विश्व इतिहास के सबसे लंबे चले अहिंसक किसान आंदोलन ने अहंकार को झुकने के लिए मजबूर तो किया लेकिन क्यों ?

समस्त मानव समाज और इंसानियत को मानने वाले जन जन को धन गुरु नानक देव जी के प्रकाश उत्सव की असंख्य शुभकामनाएं एवम् भारत में चल रहे विश्व इतिहास के सबसे लंबे अहिंसक किसान आंदोलन में अपना सर्वोच्च बलिदान देकर शहादत प्राप्त करने वाले किसानों को प्रणाम। भारतीय प्रधान मंत्री जी के टीवी संबोधन पर विचार करते हुए बहुत से किन्तु परन्तु मूंह बाए खड़े हो जाते हैं।

प्रधान मंत्री जी ने एक साल बाद किसान आंदोलन को लेकर अपने मुख से अपने विचार व्यक्त किए हालांकि इससे पहले वो इन्हे खुद आंदोलन जीवी  कह चुके है और उनके साथियों द्वारा खालिस्तानी, अलगाववादी, गुंडे, मवाली, दलाल जैसे लांछन भी लगाए जा चुके है और सरकार द्वारा किसानों पर अत्याचार से लेकर उनकी हत्याएं करने के आरोप भी लग चुके है।

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि प्रधान मंत्री ने बेशक दबे स्वर में माफी मांगते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने हेतु प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा कर दी। इस प्रश्न पर विचार करने से पहले किसानों द्वारा सम्भावित निर्णयों का विचार करना चाहिए।

संबोधन के बाद जैसे ही किसानों से सम्पर्क करके उनके विचार जानने की कोशिश की गई तो अधिकांश का कहना था कि इनका भरोसा क्यों और कैसे किया जा सकता है इन्होंने ने तो अपने चुनावी घोषणा पत्र को भी जुमला कह कर दफन कर दिया था और चीन द्वारा भारत भूमि पर कब्जे के समाचार मिलने पर भी आज तक न तो चीन का नाम लिया है न विरोध दर्ज किया है अपितु उसके स्थान पर "न कोई घुसा है, न घुस आया है" बोलकर देश के शत्रु का ही साथ देने का कार्य किया।

दूसरा यदि ये कानून करोना काल की विपदा भारी ताला बन्दी के बीच अध्यादेश जारी करके लाए जा सकते है तो अध्यादेश द्वारा वापिस क्यों नहीं किए जा सकते ?

वैसे भी किसानों के अनुसार खेती किसानी विरोधी, पूंजीपति मित्रों के हक में सरकार द्वारा लाए गए कानून यदि सरकार द्वारा वापिस लौटा कर पहले जैसी स्थिति कायम कर दी जाती हैं तो इससे किसानों को क्या मिला ? एक साल का लम्बा वक्त और 700 से अधिक शहादते क्या इसी लिए हुई कि जित्थो दी खोती, ओत्थे आ खलोती !

प्रारम्भिक बातचीत में ही किसान नेताओ द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया था कि बिल वापसी उनकी अन्य मांगों में से एक है और इसके अतिरिक्त किसान हित में न्यूनतम समर्थन मूल्य, पराली बिल एवम् बिजली आपूर्ति बिल को भी ध्यान रखा जाएगा।

पराली बिल तथा बिजली आपूर्ति बिल पर सरकार ने किसानों की मांग स्वीकार करने की घोषणा कर दी थी लेकिन दस महीने बीत जाने के बाद भी उस दिशा में कोई कार्य नहीं किया जिससे भारत सरकार पर किसानों का भरोसा नहीं रहा और इससे श्री नरेंद्र मोदी सरकार की साख समाप्त हुई। इसी दृष्टिकोण के मद्दे नजर कैसे मान लिया जाए कि टीवी पर की गई घोषणा का कुछ अर्थ भी होगा।

