निमनिया दा मान, नी ओटेया दी ओट ! तू बिछड़ो को मिलाए, तभी तो ब्रह्म कहाए ।।

1947 हिंदुस्तान की आज़ादी और पंजाब तथा बंगाल के सीनो पर बटवारे का खंजर जिसके दर्द से न जाने कितने इंसानों ने खून के आंसू रोए होंगे बेशक सियासतदानों के पत्थर दिल नहीं पिघले। 

कल्पना करना भी मुश्किल है कि जिन परिवारों की असंख्य पुश्ते जिस सर जमीन को अपना कहती और समझती थी वो एक झटके में पराई हो गई तथा जिस समाज की भाषा, बोली और सभ्याचार समझ भी नहीं आता था उसे ही आइंदा के लिए उनका मुल्क बता दिया गया।

सतलुज, रावी, चेनाब याद रखने वाले बच्चे अब गंगा जमुना और घाघरा का पाठ पढ़ने के लिए मजबूर थे, जो सिर्फ खत्री या अरोड़ा कहलाते थे उन्हे बताया गया कि अब वो हिन्दू कहलाएंगे और गुरूद्वारे के साथ साथ मन्दिर भी जाया करेंगे, रामलीला तथा रासलीला भी देखेंगे क्योंकि यहां की संस्कृति यही है।

दूसरी ओर जाने वालों को बताया गया था कि उनका ईमान और भी पक्का होगा क्योंकि उन्होंने अपने बुजुर्गों की कब्रों को भी छोड़कर नए बने मुल्क में हिजरत की है जो इंशाअल्लाह जन्नत से भी आला होगा बेशक 74 साल बाद भी वो मुहाजिर और उनकी तीसरी चौथी पीढ़ी उर्दू स्पीकिंग कहलाती हैं जिन्हे गांव देहात के पंजाबी अपना जैसा नहीं समझते क्योंकि बकौल उनके "ए गोबर पट्टी दे रहन आले ने, कन्द्दा ( दीवारों ) ते थापिया थपदे ने"

इन्हीं के बीच एक परमेश्वर स्वरूप आराम से देख रहा था कि मूर्खो की मूर्खता किस हद तक पहुंच सकती हैं और करतार पुर साहिब की पावन भूमि से सच्चे दिल इंसानों को दुआएं भी दे रहा था बेशक उसे हिन्दू, मुस्लिम,या जाति धर्म का अंतर नहीं पड़ता।

दो साल पहले न जाने किसके आशीर्वाद से करतार पुर कॉरिडोर बना और लगभग 20 महीने बंद रहने के बाद पिछले हफ्ते फिर खोला गया।

भारत से 94 वर्षीय सरदार गोपाल सिंह ने भी दर्शन करने की इच्छा जताई तो उधर पाकिस्तान के नारोवाल से 91 वर्षीय मोहम्मद बशीर के मन में भी आया कि चलो रौनक मेला देख आते है।

विधि का विधान और दोनों टकरा गए, सरदार जी ने पूछा वे तू बशीर ए, बशीरया तू वी एत्थे , कौन सरदार जी ? तू गोपाल ए गोपाल सिंह !

और उसके बाद दो बदन इक जान कुछ बोल नहीं पाए, कोई शब्द, कोई अल्फ़ाज़ उनके आंसुओं का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और इस प्रकार एक ऐसी भावुक सत्य घटना सामने आ गई जिसे आज यदि कोई साझा नहीं करेगा तो वो निसंदेह संवेदनहीन ही होगा।

हालांकि ऐसी और इससे भी अधिक द्रवित कर देने वाले बहुत से वाकयात है लेकिन यह उनके मूंह पर तमाचा है जो धर्मांधता का जहर घोलकर समाज को टुकड़ों में बांटना चाहते हैं।

74 साल बाद मिले दोनों दोस्तों ने बताया कि कैसे बचपन में वो इकट्ठे गुरूद्वारे जाकर लंगर छका करते थे और हसते खेलते साथ साथ आते जाते थे लेकिन वक्त खराब था कि बिछुड़ गए।

वैसे भी पंजाबी किसी का प्यार, अहसान, गद्दारी और दुश्मनी 300 साल तक भी नहीं भूलते फिर ये तो बचपन की दोस्ती थी जो संदेश देती हैं कि आज भारत और पाकिस्तान जितना खर्च किसी युद्ध की आशंका में कर रहे हैं यदि यही संसाधन शत्रुता छोड़कर इंसानी तरक्की के लिए करे तो सदियों तक दुआए प्राप्त करते रहेंगे।