Star Wars या स्ट्रेटिजिक डिफेंस सिस्टम ! अमेरिकी महत्वाकांक्षाओं द्वारा जनित युद्ध उसी को दहलाने लगा।

जहां और भी है सितारों से आगे !

शायराना अंदाज में बोली गई पंक्ति बेशक उस सन्दर्भ मे न कहीं गई होगी जिस सन्दर्भ मे परसो रूस ने अपने ही उपग्रह को अपनी ही मिसाइल से नष्ट कर दिया लेकिन उसकी धमक से अमेरिका, फ्रांस और नासा से नाटो तक गूंज उठा।

प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे को लेकर युद्ध शायद आदिम काल से चल रही है क्योंकि जैसा कि बाबा बुल्ले शाह ने फरमाया है "बंदा ही करदा, रिज्क जखीरा ते बंदा ही भुखेया मरदा ए"

नियत की भूख और अधिक से अधिक अपने कब्जे में करने की हवस ने दरखतों की टहनियों से बने हथियारों का विकास करते हुए पत्थर, नुकीले तांबे, लोहे के नेजे और तीर तलवारों से एटॉमिक हथियारों का सफ़र मुकम्मल किया लेकिन अब अहसास होने लगा कि ज़मीन की इनायतें कम पड़ सकती हैं तो अंतरिक्ष में छलांग लगा दी जिसके साथ साथ युद्ध भी ले गए।

बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों/ धातुओं और खनिजों का आज तक कोई विकल्प नहीं बनाया जा सका और एक की कमी किस प्रकार सम्पूर्ण व्यवस्था को प्रभावित करती हैं इसका उदाहरण हाल ही में सिलिकॉन कंडक्टर्स की कमी से विश्व में अर्थव्यवस्था का रुकना तथा महंगाई के बेलगाम से समझ सकते हैं।

इन्हीं बहुमूल्य संसाधनों/ खनिजों के लिए अंतरिक्ष पर कब्जे के प्रयत्न बहुत पहले शुरू हो गए थे जब रूस ने स्पूतनिक भेज कर दुनियां को हैरान कर दिया था। उसके बाद उपग्रहों को भेजने की होड़ लग गई तथा दुनियां का निज़ाम धीरे धीरे सेटेलाइट पर डिपेंड होता चला गया ।

हालांकि अभी भी पनवाड़ी या रास्ते चलते व्यक्तियों से अपना गंतव्य पूछकर चलने वाली पीढ़ी जिंदा हैं किन्तु हथेली पर गूगल रीयल टाइम मैप देखकर चलने वाली पीढ़ी तेजी से आगे निकल रही है। बैंकिंग से लेकर रक्षा तक अधिकांश कार्य व्यवहार सेटेलाइट कम्युनिकेशन आधारित हो चुका है और ऐसे में शत्रु देश के सेटेलाइट नष्ट करने का अर्थ होगा कि उसकी व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर देना जिससे पृथ्वी से अंतरिक्ष तक कब्ज़ा किया जा सके।

मार्च 23 1983 को अमेरिका ने अपने न्युक्लियर वॉरहेड को अंतरिक्ष में तैनात करने की योजना पर कार्य करने की घोषणा की जिसे स्ट्रेटिजिक डिफेंस सिस्टम या स्टार वार, सोवियत संघ द्वारा भी इस क्षेत्र में काफी कार्य किया जा चुका था और शीत युद्ध के हालात में लगने लगा था कि भविष्य का युद्ध क्षेत्र अंतरिक्ष बन सकता है तो राष्ट्रपति रीगन ने 8 दिसम्बर 1987 को सोवियत संघ से एक समझौता किया जिसके अनुसार अंतरिक्ष को हथियारों की होड़ से मुक्त रखा जाएगा।

लेकिन 2007 में चीन ने सफलता पूर्वक अपनी एंटी सेटेलाइट मिसाइल का परीक्षण किया और 2008 में अमेरिका ने भी जमीन से मिसाइल छोड़कर अंतरिक्ष में घूम रहे कृत्रिम उपग्रह को नष्ट करके दिखा दिया। इसी कड़ी में भारत द्वारा 2010 से कार्यक्रम शुरू किया गया और 2019 में पृथ्वी की निचली कक्षा में अपने ही उपग्रह को जमीन से नष्ट करके स्टार वार की दौड़ में तीसरा स्थान प्राप्त कर लिया।

लेकिन परसो रूस द्वारा अपने द्वारा 1982 में छोड़े गए मृतप्राय उपग्रह कॉस्मो 1408 जो उपरी कक्षा में स्थापित था, उसे नष्ट करके हंगामा बरपा दिया बेशक पहले तीनों परीक्षणों के समय केवल औपचारिक आलोचना हुई थी।

यद्धपि रूसी रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु के अनुसार रूस ने 1982 से निष्क्रिय सेलिना डी ( Tselina D ) को नष्ट किया है जिससे कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन नाटो महासचिव जेंस स्टोलेंबर्स , फ्रांस एवम् अमेरिका द्वारा इसकी व्यापक आलोचना की गई।

नासा के अनुसार तोड़े गए सेटेलाइट के 1500 बड़े टुकड़े किसी भी दूसरे सेटेलाइट तथा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसके कारण 4 अमेरिकी, 1 जर्मनी तथा 2 रूसी अंतरिक्ष यात्रियों को आपात स्थिति के लिए तैयार कर दिया गया था जो ISS पर कार्य कर रहे थे।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिकी दावों को चुटकुला करार देते हुए किसी भी स्टार वार या खतरे का खंडन किया है। बेशक अभी ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा जैसे हजारों न्युक्लियर वॉरहेड होने के बावजूद केवल दो एटॉमिक बम ही फटे है वैसे ही यह भी होगा लेकिन इसके डर को बनाए रखने के लिए और बचाव के लिए या शांति के लिए हथियार रखने हेतु कितना धन बर्बाद किया जाएगा उसका उत्तर कोई राजनेता साधारण इंसान को नहीं देगा ।

रूस की S 400 की खरीद पर भारत द्वारा लगभग साढ़े पांच अरब डॉलर खर्च किए गए हैं और इसको मेंटेन करने के लिए अगले 5 से 7 साल में इतना ही खर्च करना पड़ेगा बेशक गरीब जनता दवाओं और ऑक्सीजन के अभाव में अस्पतालों के बाहर सड़क पर दम तोड़ दे लेकिन हथियार लॉबी द्वारा प्लांट किए गए नेताओ/तानाशाहों द्वारा शांति रखने के लिए घातक हथियार लेना प्राथमिकता रहेगी और नए नए परीक्षण भी चलते रहेंगे।