अभी हाल ही में लखीमपुर खीरी नरसंहार में भी सरकार का रवैया किसान विरोधी तथा मानवता विरोधी सिद्ध होता हुआ प्रतीत हुआ क्योंकि लिखित समझौते के बावजूद सरकार या तो अपने वायदों से मुकर रही है या धूर्तता पूर्ण चाले चल रही है जिसके लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी यूपी सरकार को फटकार लगाई है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशो के बावजूद एक ऐसी महिला आईपीएस अधिकारी को SIT टीम में शामिल किया गया है जिनका इतिहास कई बिंदुओं से कलंकित बताया जा रहा है।

लेकिन सरकार की हठधर्मित नीतियों और अहंकारी कार्यशैली के बावजूद क्या कारण हैं कि खुद प्रधान मंत्री को सामने आना पड़ा।

गत दिनों प्रधान मंत्री द्वारा कई रैलियां आयोजित की गई जिनमे मध्य प्रदेश, और यूपी के सुल्तानपुर की विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सभाओं में सरकारी तंत्र और टैक्स पेयर के पैसे के दुरुपयोग के कई सबूत भी सामने आए लेकिन जनता नहीं आई और एडी चोटी का जोर लगाने के बाद भी खाली खाली कुर्सियों को भाषण देते हुए शायद प्रधान मंत्री जी की आत्मा कांप उठी होगी।

हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान बहुल इलाके में मंत्री तो क्या बीजेपी के कार्यकर्ता की भी हिम्मत नहीं है कि वो गांव में जाकर पार्टी के नाम पर बंद कमरे में भी बैठक कर सके जिसके परिणाम स्वरूप संजीव बालियान जैसे मंत्री और राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने खुले शब्दों में बेशक मजबूरी वश सरकार और सरकारी बडबोले पन की आलोचना की अपितु किसानों का समर्थन भी किया ।

क्योंकि 70 वर्षो में पहली बार आरएसएस विचारधारा को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है तो वो किसी भी स्थिति में इसे गवाना नहीं चाहते जिसके लिए आशंका है कि आरएसएस द्वारा अपने पूर्व प्रचारक को अपने पूंजीपति मित्रों का अधिकतम साथ देने के कारण सशंकित नज़रों से देखा जाना शुरू हो चुका था।

लेकिन इन सबसे इतर एक आशंका भी जताई गई जिस पर विश्वास तो नहीं करना चाहिए किन्तु नजर अंदाज भी नहीं करना चाहिए जिसे एक पूर्व सेना अधिकारी किसान ने जताया है।

उनके अनुसार सम्भावना है कि आने वाले यूपी चुनावों में हिन्दू मुस्लिम या मन्दिर मस्जिद कार्ड असफल होने के कारण सरकार पाकिस्तान से कोई युद्ध सरीखी झडप करे जिसके बाद बेशक कुछ सैनिक शहीद हो जाए किन्तु उनके ताबूतों पर वोट मांगे जा सकते है और यदि इस झडप को पाकिस्तान/चीन बड़े युद्ध में बदल देता है तो सीमा की रक्षा के लिए खड़े पंजाबी और सरहद पर डटे उनके बेटे उस जज्बे से सरकार का साथ नहीं देंगे जैसा हमेशा देते हैं इसी डर से सरकार  बैकफुट पर आने के लिए मजबूर हुई हैं।

और इन सबके अंत में भारतीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से सादर विनती है कि अपना भाषण आरएसएस के नागपुरी विद्वानों से ना लिखाया करे विशेषकर जब सिख धर्म और गुरबाणी की व्याख्या का बिंदु आए, आज के भाषण में भी दशम पिता के शब्दों का नितांत गलत अनुवाद पढ़ा गया जो संघी टोले की सोच के अनुसार था क्योंकि नागपुरी संघी हमेशा से सिखो को हिन्दू सिद्ध करने का प्रयत्न करता रहता है। सिख विचारकों से भी विनंती है कि मोड़ी द्वारा बोले गए गलत गुरबाणी अनुवाद का विरोध जताते हुए दुरुस्त कराए।

 

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