अफगानिस्तान पर असफल होती भारतीय कूटनीति !

आंगन में सांप घुस आया और उसकी दहशत से परिवार पहले तो घर के अंदर सांस रोक कर छिपा रहा लेकिन बाद मे सांप की लकीर पीट कर खुद को बहादुर और बुद्धिमान साबित करने की कोशिश करने लगा। कुछ ऐसा ही दक्षिण एशिया में शह और मात जैसे खेल खेलने में भारत सरकार का विदेश मंत्रालय नजर आ रहा है।

वर्तमान स्थिति के लिए भारतीय प्रधान मंत्री या विदेश मंत्री को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अधिकांश पूर्व राजनयिक मानते है कि प्रधान मंत्री जी और विदेशनीति का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है और विदेश मंत्री कौन हैं एक बार खुद से पूछें ? यदि नाम याद आ जाए तो उन पर टिप्पणी कर सकते है।

उगदा सूरज सबने देखा लेकिन मेरे लिए अंधेरा था क्योंकि अहंकार और अज्ञानता वश मेरी आंखे बंद थी। तालिबान एक हकीकत है इसकी स्वीकृति खुद अमेरिका ने तभी दे दी थी जब जल्में खालिलजाद ने दोहा में उनसे वार्ता शुरू की थी और तालिबान सरकार को स्वीकार्यता की पुष्टि कल अमेरिका के विशेष दूत ने पुनः कर दी जब इस्लामाबाद और नई दिल्ली की यात्रा से पहले उन्होंने संकेत दिए कि वो कुछ शर्तों पर तालिबान सरकार को मान्यता दे सकते है। ( शर्तें कुछ नहीं है केवल फेस सेविंग के लिए जबानी जमा खर्च है )

क्योंकि शुरू से ही भारत सरकार किन्हीं कारणों से तमाम प्रोसिजर से बाहर रही या रखी गई तो ऐसा महसूस किया जाने लगा कि भारत आइसोलेट होता जा रहा है और इसकी पूर्ति के लिए एक कोशिश एनएसए स्तर पर की गई जिसमे  नई दिल्ली में अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों एवं क्षेत्रीय शक्तियों के सुरक्षा सलाहकारों की मीटिंग बुलाई गई।

बैठक में पाकिस्तान और चीन ने हिस्सा नहीं लिया । मीटिंग के बाद 12 सूत्रीय दिल्ली डेकलेरेशन जारी किया गया जिसमें विशेष कुछ नहीं केवल कुछ औपचारिक घोषणाएं थी जैसे अफ़गान भूमि को आतंकवादी संगठनों के लिए उपयोग में न लाया जाए, अल्पसंख्यकों एवम् महिलाओ को उचित हिस्सेदारी दी जाए... आदि आदि।

बैठक में मुख्य रूप से भाग लेने वाले देशों में ईरान और रूस को माना जा सकता है क्योंकि अन्य पूर्व सोवियत देश बेशक आए थे किन्तु उनकी विदेश नीति रूस के प्रभाव में ही है इसे झुठलाया नहीं जा सकता।

अभी भारत सरकार और भारतीय मीडिया द्वारा बैठक का उत्सव मनाया ही जा रहा था कि इसे तारपीडो कर दिया गया और समझा जाना चाहिए कि यह भारतीय विदेशनीति निर्माताओं की भयंकर असफलता है। 

नई दिल्ली डिकलरेशन के साथ ही रूस द्वारा एनएसए मीटिंग को लेकर अपना अलग बयान जारी कर दिया गया जो दिल्ली में जारी व्यक्तव्य से कई बिंदुओं पर अलग है। यहां बेशक पूर्व सोवियत देशों ने रूस द्वारा जारी बयान पर हस्ताक्षर ना किए हो किन्तु उनका समर्थन होने मे कोई संदेह नहीं जताया जा सकता।

दूसरी ओर इसी समय इस्लामाबाद में ट्रॉइका प्लस बैठक का आयोजन किया गया जिसमें अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार के उप विदेशमंत्री सहित रूस, चीन एवम् मेजबान पाकिस्तान ने हिस्सा लिया।

चीन द्वारा अंतिम क्षणों में भारत को बैठक में भाग न लेने के पीछे व्यस्तता बताई गई थी यहां तक कि वर्चुअल रूप से भी शामिल होने से मना कर दिया गया था लेकिन अगले ही दिन उनका प्रतिनिधि इस्लामाबाद में इसी विषय पर आयोजित बैठक में शामिल था।

रूस, चीन और पाकिस्तान की इस बढ़त को देखते हुए अमेरिका को भी अपने कॉर्नर होने की चिंता का अहसास हुआ और वाशिंगटन से अफगानिस्तान पर विशेष दूत ने इस्लामाबाद एवं नई दिल्ली की यात्रा का कार्यक्रम घोषित करते हुए तालिबान सरकार को मान्यता देने के संकेत दिए।

भारतीय नीति निर्माताओं से जो गलतियां हुई उसके पीछे केवल दो ही कारण समझे जा सकते हैं एक तो दूरदर्शिता का अभाव दूसरा आंतरिक चुनावी राजनीति और हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण के कारण दिए गए बड़बोले बयान।

क्योंकि अमेरिका किसी भी स्थिति में दक्षिण एशिया से बाहर नहीं निकलना चाहता और फिलहाल पेंटागन को भारत के अतिरिक्त किसी देश से भी ऐच्छिक सहयोग नहीं मिल रहा है तो उसके पास हालात से समझौता करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा।

साउथ चाइना सी में उसके तमाम प्रयास निष्फल हो चुके है, कवाड़ की कवायद में भारत पर चीन का भयंकर दबाव भी है और उसके चलते चीनी सेनाओं द्वारा निरंतर भारतीय क्षेत्रों में घुसने के समाचार भी मिल रहे हैं लेकिन भारत को किसी अन्य देश से सहयोग नहीं मिल रहा।

इन्हीं दबावों के कारण वर्तमान सरकार चाहते हुए भी अमेरिका को सैनिक अड्डे नहीं दे पा रही। बिखरते कवाड़ समूह को समझते हुए पेंटागन ने दूसरा कवाड़ ग्रुप बनाया जिसमे इजरायल तथा यूएई भी शामिल किया गया लेकिन ये दोनों देश अमेरिका समर्थक होने के बावजूद चीन विरोधी नहीं है और अफगानिस्तान में चीनी हितों के विरूद्ध अमेरिका का साथ देंगे इसमें संशय है क्योंकि यदि ऐसा होता तो UAE अपने यहां हुवई को 5 जी का काम न सौंपती।

इसके अतिरिक्त दिसम्बर तक भारत को रूस से S 400 भी मिलने की तिथि निर्धारित है जिसके लिए यूएस द्वारा भारत पर प्रतिबन्ध लगाए जा सकते है।

विचारणीय प्रश्न है कि भारत सरकार को क्या करना चाहिए जिससे देशहित सुरक्षित रखे जा सके।

मेरे विचार से भारत सरकार को तुरन्त अपने ऊपर से अमेरिका का अंध समर्थक या मोहरा होने का टैग हटाने का प्रयास करना चाहिए। स्थानीय/आंतरिक राजनीति से विदेशनीति की सोच को अलग रखते हुए स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और इच्छा जाहिर करनी चाहिए क्योंकि यही समय है जब यूएस विश्व राजनीति में कुछ कमजोर नजर आ रहा है और हम उसकी अप्रत्यक्ष गुलामी से मुक्त हो सकते है जो हमने खुद स्वीकार की है।

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