विश्व की एकमात्र महाशक्ति होने का दावा करने वाले अमेरिका का आत्मसमर्पण !

एक कहावत है कि पैसा खुदा तो नहीं होता लेकिन खुदा से कम भी नहीं होता और आज के भौतिकवादी युग में तो यह हकीकत लगने लगा है जब आर्थिक स्थिति ही इंसान से लेकर देश तक की गैरत को खरीद या बेच सकती हैं।

अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है जब सोवियत संघ टूट कर बिखर गया था और बिना किसी चुनौती के अमेरिका को विश्व की एकमात्र महाशक्ति समझा जाने लगा था। उस काल में अमेरिका ने भी अंधे हाथी की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया बेशक उसके नतीजे में इराक़ से लेकर सीरिया, लेबनान और अफगानिस्तान तक  न केवल बर्बाद कर दिए गए अपितु जमीनें भी खून से लाल कर दी गई।

क्योंकि समय की गति को रोकना असम्भव होता है तो वक्त अपनी चाल चलता रहा और कभी समाप्त समझे जाने वाले रूस ने खुद को खड़ा करने में सफलता प्राप्त की वहीं चीन ने भी खुद को सिद्ध कर दिखाया कि जिस समाज को इंसानों का झुंड समझा गया वो भी यदि नेक नियत और मेहनत से प्रयत्न करें तो चुनौती बन सकता है।

ऐसा नहीं है कि अमेरिका को यथा समय इनकी उभरती ताकतों का अहसास नहीं हुआ होगा किन्तु जब तक वो इन्हे रोक पाता बहुत देर हो चुकी थी।

चीन के आर्थिक साम्राज्य को रोकने के लिए अमेरिका ने अपने स्तर पर कूटनीतिक और सामरिक प्रयास किए जिसके लिए क्वाड कोर बनाए, साउथ चाइना सी में युद्धपोत भेजे, चीन के निकट पड़ोसी देशों को साथ लेने की कोशिश की, ताइवान को चुनौती देने के लिए तैयार किया और अंतिम तिब्बत कार्ड भी खोलने का इरादा जाहिर किया।

लेकिन चीन द्वारा इसकी कोई बडबोली प्रतिक्रिया नहीं दी गई बहरहाल चीन ने समभवित अमेरिकी भारतीय गठजोड़ तथा तिब्बत कार्ड को ध्यान रखते हुए भारत के कई क्षेत्रों पर कब्ज़ा जमा लिया और भारत को एक प्रकार से न्यूट्रलाइज कर दिया।

आर्थिक मोर्चे पर एक ओर तो विश्व बाजार पर अपने सस्ते उत्पादों की आपूर्ति जारी रखी वहीं भारत सहित आने वाली चुनौतियों के चारो ओर के छोटे देशों को अपने ऋण जाल में फसा कर अपना वर्चस्व स्थापित किया और दूरगामी प्रभाव देखते हुए कदम उठाए।

अमेरिकन प्रशासन द्वारा चीन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और सहयोगी यूरोपियन देशों द्वारा कोशिश की गई कि चीन से व्यापार कम किया जाए लेकिन इसका विपरीत असर उन्हीं की अर्थव्यवस्था एवम् जनता के जीवन स्तर पर पहुंचने लगा।

खंब ठोकने के बाद आखिरकार हाथ तो मिलाने ही पड़ते है बेशक अखाड़े में जीत का फैसला कुश्ती के बाद ही घोषित किया जाए और इसी कड़ी में विगत रात अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन तथा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक अहम बैठक का आयोजन हुआ।

यद्धपि यह बैठक वर्चुअल आयोजित की गई लेकिन वर्चुअल होने के कारण इसकी अहमियत कम नहीं होती, वैसे भी करोना महामारी के बाद से चीनी राष्ट्रपति ने कोई विदेश यात्रा नहीं की है तथा सभी कार्य अपनी राजधानी से ही सम्पूर्ण किए हैं जबकि जो बाइडेन व्यक्तिगत रूप से यात्राएं करने और मुलाकात करने को ज्यादा पसंद करते है। शायद ऐसा जेनेरेशन गैप के कारण हो !

