World ahead 2022 according to The Economist cover page ?

महाशक्तियों के टकराव और भविष्य की आहट का अहसास कराती विश्व प्रसिद्ध मैगजीन। The Economist का कवर पेज हमेशा से विश्लेषण लायक लगता है क्योंकि बहुत से लोग इसमें छिपे हुए संदेश तलाश करते है।

आने वाले अंक को आगामी वर्ष की संभवनाओं को अर्पित किया गया है और इसके कवर पेज पर उपर चीन के राष्ट्रपति तथा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की तस्वीर है बीच में पंखे नुमा एक बैकग्राउंड दी गई है जो न्युक्लियर वॉरहेड का अहसास कराती हैं।

इसी बीच ब्रिटेन के सुरक्षा मंत्री का चीन के विरूद्ध सख्त बयान भी सुनाई दिया है तो क्या आने वाला वर्ष विश्व के लिए नई तकलीफें और कोई नई व्यवस्था लेकर आने वाला है ?

करोना काल के बाद यद्धपि दुनिया कोशिश तो कर रही हैं कि पुराने समय को वापिस लौटा लिया जाए लेकिन यह कवर पेज कुछ दूसरे इशारे कर रहा है।

यद्धपि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ चीनी राष्ट्रपति को दिखाना प्रचलित विचारों से मेल नहीं खाता क्योंकि आज भी पेंटागन रूस को ही अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी या शत्रु मानता है। इसका अर्थ हुआ कि चीन सबको पछाड़ कर आगे बढ़ चुका है !

बीच में हलकी सी झलक क्रीप्टो करेंसी की नजर आती हैं जिसका स्पष्ट संकेत है कि भविष्य की मुद्रा बदलने वाली है वैसे भी इसकी तैयारी काफी समय से चल ही रही थी जिसमे डॉ मनमोहन सिंह जी के समय में भारत भी अहम भूमिका निभाने वाला था और आशा की जा रही थी कि भारतीय रुपया आने वाली 5 या 6 विश्व मुद्राओं में से एक होगा।

लेकिन इसमें चिंतनीय बैकग्राउंड न्युक्लियर वॉरहेड की है तो क्या सम्भावना है कि विश्वयुद्ध शुरू हुए बिना या पहले ही किसी देश के द्वारा न्युक इस्तेमाल किया जा सकता है ?

यदि गौर से देखा जाए तो इसमें खेल और टूरिज्म को भी हलके बैकग्राउंड में दिखाया गया है, अर्थात जिस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दुनियां को देशों की सरहदों में कैद कर दिया गया था, उसी अवधारणा को और आगे बढ़ाते हुए इंसानों की free movement को सीमित किया जाएगा।

इससे इतर भी यदि देखे तो महामारी के नाम पर work culture में बदलाव तो आ ही चुका है और work from home को तरजीह दी गई है साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इन परिस्थितियों में दक्षिण एशिया के देश विशेषकर भारत कहां खड़ा होता है ? इसका उत्तर तलाश करना जरूरी हैं और इसके लिए चीन की पोलित ब्यूरो द्वारा जारी बयान पर ध्यान देना चाहिए।

ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित पोलित ब्यूरो की कार्यवाही में एक ओर तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग को असीमित अधिकार दे दिए गए हैं ( यद्धपि भारतीय मीडिया उनकी गद्दी को खतरा बता रहा था ) दूसरी ओर एकाधिक बार कम्युनिस्ट शब्द की जगह समाजवाद शब्द का उपयोग किया गया है।

अर्थात पूंजीवादी समाज की निर्बाध प्राइवेट व्यवस्था और कम्युनिस्ट समाज की शत प्रतिशत आरक्षित व्यवस्था के बीच का नेहरूवियन रास्ता। वैसे भी चीन ने पूंजीवादी व्यवस्था को अपने यहां आने तो दिया था लेकिन अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में दखल नहीं करने दिया।

कुल मिलाकर लब्बोलुवाब यही समझा जा सकता है कि न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को किसी छोटे मोटे संघर्ष के बाद स्वीकार कर लिया जाएगा किन्तु अब शायद उन शक्तियों के ख्वाब पूरे नहीं होंगे जो दुनियां को सिर्फ अपनी बैंकिंग पॉवर पर नचाने की सोच रखते थे या नचा रहे थे।

पश्चिमी जगत को उम्मीद थी कि महामारी के बाद उनकी करेंसी वैल्यू में करेक्शन सम्भव होगा जो नहीं हुआ तो इसके विपरीत अब महंगाई बढ़ाकर एक कोशिश की जा सकती हैं और अगले लॉक डाउन या प्रतिबन्ध पर्यावरण के नाम पर लग सकते है।

लेकिन भारतीयों को चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि मोड़ी है तो मुमकिन है बेशक वो भुखमरी से बचाने में सक्षम ना हो, रोजगार ना दे सके और देश की अखंडता एवम् संप्रभुता की रक्षा ना कर सके। इसलिए जिस प्रकार चीन ने अपने नागरिकों को घरों में भोजन सामग्री इकठ्ठा करके रखने की सलाह दी है उसी प्रकार भारतीयों को भी हमेशा कुछ माह का राशन स्टोर करके रखने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी बचत रखनी चाहिए।

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