हिटलर ने आत्महत्या क्यों की थी और उस्मानिया सल्तनत के अंतिम ख़लीफा ने फ्रांस में जीवन क्यो बिताया था ?

लगभग एक साल से दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसान आंदोलन और भारत सरकार की हठधर्मिता के बीच 19 तारीख को भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा टीवी पर घोषणा की गई कि भारत सरकार तीनों किसान विरोधी कानूनों को वापिस लेने का निर्णय कर चुकी है।

हालांकि इस घोषणा से पहले प्रधानमंत्री द्वारा अपनी केबिनेट , कृषि मंत्री या किसानों से किसी सलाह मशवरे का कोई समाचार नहीं मिला जिसे श्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली समझा जा सकता है बेशक यह उचित है या अनुचित या लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार नहीं है।

इस घोषणा के बाद भी किसान आंदोलन कर रहे किसान नेताओ और संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा धरना चालू रखने की घोषणा कर दी गई तथा कार्यक्रम अनुसार यूपी की राजधानी में महा पंचायत करके सरकार को सीधी चुनौती दी गई।

क्योंकि बतौर मुख्यमंत्री गुजरात, नरेंद्र मोदी खुद किसानों के लिए एमएसपी को वैधानिक स्तर देने के पक्षधर थे तो किसानों को उम्मीद थी कि शायद बिल वापसी के साथ साथ एमएसपी गारंटी कानून भी इस सरकार द्वारा दिया जा सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसके पीछे एक मुख्य कारण वर्तमान सरकार का पश्चिमी ताकतों के सामने आत्मसमर्पण करना भी समझा जा सकता है क्योंकि आईएमएफ और WTO के सामने तन कर खड़े होने की क्षमता इस नेतृत्व में है ऐसा प्रतीत नहीं होता।

30 नवम्बर से तीन दिन का मंत्री स्तरीय सम्मेलन वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन द्वारा जेनेवा में आयोजित किया जाने वाला है और WTO किसी प्रकार की भी सहायता देकर किसानों या आम जनता को मदद देने के विरूद्ध है तो सम्भव है कि इसी दबाव के कारण सरकार ने एमएसपी के प्रश्न पर चुप्पी साध रखी हो।

क्योंकि श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी छवि एक सर्वशक्तिमान नेता के रूप मे खुद ही गढ़ी है तो उनके लिए कदम पीछे उठाना खुद सामने रखे आईने को धूमिल करने जैसा होगा।

अक्सर इस प्रकार की सोच वाले नेतृत्व के लिए अपने कहे हुए बयानात और स्वयंभू छवि से बाहर निकलना बहुत कठिन होता हैं तथा ऐसा निर्णय उन्हे मानसिक तौर पर अंदर तक न केवल तोड़ देता है अपितु गहरे अवसाद का कारण भी बन सकता है।

यदि ख़लीफा की तरह खुद को ईश्वर की इच्छा अनुसार चलने और सेवा करने की मानसिकता हो तो किसी भी कठिन परिस्थिति में मानसिक संतुलन बना रहता है।

क्योंकि WTO के अनुसार कोई भी सरकार अधिकतम दस प्रतिशत सब्सिडी दे सकती हैं और एमएसपी को WTO सब्सिडी मानता है तो फिलहाल सम्भव नहीं लगता ये सरकार उसकी हुक्म अदुली करने का साहस दिखा पाएगी।

बेशक अमेरिका और कनाडा द्वारा अपने किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी को वो नजरंदाज करते हो।

विश्व या पूंजीपति शक्तियों के आगे एक बार नतमस्तक होने का अर्थ होता हैं कि उनके सामने पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया जाए जो भारत जैसे बड़े देश को नहीं करना चाहिए।

फिर भी आशा करनी चाहिए कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन की बैठक के बाद दिसम्बर प्रथम सप्ताह में भारत सरकार कुछ हिम्मत दिखाते हुए किसान संगठनों से बातचीत करेगी और आंदोलन कर रहे किसान सम्मान सहित अपने अपने घरों, खेत खलिहानों को वापिस लौट जाएंगे।

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