और इसी के साथ विश्व इतिहास में अहिंसक आंदोलन का इतिहास कायम हो गया !

26 नवम्बर एक ओर भारत सरकार संविधान दिवस के नाम पर उत्सव आयोजित करते हुए माननीय राष्ट्रपति से लेकर प्रधान मंत्री तक लोकतंत्र और संविधान के गुणगान में व्यस्त थे दूसरी ओर मुंबई हमले में शहीदों के परिवार अपनों को याद कर रहे थे तो दिल्ली की सरहदों पर असंख्य किसानों की उपस्थिति तानाशाही को चुनौती दे रही थी।

26 नवम्बर !

भारतीय इतिहास का कभी ना भूलने वाला दिन क्योंकि इसी दिन कथित रूप से गुजरात के रास्ते मुंबई पहुंचे आतंकियों ने कहर बरपाया था बेशक उसके पीछे पूर्व पुलिस अधिकारी की किताब "Who killed Karkare" में बहुत से संदेह भी व्यक्त किए गए थे और उनकी पुष्टि अब हो रही है क्योंकि अजमल कसाब से पकड़े गए मोबाइल फोन को पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह ने गायब कर दिया था जिसमे शायद स्थानीय सम्पर्क सुरक्षित थे।

मुंबई घटना के बाद समय अपनी गति से चलता रहा और 2014 में एक ऐसी सरकार सत्ता में आई जिसकी विचारधारा से बहुत से भारतीय नागरिक सहमत नहीं थे क्योंकि इन्हे पूंजीपतियों की सहयोगी पार्टी समझा जाता था।

अपने ऊपर लगे क्रोनी कैपिटलिजम के कलंक को सही साबित करते हुए मोड़ी जी के नेतृत्व वाली सरकार ने अध्यादेशों के माध्यम से तीन कानून लागू कर दिए जिन्हे किसानों ने काले कानूनों का नाम दिया और पंजाब में इन्हे रद्द करने के लिए ट्रेन रोको आंदोलन शुरू कर दिया।

कोई सुनवाई ना होती देख कर किसानों ने घोषणा कर दी कि वो 26 नवम्बर 2020 को दिल्ली में धरना शुरू करेंगे और इसी के साथ हज़ारों ट्रैक्टर ट्रॉली किसानों को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ चली।

लेकिन रास्ते में हरियाणा की बीजेपी शासित सरकार ने वो सब कर दिखाया जिसकी इजाजत ना संविधान देता है, ना कानूनी रूप से जायज़ है और ना ही किसी लोकतांत्रिक देश के लिए उचित ठहराया जा सकता है।

नेशनल हाईवे जिन पर राज्य सरकार का कोई अधिकार नहीं होता उसमे गहरी खाईया खोद दी गई, जगह जगह भारी भरकम बेरीकेट्स लगा दिए गए और हरियाणा पंजाब की सीमा पर वाटर कैनन सहित सुरक्षा कर्म ऐसे तैनात कर दिए गए जैसे किसी विदेशी सेना ने हमला कर दिया हो।

पाकिस्तानी पंजाब के सबसे पिछड़े इलाके के हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर को शायद यह याद नहीं रहा कि पंजाबियों का मतलब ही बेखौफ फतेह होता है तभी तो पेशावर तक निशान साहब झूल गया था।

अंततः किसानी जत्था दिल्ली की सरहदों तक पहुंच गया। इसके बाद...

एक साल पूरा एक साल जिसमे 4 मौसम, 12 महीने, 52 हफ्ते और 365 दिन अपने घर परिवारों, खेत खलिहानों से दूर गद्दों पर सोने वाले किसनों ने ट्रैक्टर ट्रॉली को ही अपना घर बनाकर सर्दी, गरमी, बरसात के साथ साथ अपने सम्मान की लड़ाई भी लडी जिसमे एक उदाहरण कल अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सीएनएन ने अपनी स्टोरी में बताया है कि कैसे कैलिफोर्निया के कार्डियोलोजिस्ट जिनकी फीस 300 डॉलर है सबकुछ छोड़कर किसानों की सेवा में निशुल्क सेवा भावना से लग गए।

भारत के प्रधान मंत्री ने टीवी घोषणा करते हुए किसानी बिल वापिस लेने का संबोधन किया लेकिन किसानों की बाकी मांगो पर चुप्पी साध ली, किसानों के नरसंहार के आरोपी के पिता गृहराज्यमंत्री को यूपी में अपने साथ मंच पर बैठा कर किसानों को चिढ़ाने की कोशिश की, पंजाब के किसानों के कनाडा में रह रहे बच्चो के लिए भारतीय वीजा बंद कर दिए और पूर्व में भारत सरकार द्वारा जारी ओसीआई कार्ड निरस्त कर दिए लेकिन अपनी मीडिया से डुगडुगी बजवाई या चारन गीत ( भांड मिरासयो के गाने ) गवाए कि हजूर सरकार ए आला बहुत संवेदनशील हैं और दुख दर्द समझती है।

क्योंकि धान की कटाई चल रही थी तो कुछ किसान अपने घर भी गए होने लिहाजा सरकार ने समझा कि मोर्चा तोड़ने में सरकार की चाल कामयाब हो गई।

लेकिन आज आंदोलन की वर्षगांठ के अवसर पर पहली अधूरी जीत के साथ दूर दूर से हाजिर किसानों और किसान महिलाओ ने उपस्थित होकर अहसास करा दिया कि अभी भी संघी मानसिकता वाले नेता एवम् अफसर पंजाब और पंजाबी संस्कृति से वाकिफ नहीं है।

गाजीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत के नेतृत्व में हज़ारों किसान उत्त प्रदेश एवम् उत्तराखंड से हाजिर थे तो सिंधु बॉर्डर पर हरियाणा, दोआबा और माझा तक से किसान ट्रैक्टर ट्रॉली के साथ फतेह बुलंद कर रहे है साथ ही टिकरी बॉर्डर पर मालवा तथा हरियाणा, राजस्थान के किसानों ने धुम्मा ठा रक्खा था।

सरकार को फिर एक बार सोचना चाहिए कि NO FARMER NO FOOD यदि अटल सत्य है तो किसानों को जितना असम्भव है क्योंकि देश इन्हीं से है सरकार इन्हीं से है न कि ये सरकारों से है।

टाटा, बिरला से लेकर अंबानी तक धनकुबेर होने के बदलते प्रतीक चिंह !

देश की आज़ादी से पहले भी नगर सेठ होते थे और दिल्ली में लाला छुन्नामाल जैसे बहुत से नाम इज्जत से इतिहास का हिस्सा हैं जो मुगलिया तख्त को भी पैसा उधार देने की कुव्वत रखते थे। ...