क्या भारत की सेना एक मिनी कारगिल लड रही है ? किसी अनहोनी घटना को सामने क्यों नहीं लाया जा रहा ?

प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेई और पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री मियां मोहम्मद नवाज़ शरीफ!

दोस्ती और गलबहियों के साथ वाघा बॉर्डर पार करके एक बस गई जिसके साथ साथ कारगिल और ताबूतों में शहीद हुए जवानों का नजराना भी वापिस आया।

कारगिल आप्रेशन के सम्बन्ध में बहुत से विवादित बयान आए जिसमे प्रमुख था कि इस साज़िश को जानबूझकर होने दिया गया क्योंकि जब पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ करके अपने मौर्च बनाए थे तो जानकारी होने के बावजूद उसे जनता से छिपाया गया।

यद्धपि तत्कालीन सरकार ने ऐसी किसी सम्भावना का सीधा उत्तर नहीं दिया किन्तु मुख्य साजिशकर्ता एवम् भारतीय जवानों के हत्यारे परवेज मुशर्रफ को जरूर सम्मानपूर्वक राजकीय यात्रा पर भारत बुलाया और आगरा समझौता होते होते रुक गया लेकिन उस समझौते की विषय वस्तु आज तक किसी की जानकारी में नहीं आई।

5 अगस्त 2019 को एकतरफा आदेश के साथ जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म कर दिया गया और उसके दो टुकड़े करके लद्धाख को अलग केंद्र शासित क्षेत्र घोषित कर दिया जिसके नतीजे में चीन द्वारा लद्धाख का काफी बड़ा हिस्सा कब्ज़ा किए जाने की चर्चा भी सुनाई दी हालांकि भारतीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्पष्ट रूप से बयान दिया था "न कोई घुसा है, न घुस आया है"

नोट बन्दी के साथ साथ जब कश्मीर से धारा 370 एवम् 35A को संशोधित किया जा रहा था तो दावा किया गया था कि इसके साथ ही जम्मू कश्मीर से आतंकवाद का खात्मा हो जाएगा बेशक उसके कारण भारत सरकार द्वारा कश्मीर घाटी में विश्व का सबसे लंबा चलने वाला कर्फ्यू तथा इंटरनेट बन्दी लागू की गई जिसकी आलोचना कई अंतरराष्ट्रीय मंचों से भी हुई।

इसी कडी में पिछले 18 दिनों से पूंछ क्षेत्र के मेंढर सेक्टर के जंगलों में भारतीय सेना तथा आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ चल रही है। इस संदर्भ में अंतिम समाचार भारतीय मीडिया द्वारा छह दिन पहले दिया गया था और तब तक 11 भारतीय शहीद हो चुके थे एवम् भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा कार्यवाही जारी थी।

इन्हीं परिस्थितियों में कड़ी सुरक्षा के बीच भारतीय गुरहा मंत्री कश्मीर यात्रा पर गए लेकिन उनके चेहरे और आयोजित कार्यक्रमों से कोई भी अनुमान लगा सकता था कि वो कितने दबाव एवं डर के हालात में कश्मीर आए हैं।

इसी दौरान भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल मुकुंद नरवाने भी कश्मीर स्थित loc के अग्रिम मोर्चो पर जवानों का हौसला बढ़ाने खुद आए।

क्योंकि भारतीय मीडिया एवम् सरकार द्वारा भाटा धौलियां एवम् चमरौड़ के जंगलों में चल रही आतंकी गतिविधियों तथा घुसपैठियों से चल रही मुठभेड़ की जानकारी नहीं दी जा रही तो ऐसे में कई संशय और संदेह पैदा होते है।

कुछ जानकारों के अनुसार ये जंगल कुल मिलाकर लगभग 30 स्क्वायर किमी का क्षेत्र है और लाइन ऑफ़ कंट्रोल से न अधिक दूर है न एकदम निकट।

किसी भी प्राकर्मी सेना के लिए मुट्ठी भर आतंकियों को न्यूट्रलाइज करने में यदि 18 से भी अधिक दिन लग रहे हो तो संदेह जताया जा सकता है कि सामने आतंकवादी न होकर किसी शत्रु की प्रोफेशनल आर्मी है और लड रहे आतंकी/शत्रुओं को लगातार सप्लाई लाइन कायम करके दी गई है।

सामान्य परिस्थितियों में यह सम्भव ही नहीं हो सकता कि कमांडो ट्रेनिंग प्राप्त आतंकी भी बिना सेकंड लाइन सपोर्ट के लगातार 18 दिन तक भारतीय सेना जैसी प्रोफेशनल आर्मी का सामना कर सके जबकि पहले बताया गया था कि कथित आतंकियों को तलाश करने के लिए हेलीकॉप्टर तथा ड्रोन भी उपयोग में लाए जा रहे हैं।

यदि यह संदेह किया जाए कि स्थानीय निवासी उनकी मदद कर रहे होंगे तो पिछले दिनों घाटी में सुरक्षा बलों द्वारा बड़ी संख्या में न केवल दो पहिया वाहन जब्त कर लिए गए थे अपितु पूंछ राजमार्ग को भी बंद रखा गया है।

यदि ऐसा ही है तो शक किया जाना चाहिए कि भारत के शत्रुओं ने किसी गलतफहमी या सरकार के नेतृत्व को कमजोर समझते हुए फिर से कारगिल जैसा कोई दुस्साहस करने की जुर्रत दिखाई है।

लेकिन यदि भारत सरकार सोचती है कि जनता से पर्दा रखकर अपनी नाकामी को छुपाना सम्भव है तो यह प्रधान मंत्री जी के सलाहकारों की बहुत बड़ी ग़लती होगी क्योंकि जब मुर्दा बोलता है तो गूंज दूर तक सुनाई देती है।