पिता पर पुत्र/पुत्री का भरोसा टूट जाए तो घर टूटने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता !

किसी भी सामाजिक और पारिवारिक व्यक्ति ने न केवल देखा होगा अपितु खुद भी अनुभव किया होगा कि पिता, चाचा या घर का कोई बड़ा बच्चे को ऊंची जगह पर खड़ा करके बांहे फैला कर कूदने के लिए कहता है।

बच्चा बिना हिचक कूद जाता हैं क्योंकि उसे भरोसा होता है कि जिसके कहने पर वो छलांग लगाने जा रहा/रही हैं वो उसको गिरने नहीं देगा और कोई चोट नहीं लगने दे सकता बेशक इसके लिए कोई संसदीय प्रस्ताव या कानून या अदालती हलफनामा नहीं दिया गया होता।

बेटे/ बेटी का अपने पिता के प्रति यह भरोसा जीवन पर्यन्त तो बना रहता है अपितु माता पिता द्वारा जीवन यात्रा पूर्ण किए जाने के बाद भी बच्चे यही कहते है कि उनके लिए सबसे ज्यादा यदि कोई सोचता था तो वो माता पिता थे और उनकी न जाने किसने इच्छाओं  की कुर्बानी की बुनियाद पर बच्चो का जीवन खड़ा होता है। यही कड़ी आगे से आगे चलती रहती हैं।

लेकिन यदि यह आंतरिक भरोसा टूट जाए तो ? तो समाज बिखर जाएगा, परिवार टूट जायेंगे और इंसान फिर से जंगली जानवर जैसा बन जाएगा।

भारत के प्रधान मंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में तीन कानून पास किए गए जिन्हे पहले अध्यादेश के रूप में लाया गया था, कानूनों को पास करने की प्रक्रिया पर भी कई सवाल खड़े हुए लेकिन अंततः कानून बन गया।

किसानों ने इन्हे खेती विरूद्ध और कॉरपोरेट मित्रों के लिए बताते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू किया जिसकी जानकारी दोहराने की जरूरत नहीं है।

19 नवम्बर को सुबह 9 बजे अचानक भारतीय प्रधान मंत्री जी ने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए घोषणा कर दी कि उनकी सरकार ने तीनों किसान विरोधी कानून वापिस लेने का निर्णय लिया है और वो अपील करते हैं कि किसान दिल्ली की सरहदों पर अपना धरना समाप्त करके वापिस लौट जाए।

यद्धपि प्रधान मंत्री द्वारा अचानक किए गए इस उदघोष ने उनके समर्थक भक्त मंडल एवम् भारतीय मीडिया को एक दम सकते में डाल दिया। एक एंकर तो ऑन स्क्रीन रोता हुआ नजर आया क्योंकि अभी तक वो इन बिलों के सकारात्मक दृष्टिकोण बताता रहा था और अब अचानक इन्हे काले कानून कैसे बता दें।

तुरन्त प्रतिक्रिया में राकेश टिकैत ने आंदोलन वापसी की संभावनाओं से इंकार कर दिया जिसके साथ ही किसान नेता प्रोफेसर दर्शन पाल ने भी टीवी पर बताया कि फिलहाल आंदोलन वापसी की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि इनके अतिरिक्त भी कई मुद्दे बाकी है।

आज सिंघू बॉर्डर पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान नेताओ ने स्पष्ट कर दिया किया कि फिलहाल आंदोलन में कोई ढीलाई नहीं बरती जाएगी और पूर्व में घोषित कार्यक्रम यथावत होंगे जिनमें उत्त प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होने वाली महापंचायत तथा किसानों द्वारा दिल्ली कूच भी शामिल है।

दूसरी ओर भारत सरकार द्वारा 24 नवम्बर को केबिनेट मीटिंग बुलाई गई है जिसमे उम्मीद है कि किसान विरोधी कानूनों की वापसी के अतिरिक्त किसानों के लिए कुछ अन्य घोषणाएं भी की जाए।

किसानों द्वारा आंदोलन वापिस ना लिए जाने के पीछे मुख्य कारण साधारण किसानों द्वारा प्रधान मंत्री की घोषणा पर भरोसा ना करना बताया। 

किसी भी नेता, समाज और देश के लिए यह अत्यन्त शर्मनाक एवम् दुखद स्थिति होती हैं यदि जनता अपने राष्ट्र प्रमुख की घोषणा पर ही यकीन ना करे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस बताया गया कि में शेष निर्णय अगली बैठक में लिए जाएंगे जो 27 नवम्बर को होगी।

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