दो धारी तलवार पर खरबूजा या खरबूजे पर तलवार ? भारतीय कूटनीति के लिए परीक्षा की घड़ी !

निजी सम्बन्धों से लेकर राष्ट्रीय महत्व की कूटनीति तक अतिवाद सदैव तकलीफदेह ही होता है और जब तक जीवन में भी बैलेंस स्थापित न हो व्यक्ति से लेकर समाज और देश तक परेशानियों के अतिरिक्त कुछ भी हासिल नहीं होता।

आज़ादी के बाद भारत के सामने एक और पूंजीवादी व्यवस्था थी तो दूसरी ओर घोर कम्युनिस्ट विचारधारा, शुरुआत में नेहरूजी चीन की व्यवस्था से प्रभावित लगे लेकिन शीघ्र ही उन्हे अहसास हो गया कि वो सोने की तरह चमकने वाला पीतल भारतीय सामाजिक व्यवस्था के साथ कदमताल नहीं कर सकता जिसके कारण उन्होंने चौधरी चरण सिंह के कहने पर अपने सहकारी खेती वाले स्वप्न को भी तिलांजलि दे दी।

बेशक भारत ने नेहरू जी के नेतृत्व में गुट निरपेक्ष आंदोलन खड़ा किया और सफलता से अपनी भारतीय हितों को देखने वाली छवि बनाई लेकिन यह भी सत्य है कि कमो बेश सोवियत संघ को अमेरिकी खेमे से ज्यादा तरजीह दी और इसी के फलस्वरूप भारत सैनिक दृष्टिकोण से भी इतना मजबूत हो बन सका कि पाकिस्तान के दो टुकड़े करके इतिहास रच दिया।

1977 में जनता पार्टी सरकार को घोर अमेरिका समर्थक समझा गया किन्तु शीघ्र ही वो अपनी परिणीती को प्राप्त हो गई, फिर अटल बिहारी सरकार का झुकाव भी अमेरिका की ओर नजर आया लेकिन अटल बिहारी को लोक लाज की भी चिंता थी और 2014 के बाद वर्तमान भारत सरकार ने बिना किसी विचार और भविष्य की चिंता किए ऐसे कूटनीति फैसले लिए जिनसे बहुत से विद्वान सहमत नहीं रहे।

इन्हीं फैसलों के कारण वर्तमान सरकार को अमेरिकी प्यादा होने जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा क्योंकि दक्षिण एशिया में भारत एकमात्र ऐसा देश बन गया जिसके साथ यूएस ने कॉम कासा और बीका जैसे समझौते किए हैं बेशक आज तक इसका कोई लाभ भारत को हुआ हो ऐसा नजर नहीं आया।

लेकिन इस पेंटागन झुकाव नीति का असर हुआ कि रूस और भारत के सम्बन्धों में दूरियां बढ़ती गई तथा भारत का चिर परिचित प्रत्येक मौसम का सहयोगी/मित्र देश रूस पाकिस्तान के निकट आ गया।

भारत एवम् रूस के मध्य मैत्री संधि के अनुसार वर्ष में एक बार भारत एवम् रूस के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक वार्ता अवश्य होती रही हैं जिसमे बारी बारी से दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुख एक दूसरे के देश का दौरा करते है।

इस कड़ी का अंतिम दौर राष्ट्रपति पुतिन द्वारा 2019 में किया गया था बेशक वो बहुत छोटी अवधि के लिए था क्योंकि उस समय रूस क्रीमिया विवाद से दो चार हो रहा था, 2020 में ऐसी कोई बैठक आयोजित नहीं हुई हालांकि उसके लिए करोना महामारी को जिम्मेदार ठहरा दिया गया यद्धपि चाहते तो वर्चुअल बैठक हो सकती थी।

2020 में रूस के विदेश मंत्री ने भारत यात्रा की लेकिन इसी यात्रा में पाकिस्तान को भी शामिल करके भारत को नकारात्मक संकेत भी दे दिए, 

इनके अतिरिक्त भारत द्वारा रूस के एयर डिफेंस सिस्टम S 400 की खरीदी पर भी समझौता हो चुका है और दिसम्बर 2021 में उसकी डिलीवरी निश्चित है।

क्योंकि भारत दुनियां का दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदने वाला देश है तो कोई भी हथियार विक्रेता/निर्माता देश नहीं चाहता कि भारत जैसा बड़ा ग्राहक उसके प्रभाव से मुक्त हो और इसके लिए अक्सर साम दाम दण्ड भेद सभी नियम निभाए जाते है।

अमेरिकी कानूनों के अनुसार यदि भारत रूसी डिफेंस सिस्टम लेता है तो भारत पर प्रतिबन्ध लगाए जा सकते है जैसी धमकी तुर्की को भी दी गई थी जबकि तुर्की नाटो संगठन का अहम सदस्य है और यदि भारत रूस से समझौता तोड़ता है तो भारत को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना होगा अपितु रूस से शत्रुता भी बोनस में प्राप्त होगी जो किसी भी दृष्टिकोण से भारत के सामरिक हितों में नहीं हैं।

सूत्रों के अनुसार सम्भावना है कि दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत यात्रा पर आने वाले हैं, आशा तो यह भी है कि भारत के विशेष अनुरोध पर अमेरिकी कांग्रेस अपने प्रतिबन्ध लगाने वाले कानून से भारत को एक बार छूट दे दे किन्तु यह समस्या का समाधान नहीं होगा।

यदि अमेरिकी माफी के बाद भी भारत S 400 की डिलवरी लेता है तो निश्चित रूप से रूस द्वारा यह सिस्टम भारत चीन सीमा पर तैनात ना करने की शर्त लागू की जा सकती है। इस हालात में मिसाइलों को नेपाल सीमा पर तैनात करना सिर्फ मज़ाक ही होगा।

इसके अतिरिक्त अमेरिका द्वारा बेचे गए रेडार एवम् अन्य सैनिक उपकरणों की गोपनीयता तथा तकनीक को लेकर यूएस भी कई शर्तें थोप सकता है और यदि इन सब समस्याओं से मुक्त भी हो जाए तो भविष्य में दोनों देशों द्वारा होने वाली दखल अंदाजी से मुक्त नहीं हो सकते।

निसंदेह यह समय भारतीय कूटनीति के निर्माताओं के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है किन्तु पहले प्रतीक्षा करनी चाहिए कि कब भारत सरकार आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति के आगमन की पुष्टि करती हैं एवम् सम्भावित समझौतों की जानकारी देती हैं।

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