राष्ट्रपति बाइडेन ने व्हाइट हाउस के वेस्ट विंग के रूज़वल्ट कक्ष से खिताब किया तो राष्ट्रपति शी ने अपने भव्य ऑफिस से अर्थात दोनों ओर से अपनी अपनी समृद्धि और शक्ति का प्रदर्शन करने का संकेत दिया गया था ( विशेष रूप से दोनों पक्षों ने अपने दफ्तर दिखाए )

वार्ता की शुरुआत में ही राष्ट्रपति बाइडेन ने चीनी राष्ट्रपति से अपने पुराने सम्बन्धों एवम् मुलाकातों का हवाला दिया, याद रखना चाहिए कि जो बाइडेन जब उपराष्ट्रपति थे तो शी जिनपिंग भी उस समय चीन के उपराष्ट्रपति थे। जैसा कि चीनी व्यवहार होता हैं इसका जवाब राष्ट्रपति शी ने वैसा नहीं दिया जैसा उनके स्थान पर भारतीय प्रधान मंत्री होते तो देते और सदियों पुरानी मित्रता के साक्ष्य भी उपलब्ध करा देते।

कुल मिलाकर लगभग साढ़े तीन घंटे लंबी चली वार्ता में एक ब्रेक भी लिया गया और यदि अनुवाद की प्रक्रिया को भी ध्यान में रखे तो लगभग दो घंटे की बातचीत बहुत अहमियत रखती हैं जिसमे राष्ट्रपति बाइडेन के साथ उनके सलाहकारों की टीम भी बैठी थी।

वार्ता के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टिंग, चीन का आधिकारिक बयान और व्हाइट हाउस द्वारा जारी बयान संकेत देता है कि कमोबेश अमेरिका ने चीन का वर्चस्व स्वीकार कर लिया है।

सबसे कटु शब्दो का उपयोग करते हुए बीबीसी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है जिसमे वो लिखता है कि अमेरिका द्वारा ताइवान को मदद आग से खेलना होगा। इसका अर्थ है कि अभी भी ब्रिटेन अमेरिका और चीन के बीच बर्फ पिघलने से सहमत नहीं हैं क्योंकि इससे ब्रिटेन की अहमियत खत्म हो सकती हैं।

उपरी तौर पर चीन की मुख्य आपत्ति ताइवान को लेकर है जिसे वो पीपल रिपब्लिक ऑफ चाइना का अटूट अंग मानता है, लेकिन उसी विषय पर तास न्यूज एजेंसी ने चीनी दावे को यूएस द्वारा स्वीकार किए जाने का समाचार प्रकाशित किया है।

व्हाइट हाउस द्वारा जारी विज्ञप्ति में भी वन चाइना के दृष्टिकोण को स्वीकार किया गया है तो GGTN पर चीनी प्रवक्ता द्वारा स्पष्ट शब्दो मे इसी विषय पर जोर दिया गया और इसे वार्ता का मुख्य बिंदु बताया गया अर्थात बाकी किसी चुनौती से चीन को कोई फर्क नही पड़ने वाला उसकी इच्छा है कि उसके निकटवर्ती क्षेत्रो से यूएस एवम् उसके सहयोगी दूर रहे।

इन परिस्थितियों में भारत के लिए एक समस्या खड़ी हो सकती हैं क्योंकि कुछ समय पहले तक अमेरिका के भरोसे ही भारत चीन को सामरिक चुनौती देने के दम दिखा रहा था बेशक इसके कारण चीन के हाथो अपने महत्वपूर्ण इलाके भी खो दिए तथा सैनिक खर्चों में अप्रत्याशित वृद्धि भी कर ली जो भारत जैसे पिछड़े देश के लिए तकलीफदेह ही कहलाई जानी चाहिए।

यद्धपि चीन अमेरिकी वार्ता के बाद यह तो नहीं कहा जा सकता कि युद्ध और टकराव की बर्फ पिघल गई है लेकिन यह निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि आज विश्व का सबसे अमीर देश चीन, अमेरिका को झुकाने में एक सीमा तक कामयाब हुआ है बेशक यूएस को भी फेस सेविंग तो चाहिए ही चाहिए।।

क्या अगला युद्ध का अखाड़ा बनने के लिए भारत सरकार ने अपनी गरदन हाजिर कर दी है ?

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