और वली कंधारी जिंदा हो गया ! क्योंकि नेक ख्यालात को इब्लीश कितना भी कोशिश कर ले मार नहीं सकता।

दिल्ली की सरहदों पर चल रहे किसान आंदोलन को लगभग एक साल होने वाला है और जाबर को रहम नहीं आया बेशक वहां से  चार - पांच सौ किमी से भी दूर से धरने पर बैठे कई किसान आज तक लौट कर घर वापस नहीं गए।

कभी आंदोलन स्थल पर जाएं तो ट्रॉलियों को घर बना कर बैठे हुए "सरदार जी" दिखाई देते है, जिनसे बात करे तो बहुत प्यार और सत्कार से बात करेंगे यथा संभव चाय पानी के लिए कहेंगे और पूछेंगे कि यदि लंगर छकना ( भोजन करना है) तो बताएं और जहां लंगर सेवा की जा रही होगी वहां बिना आपका धर्म, जाति पूछे आपको निशुल्क वहीं भोजन प्रस्तुत किया जाएगा जो प्रबन्धक खुद खाते है।

सिर पर बड़ी सी दस्तार सजाए दाढ़ी, मूंछ वाले लंबे लंबे बाल बढ़ाए इन दरवेशों को "सिख" कहते है जो गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं और जीवन शैली को अपनाते हुए गुरु गोविंद सिंह जी की आज्ञा अनुसार गुरु ग्रंथ साहिब के आदेशों का पालन करते है।

*कल 19 नवम्बर 2021 दिन शुक्रवार*

मानवता के प्रकाश धन गुरु नानक देव जी का जन्मोत्सव कुर्र ए अर्श के हर कोने में मनाया जाएगा लेकिन उनके साक्षात दर्शन करने के लिए यदि चाहे तो भारत की राजधानी नई दिल्ली के सेटेलाइट शहर गुरुग्राम में आकर देख सकते है।

गुड़गांव से गुरुग्राम बना यह शहर बीजेपी शासित हरियाणा प्रदेश का मुख्य शहर है जिसका निर्माण एवम् विकास बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ऑफिसेज की वजह से किया गया। इसे भारत के अति आधुनिक एवम् विकसित शहरों में गिना जा सकता है।

आई टी इंडस्ट्री और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मद्देनजर इसका निर्माण किया गया तो टाउन प्लानर ने धार्मिक स्थलों विशेषकर मस्जिदों के लिए कोई प्रावधान नहीं रखा, मन्दिर भी केवल बड़े रिहायशी सेक्टर्स के अंदर है और गुरूद्वारे भी नए गुड़गांव में नाम मात्र के है। इन प्रावधानों पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि जब सिख समुदाय के एक या दो परिवार होंगे तो उनके लिए गुरूद्वारे की जमीन नहीं छोड़ी जा सकती और ऐसा ही मुस्लिम के साथ है क्योंकि बतौर आबाद मुस्लिम समाज बहुत कम है जो भी है वो कारोबार के सिलसिले मे बाहर से आते है।

क्योंकि  मुस्लिम्स द्वारा नमाज अदा करना फ़र्ज़ भी बनता है और शुक्रवार दोपहर की नमाज़ तो जरूर पढ़ी जाती हैं जिसमे अधिकतम 30 मिनिट का वक्त लगता है और किसी तरह का कोई शोर शराबा नहीं होता क्योंकि मुस्लिम रिवायतों में जय श्री ..... या कुछ भी नारेबाजी नहीं होती।

क्योंकि कार्यरत कर्मचारियों को नमाज़ अदा करनी होती थी तो वो निकट के पार्क का खाली जमीन पर नमाज पढ़ने थे लेकिन कुछ हिन्दुत्व वादी समूहों को यह उनकी संस्कृति पर हमला लगा और विवाद शुरू हो गया। दो साल पहले सरकार और नमाज विरोधी गैंग में समझौता हो गया जिसमे कुछ खाली स्थानों पर शुक्रवार की नमाज की अनुमति दे दी गई तथा उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस भी तैनात होने लगी।

लेकिन गत कुछ समय से या जबसे बीजेपी सरकार की साख गिरी है तबसे हिन्दुत्व संस्कृति और धर्म पर फिर से खतरा बढ़ गया और जिन स्थानों पर नमाज पढ़ने की इजाजत थी वहां कभी भीड़ द्वारा जय श्री राम के नारे लगाए जाते थे, कभी पूजा पाठ किया जाने लगा और अंततः वहां गोबर बिछा दिया गया।

