दक्षिण एशिया ( अविभाजित हिंदुस्तान ) का एक ऐसा सितारा जिसे 1947 के पार्टिशन ने बांट दिया।

कला और संस्कृति के क्षेत्र में हिंदुस्तान बिना किसी शक और सुबाह के दुनियां का सबसे बेहतर मुकाम रहा है लेकिन आज़ादी के साथ ही बटवारा और उसके साथ ही धर्म के आधार पर राजनीति के लिए ध्रुवीकरण इस क्षेत्र के माथे पर केवल कलंक ही कहला सकता है।

अविभाजित हिंदुस्तान के बहुत से सितारे ऐसे हुए हैं जिन पर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों को गर्व करना चाहिए क्योंकि वो इसी वृहद हिंदुस्तान की अमानत थे लेकिन उनमें से कई हमने पार्टिशन के बाद इधर उधर के बना दिए। ऐसी ही एक महान शख्सियत बड़े गुलाम अली खान साहब की जीवन यात्रा विनोद छाबड़ा की कलम से।

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां और के.आसिफ़ 

शास्त्रीय संगीत और गायन की नामचीन हस्ती उस्ताद बड़े गुलाम अली खां विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे. लेकिन उन्हें पाकिस्तान रास नहीं आया. वो भारत लौट आये. तत्कालीन गृहमंत्री मोरारजी देसाई की मदद से भारत में स्थाई रूप से रहने का उन्हें वीज़ा मिल गया. वो बंबई में रहने लगे. मगर सिनेमा से बहुत दूर भागते थे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां. 

सिनेमा के ख़लीफ़ा माने गए के.आसिफ़ उन दिनों एक महंगी फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' बना रहे थे. सिचुएशन के हिसाब से दो सीन में कोई धीर-गंभीर आवाज़ की ज़रूरत महसूस हो रही थी. संगीतकार नौशाद अली ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का नाम सुझाया. 

आसिफ बोले - परेशानी क्या है? बुला लो. 

नौशाद थोड़ा गंभीर हुए - कोई आसान नहीं है यह. उस्ताद को फिल्मों से सख़्त ऐतराज है. और दूसरी बात यह कि वो यूं बुलावे से नहीं आएंगे. बहुत बड़े क़द के कलाकार हैं. आपको खुद जाना होगा. 

के.आसिफ़ अपनी फिल्म की बेहतरी के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. बोले - तो इसमें सोचने की क्या बात है. अभी चलते हैं. 

के.आसिफ़ और नौशाद साब पहुंचे उस्ताद के द्वार. नौशाद साहब बहुत डरे हुए थे. उस्ताद मानेंगे नहीं और के. आसिफ़ महा के ज़िद्दी. कोई बड़ा हंगामा न खड़ा हो जाए. उस्ताद बड़े गुलाम अली खां ने बड़ी शान्ति से पूरा माज़रा सुना और नौशाद साहब को जैसी कि उम्मीद थी, साफ़ मना कर दिया. इधर के.आसिफ़ अपने प्रस्ताव पर न सुनने के आदी नहीं थे. बोले - मुंह मांगी कीमत दूंगा. मैं कोई फिल्म नहीं तस्वीर बना रहा हूं. बहुत बड़ा शाहकार.  

उस्ताद ने तब भी ना-नुकुर जारी रखी. लेकिन के.आसिफ़ भी हार मान कर लौटने वालों में से नहीं थे. 

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब समझ गए कि आसिफ़ यूं भागने वालों में से नहीं है. सोचा ऊंची रकम मांग लूं तो शायद भाग जाएँ. बोले - तो ठीक है आसिफ़. मैं गाऊंगा ज़रूर. लेकिन मेरी फ़ीस रूपए पच्चीस हज़ार फी गाना के हिसाब से होगी.  

उन दिनों रफ़ी और लता जैसे क्लास-वन सिंगर की फीस पांच सौ रूपए हुआ करती थी. नौशाद अली समझ रहे थे कि उस्ताद बहुत ज्यादती कर रहे हैं. लेकिन इधर महा ज़िद्दी आसिफ़ को तो धुन सवार थी. सिगरेट का लंबा कश खींचा और चुटकी बजा राख झाड़ते हुए बोले - दिए. अब चलिए उस्ताद जी. रिकॉर्डिंग कराएं. 

अब उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के सामने कोई चारा नहीं था. फंस गए. और यह दो गाने थे - 

१) प्रेम जोगन बनके सुंदरी…और 

२) शुभ दिन आयो राज दुलारा…

स्क्रीन पर उस्ताद की आवाज़ अपने ज़माने के मशहूर सिंगिंग स्टार सुरेंद्र को दी गयी. इसमें वो तानसेन की भूमिका कर रहे थे. संदर्भ के लिए बताना ज़रूरी है कि सुरेंद्र को उस ज़माने के एक और क्लासिकल सिंगर उस्ताद अमीर अली खां की आवाज़ भी 'बैजू बावरा' (1952) में मिली थी. प्रेम जोगन… दिलीप कुमार और मधुबाला के लव-सीन की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया था.

उन दिनों दिलीप-मधुबाला में महाशांति युद्ध चल रहा था. एक-दूसरे से बात तक नहीं होती थी. लेकिन इस गाने के फिल्मांकन के दौरान उभरे प्रेम जज़्बात दुनिया में श्रेष्ठतम माने गए।