भारत के मणिपुर राज्य में कर्नल रैंक के कमांडिंग ऑफिसर पर हमला, चीन द्वारा बसाया गया गांव और काबुल में सिनेमाघर की बन्दी !

भारत के मणिपुर राज्य में मणिपुर लिबरेशन आर्मी के नाम से किसी संगठन ने जिम्मेदारी स्वीकार की है कि उसके लड़ाकों ने एंबुश लगाकर भारतीय सेना के कर्नल रैंक के कमांडिंग ऑफिसर को शहीद किया है जिसमे कर्नल त्रिपाठी की पत्नी और बच्चा भी मारा गया।

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में साठ के दशक में बना सरकारी सिनेमाघर "एरियाना" बंद कर दिया गया, उसके पोस्टर इत्यादि उतार दिए गए बेशक उसके आठ कर्मचारी अभी भी रोज ड्यूटी पर आते है कि शायद उन्हें वेतन प्राप्त हो जाए ( एकमात्र महिला कर्मचारी तालिबान के आने के बाद से ही घर बैठी है )

तीसरी घटना अरुणाचल प्रदेश में चीन द्वारा गांव बसा लेने की है जिसे अमेरिकी रक्षा विभाग ने भारतीय भूमि पर बताया है।

लेकिन क्या इन तीनों खबरों का कोई आपसी सम्बन्ध हो सकता है या एक ही जगह तीन कोनो की अलग अलग घटनाओं का जिक्र करने का क्या अर्थ है ?

मणिपुर राज्य में सी ओ की शहादत को समझने से पहले किसी भी सैनिक क्षेत्र में सी ओ होने और उसके स्तर को समझना जरूरी हैं। किसी भी आतंकवाद से ग्रस्त क्षेत्र या युद्ध क्षेत्र में अक्सर आतंकियों एवम् शत्रु सेना को मालूम रहता है कि सामने कमांडर कौन हैं और उसकी लोकेशन क्या है किन्तु कमांडर पर सीधा हमला करने से बचा जाता हैं। जब भी दूसरे देश का नेता सीमावर्ती क्षेत्रों में आता है तो सामने वाली सेना भी उसकी सुरक्षा का ख्याल रखती हैं।

ऐसे में मणिपुर जैसे राज्य में जहां जनसंख्या घनत्व भी कम है और ग्राम वासी एक दूसरे को पहचानते हैं वहां स्थानीय आतंकियों द्वारा इस रैंक के अफसर पर हमला किया जाना और फिर स्वीकार करना कोई सामान्य घटना नहीं है। सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारी समझ सकते हैं कि इसका भावार्थ क्या है ? 

यहां संशय किया जा सकता है कि भारत में काफी समय से चल रहे असंतुष्ट अलगाववादी संगठनो की आड़ में कोई विदेशी शक्ति या शत्रु सेना छद्म वेश में अंदर घुसकर हरकते कर रही हैं क्योंकि वैसे भी मयानमार के रास्ते चीनी हथियारों एवम् आतंकियों की घुसपैठ के समाचार मिलते रहे है।

दूसरा समाचार अरूणांचल प्रदेश में भारत भूमि पर स्मार्ट विलेज बनाने का था जिसके साथ ही समाचार मिल रहा है कि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में लाइन ऑफ़ कंट्रोल के साथ चीन की मदद से पाकिस्तान या खुद चीन ही ऐसे ही स्मार्ट विलेज बनाने की योजना पर कार्य कर कर रहा है।

भारतीय संसद में भारत के गुरह मंत्री ने जम्मू कश्मीर से 370 हटाते हुए और लद्धाख को कश्मीर से तोड़कर अलग करते हुए घोषणा की थी कि POK पर कब्ज़ा किया जाएगा और उसके लिए जान तक लगा देंगे किन्तु चीन द्वारा अपने वन रोड वन बेल्ट प्रोजेक्ट और भविष्य की बड़ी योजनाओं की सुरक्षा एवम् हितों के मद्देनजर पाकिस्तानी कश्मीर में घुस आना स्वाभाविक है किन्तु भारतीय हितों एवम् सुरक्षा के हित में नहीं है।

काबुल के सिनेमाघर का बंद होना और चीन का विस्तारवाद एक दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं इसको समझने के लिए तालिबान सरकार और अमेरिका का पस्त होकर बैकफुट पर आना ध्यान रखना चाहिए। परसों राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा है कि उनके देश में महंगाई के पीछे एक कारण चीन द्वारा सप्लाई में कमी है।

अर्थात यूएस चीन का वर्चस्व और चीन पर अमेरिकी निर्भरता को स्वीकार कर चुका है बेशक चीन में मानवाधिकारों के हनन पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता। काबुल की घटना भी विश्व को सीधा संकेत हैं कि काबुल की तालिबान सरकार और चीन दोनों एक पेज पर आकर अफगानिस्तान में शासन करेंगे जिसके लिए उन्हें विश्व समुदाय की कोई चिंता नहीं है।

यह चीन द्वारा खुले आम अपने वर्चस्व एवम् महाशक्ति होने की घोषणा के साथ साथ यूएस को चुनौती भी है जिससे पेंटागन फिलहाल तो पीछे हट गया है अन्यथा भारत के विरूद्ध आक्रमक रुख के समय तो यूएस प्रशासन को चीन के विरूद्ध भारत का साथ देना चाहिए था क्योंकि भारतीय प्रधान मंत्री जी ने ओबामा से लेकर ट्रंप तक सबसे फास्ट फ्रेंड वाले सम्बन्ध बना कर रखे हैं।

जैसा कि आशंकित है कि चीन द्वारा लाइन ऑफ़ कंट्रोल के साथ साथ पाकिस्तानी कब्जे वाली जगह पर गांव बनाए जाएंगे और यूएस के सहयोग से भारत द्वारा इसका विरोध एवम् कार्यवाही नहीं की जाती तो बेशक यह उपमहाद्वीप की शांति के लिए बेहतर समझा जाए किन्तु भारत के लिए बहुत बुरा होगा।

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