विवाद के बीच कोई समाधान नहीं निकला क्योंकि निकलना भी नहीं था और समाधान के लिए तो समस्या खड़ी नहीं की गई थी।।

जब अंधेरा बढ़ जाता हैं तो समझ लेना चाहिए कि आफताब तुलू होने वाला है अर्थात ब्रह्म मुहूर्त के अन्धकार के बाद सूर्योदय काल आ गया है बेशक ईश्वरीय विचार किसी भी रूप में नजर आए जैसे ईश्वर को मानने और देखने वाले कन्न कन्न में परमात्मा को वास देखते हैं।

इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि धन गुरु नानक देव जी के जन्मदिन पर ही गुरुग्राम के सिख समुदाय ने आगे बढ़कर अपने गुरूद्वारे के दरवाजे नमाज पढ़ने वालों के लिए खोल दिए और सादर आमंत्रित किया कि आए और अपनी रिवायत के मुताबिक इबादत करे।

गुरुद्वारा साहिब के अतिरिक्त स्थानीय हिन्दू निवासियों ने भी अपनी निजी सम्पत्ति में भी मुस्लिम आस्थावान नमाजियों को जुमें की नमाज के लिए अपनी जगह मुहैया कराई है। हालांकि अभी किसी मन्दिर के प्रांगण या धर्मशाला की ओर से कोई खबर नहीं मिली लेकिन ईश्वर उन्हे भी हिदायत देगा।

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने जब खालसा पंथ की सृजना की थी तो उन्होंने आज्ञा दी थी आइंदा कोई देहधारी गुरु नहीं होगा और श्री गुरु ग्रंथ साहिब ही गुरु गद्दी पर स्थापित रहेंगे और मै ( गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी तक ) साध संगत जी के रूप में हाजिर रहूंगा क्योंकि आपे गुरु चेला के कारक एकमात्र वहीं है।

उनकी वाणी सत्य सिद्ध हुई और गुरु नानक देव जी जिन्हे भारत में गुरु नानक देव बोला जाता है, पाकिस्तानी पंजाब में बाबा हाजी नानक पीर भी बोलते है और उपर अफगानिस्तान की ओर वली कंधारी मानते है ऐसा ही लेह लद्दाख से लेकर गुजरात और मक्का मदीना से लेकर अफ्रीका तक उनके पदचिन्ह मिलते है वो कब संगत के रूप में अपने मुबारक जन्मदिन ( प्रकाश पर्व ) पर संगत की शक्ल में गुरुग्राम में प्रकाशित हो गए, इसे तो चमत्कार मान लेना चाहिए।

भारत तो क्या हिंदुस्तान ( अविभाजित हिंदुस्तान ) की जनता के बारे में ऐसा सोचना भी कल्पना से उपर की बात है लेकिन तर्को के आधार पर झुठलाया भी नहीं जा सकता।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला हिन्दुस्तानी समाज बुद्ध, महावीर, नानक, गांधी और अपने पीर पैगम्बर की शिक्षाएं भुलाकर रवांडा की तरह अपने ही बहन भाइयों और बच्चो के खून से रंगे हाथ लेकर उत्सव मनाने की मानसिकता रख सकता है ? ...

शहीदों की चिताओं पर भी खड़े होंगे झमेले, ये तो कभी सोचा भी ना था !

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यहीं आखिर निशान होगा ! बहुत सुनते थे हाल ए दिल मगर काटा तो कतरा ए खू ना निकला। कुछ ऐसे ही शब्दो के साथ अपनी आबरू के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक शहीदों की आत्मा चीत्कार रही होगी जब मालूम पड़ेगा कि 1972 से उनके बलिदान के सम्मान में निरन्तर जल रही अमर जवान ज्योति को भारत सरकार ने बुझाने का निर्णय लिया है। ...

नेजेबंदी अर्थात टेंट पेगिंग ! घोड़े की पीठ पर बैठकर खेला जाने वाला प्राचीन खेल जो पंजाब में आज भी लोकप्रिय है।

यद्धपि विश्व में घोड़े की पीठ पर बैठकर खेले जाने वाले खेलों में पोलो अधिक प्रसिद्ध हैं लेकिन आज भी पंजाब विशेषकर पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) में नेजेबंदी अपनी लोकप्रियता कायम रखे हुए है। ...