कूटनीति या वैश्विक राजनीति में कोई किसी का न मित्र होता है न शत्रु और जो शासक अपने देश का मित्र नहीं होता उसके सभी शत्रु होते है।

कहते है कि जिओ पॉलिटिक्स में जो सरकार अपने देश की मित्र नहीं होती उसके लिए सभी शत्रु या लुटेरे होते हैं क्योंकि व्यवहार में भी हाट बाजारों में मूर्ख ग्राहक को ही लूटा जाता हैं।

आज सोमवार 15 नवम्बर को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और चीन के प्रीमियर शी जिनपिंग के बीच होने वाली वर्चुअल बैठक पर दुनियां की नजरे टिकी हुई हैं क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि आज की बैठक दुनिया का भविष्य तय करने में अहम भूमिका निभाने जा रही है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनियां को तत्कालीन विश्व शक्तियों ने अपने अंदाज में बांट लिया था और संयुक्त राष्ट्र नामक संस्था के दिशा निर्देशों से एक वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की थी जो कालांतर में निर्थक जैसी साबित होती जा रही है क्योंकि शीत युद्ध के समय ऐसा अनुभव किया गया कि संयुक्त राष्ट्र ने पश्चिमी हितों का ज्यादा ध्यान रखा बनिस्बत सोवियत खेमे या थर्ड वर्ल्ड देशों के।

जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन किया जा रहा था तो वर्तमान ताइवान ने खुद को असली चीन होने का दावा पेश किया और उसे ही चीन मान कर सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बना दिया गया लेकिन बाद में माओ त्से तुंग द्वारा ज्यादा मजबूती से अपना दावा सिद्ध करने के कारण वर्तमान चीन को वीटो पॉवर के साथ सुरक्षा परिषद में मान्यता प्राप्त हुई।

क्योंकि तब तक हिंदुस्तान ब्रिटिश इंडिया था तो एशिया से कोई दावा पेश नहीं हुआ अन्यथा भारत और पाकिस्तान को अपने अपने तर्को के आधार पर सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाया जा सकता था ( पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जो इस्लामिक देश होने के साथ साथ न्युक्लियर पॉवर भी है और भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता हैं )

शुरुआती वर्षों में चीन अपनी ग़रीबी और एकांत के कारण विश्व राजनीति में अधिक सक्रिय नहीं रहता था साथ ही पश्चिमी जगत के लिए कोई चुनौती नहीं था तो अधिकांश देशों ने चीन में कोई विशेष रुचि नहीं रखी केवल पाकिस्तान के साथ इसके सम्बन्ध जरूर घनिष्ट रहे क्योंकि पाकिस्तान को भारत के विरूद्ध कोई साथ चाहिए था और उसके लिए चीन बेहतर विकल्प था। बेशक 1971 में सोवियत दबाव के कारण चीन ने पाकिस्तान का साथ नहीं दिया।

दूसरी ओर अमेरिका जिसका नागपुर ब्रिटेन है उसके लिए सोवियत खेमा एक बड़ी चुनौती था और तब भारत सोवियत संघ का निकटतम देश समझा जाता था तो अमेरिका ने चीन से यह सोचकर सम्बन्ध विकसित किए कि समय आने पर चीन द्वारा रूस को रोका जा सकेगा जिसमे पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई और 1975 में किसिंजर का गोपनीय दौरा पिकिंग के लिए हुआ।

शायद इसे अमेरिका द्वारा भस्मासुर खड़ा किया जाना समझा जा सकता है और ऐसा ही हुआ। चीन ने यूएस से मैत्री की पूरी कीमत वसूल की जिसमे ताइवान की मान्यता समाप्त करने से लेकर पश्चिमी बाजारों को चीनी उत्पाद के लिए खोलना तथा चीनी नागरिकों को शिक्षा के लिए अमेरिका, कनाडा एवम् अन्य देशों में प्रवेश देना।

शह और मात के इस खेल में अचानक ब्रिटेन और अमेरिका को अहसास हुआ कि उनकी बाजी मात में बदली जा सकती है जिसके लिए उपाय करने जरूरी हैं जिसमे पहला कदम रूस तथा चीन के गठजोड़ को तोड़ना होना चाहिए।

यद्धपि फिलहाल रूस द्वारा प्राप्त गैस एवम् तेल पर निर्भरता के कारण ऐसा सम्भव नहीं लगता कि चीन और रूस आपस मे आमने सामने खड़े हो सकते है किन्तु फिर भी भविष्य के लिए दरवाजे खुले रखना ही कूटनीति कहलाती हैं।

क्योंकि अभी तक पिछले सौ साल से वैश्विक विकास का केंद्र अरब देशों के तेल भंडार रहे है तो युद्ध से लेकर अन्य गतिविधियों के केंद्र भी तेल भंडारों वाले देश रहे है जिसमे एक अहम नाम लीबिया का याद किया जाना चाहिए।

हालांकि लीबिया अरब देशों की श्रेणी में नहीं आता लेकिन सोवियत सहयोग से स्थापित कर्नल गद्दाफी हमेशा से यूएस के लिए सिरदर्द बने रहें। सोवियत संघ के टूटते ही पेंटागन लीबिया पर टूट पड़ा और कर्नल गद्दाफी के साथ उनके दो बेटों की हत्या कर दी गई किन्तु तीसरे बेटे सैफ उल इस्लाम को जीवित रखा गया और उन्हें पश्चिमी माहौल की शिक्षा दी गई।

बदलते हालात में अचानक कर्नल गद्दाफी के इसी तीसरे एवम् सबसे छोटे बचे हुए बेटे ने दिसम्बर में होने वाले लीबिया के राष्ट्रपति चुनावों में हिस्सा लेने की घोषणा कर दी है तथा समझा जा रहा है कि उनका राष्ट्रपति बनना बिना किसी अड़चन के निश्चित है।

यदि दोनों दूर की घटनाओं का आपसी सम्बन्ध जोड़ते हुए विश्लेषण किया जाए तो इसमें तीनों महाशक्तियों की उपस्थिति सामने आ जाती हैं क्योंकि लीबिया की जनता की कर्नल गद्दाफी के बाद भी रूस से सहानुभूति रही हैं।

प्रश्न यह है कि क्या पर्दे के पीछे अमेरिका को अपनी बिगड़ती अर्थव्यवस्था और महाशक्ति ना रहने का अहसास हो गया है ? क्या द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वाली स्थिति फिर से सामने आ गई है जब सभी बड़ी ताकते दुनियां को अपने अपने हिसाब से बांटकर अपना अपना केक अपनी प्लेटो में सजाने का समझौता कर रही हैं।

यदि ऐसा है तो इसमें तुर्की जैसे देश को और ईरान को नजरंदाज नहीं किया जा सकता यद्धपि भारत भी जनसंख्या एवम् अपने महत्व के कारण नजरंदाज करने लायक नहीं है किन्तु गत समय अफगानिस्तान पर निर्णय लेते वक्त वर्तमान सरकार का कोई प्रयास न करना या उचित समय पर निर्णय न लेना फिलहाल तो भारत को कॉर्नर किए हुए है।

भविष्य के गर्भ में जो भी हो लेकिन आशा करनी चाहिए कि शांति होगी और कोई नई व्यवस्था ऐसी आएगी जिसमे मानवीयता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए बेशक इसके लिए धूर्तता की धुरी ब्रिटेन को इतिहास बनाना पड़े !