्यों नहीं बनाएंगे।

पंजाबी वोटरों को सख्ती से खाली पतीलों में कड़छी घुमा कर मूर्ख बना रहे सभी नेताओ के सामने तन कर खड़े होकर सवाल पूछने चाहिए क्योंकि ये नेता जनता से बने हैं न कि जनता इन नेताओ से।

वैसे भी वोटर एक ही सवा लाख के बराबर होता है बेशक उसके जागने की देर है।

वृहत हिंदुस्तान के टूटने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है और हमेशा इस टूट के पीछे हिटलर जैसी सोच रही है कि वो ही सर्वश्रेष्ठ है।

कहते है जब बाबर हिंदुस्तान में आया तो उसने लिखा कि धरती पर यदि कुदरत ने अपना सबसे ज्यादा खजाना लुटाया है तो वो हिंदुस्तान की सरजमीं है। बेशक उसके बाद शाहजहां ने कश्मीर को देखकर बोला था कि यदि कहीं स्वर्ग है तो वो यहीं है, यहीं है। ...

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