महात्मा गांधी और अंग्रेज़ो से लोहा लेने वाले तत्कालीन नेता महान क्यों कहलाते है ?

भारत के राज्य महाराष्ट्र और आर्थिक राजधानी मुंबई से लगातार हो रहे खुलासों से आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े की नीदें तो बेशक उड़ी ही होंगी लेकिन नवाब मलिक द्वारा नित नए खुलासों से एक बार तो सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि हिंदुस्तान की जनता महात्मा गांधी, नेहरू, सुभाष आदि को महान क्यों कहती है और दूसरी ओर जिन्ना को भी इसी श्रेणी में क्यो रखा जाता हैं हालांकि भारतीयों के लिए मोहम्मद अली जिन्ना केवल बटवारा करने का जिम्मेदार ठहरा कर दोषी करार दे दिया गया।

क्योंकि यहां विषय महात्मा गांधी और कायदे आजम जिन्ना की तुलना करने का नहीं है इसलिए किसी विवाद में न पड़कर केवल इनके महान होने का तर्क तलाश करना चाहिए।

इनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि इन्होंने जनता के दिल से साम्राज्य का डर समाप्त कर दिया था और अहिंसक तरीके से अपनी जायज़ मांगो पर साम्राज्य को विवश कर दिया था कि वो अपनी हिन्द विरोधी तपस्या छोड़कर सरेंडर कर दे बेशक उसके लिए पगड़ी सम्भाल जट्टा जैसे लंबे किसान आंदोलन करने पड़े हो।

क्योंकि सरकार और सरकारी तंत्र अकूत शक्तिशाली होता है तो सरकार से टक्कर लेने के लिए किसी भी नेता को मनसा वाचा कर्मणा ईमानदार होना और निष्कलंक होना पहली शर्त है।

इसका ताजा उदाहरण महाराष्ट्र में नियुक्त नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के जोनल कमिश्नर समीर वानखेड़े है जिसने जैसा कि आरोप लग रहे हैं नाजायज उगाही और वसूली के साथ साथ ब्लैकमेलिंग हेतु महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नवाब मलिक के दामाद तथा प्रसिद्ध हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के शाहरुख खान के बेटे को उठा लिया या झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर लिया था।

क्योंकि नवाब मलिक के दामाद को लंबे समय तक जेल से बाहर नहीं आने दिया गया तो बतौर मंत्री नवाब मलिक ने भी इस खेल का पर्दाफाश करने का निश्चय कर लिया।

समीर वानखेड़े के मुस्लिम होने के बावजूद पिछड़ी जाति का हिन्दू बताकर सरकारी नौकरी लेने से लेकर कई आरोपों के सबूत नवाब मलिक प्रस्तुत कर रहे है जो निश्चित रूप से उन्होंने सरकारी तंत्र की मदद से ही जुटाए होंगे।

यहां कल्पना करे कि क्या अंग्रेज़ सरकार ने महात्मा गांधी या अन्य नेताओ के विरूद्ध उनकी गलतियां तलाशने की कोशिश नहीं की होगी ? क्या उनके निजी जीवन से जुड़ी कोई हेराफेरी ढूंढ कर उनका चरित्र हनन करने की साज़िश नहीं रची होगी ? क्या महाराजा दलीप सिंह की तरह उन्हे किसी जाल में फंसाकर अपनी कुटिल नीति की सफलता के लिए प्रयत्न नहीं किया होगा ?

निश्चित रूप से ब्रिटिश थिंक टैंक ने ऐसी कोशिशें की होंगी लेकिन क्योंकि इनके चरित्र इतने साफ और बेदाग थे कि वो भी इनकी सच्चाई और ईमानदारी से मात खा गए।

किन्तु समीर वानखेड़े जैसे अधिकारी के बार मालिक होने से लेकर अन्य कई करामाती काम सबूतों के साथ नित्य सामने आ रहे हैं और आशंका है कि ऐसी परिस्थितियों में वो देश छोड़कर भी भाग सकता है वैसे कहते तो यह भी है कि यदि उसको कोई बड़ा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त न होता तो वो आत्महत्या कर चुका होता क्योंकि कभी कभी सफेद कपड़ों में बड़े बड़े अपराधी भी राजनेता बनकर सम्मान प्राप्त कर लेते है जिसका एक छोटा सा उदाहरण लखीमपुर खीरी में किसानों को कुचलकर नरसंहार करने के आरोपी का पिता भारत का गृहराज्य मंत्री है।

इसी कड़ी में दूसरा नाम पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह का सामने आना शुरू हुआ है जिसके आरोपों के कारण महाराष्ट्र के गृह मंत्री देशमुख को न केवल इस्तीफा देना पड़ा अपितु जेल भी जाना पड़ा।

उसी पुलिस कमिश्नर के विरूद्ध कई आरोपों के साथ साथ आज खुलासा हुआ है आरोप है कि उसका हाथ 26/11 मुंबई आतंकवादी घटना में आतंकियों को सहयोग देने का था क्योंकि उसने पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब का मोबाइल फोन गायब कर दिया था जिससे कई अहम सबूत नहीं मिल सके।

इसीलिए कहते है कि सरकार से टकराने से पहले इंसान को अपने ईमान का मजबूत होना चाहिए और वैसे भी जिनके घर शीशे के होते हैं उनके लिए पत्थरबाजी से दूर रहना ही बेहतर होता है।