दिल्ली दी कुड़ी ने कनाडा दा दिल जितिया ! ਦਿੱਲੀ ਦੀ ਪੰਜਾਬਣ ਮੁਟਿਆਰ ਨੇ ਕੈਨੇਡਾ ਦਾ ਦਿਲ ਜਿੱਤਿਆ ।

कहते है कि घर से बेघर होकर यदि दूसरे शहर भी जाकर बसना पड़े तो कम से कम एक पीढ़ी को अपने आराम का त्याग करना पड़ता है लेकिन शायद राकेट युग में पुरानी कहावतें गलत सिद्ध करने वाली पीढ़ी सामने आ गई है।

दूर भारतीयों के लिए दुनियां का दूसरा कोना जहां तेज चलने वाले हवाई जहाज से भी बिना रुके उड़ान भरे तो 16 से 18 घंटो में पहुंचते हैं बेशक तारीख नहीं बदलती और घड़ी के समय में भी ज्यादा फर्क नही दिखता सिवाय AM और PM के अंतर के।

1989 में दिल्ली में जन्मी कमल खेड़ा उर्फ कमलप्रीत खेड़ा कनाडा पढ़ाई के लिए गई जहां इन्होंने साइकोलॉजी एवम् नर्सिंग का कोर्स किया और वहीं बतौर नर्स सेवा शुरू कर दी। लेकिन जनता के प्यार और समर्थन ने इन्हे राजनीति में ला दिया।

अपने व्यवहार एवम् लोकप्रियता के कारण जल्द ही ग्रेटर टोरंटो के मिनी पंजाब कहे जाने वाले ब्राम्पटन से 2019 मेंबर पार्लियामेंट चुनी गई ।

2021 में आहूत मध्यावधि चुनावों में ब्राम्पटन वेस्ट की जनता ने इन्हे दोबारा अपना प्रतिनिधि चुना तथा इनकी कर्मठता देखते हुए प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रुडो ने इन्हे मिनिस्ट्री ऑफ सीनियर्स का कार्यभार सौंप दिया।

अन्तिम बार ये 2014 में भारत आईं थीं तो इन्होंने बताया कि भारत और कनाडा की राजनीति में कितना अवश्वसनिय अंतर है क्योंकि यहां तो कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कोई मंत्री या खुद प्रधान मंत्री बाज़ार के किसी स्टोर से सामान खरीदते हुए नजर आ सकता है।

वैसे इनके मंत्रालय के नाम से ही अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि वहां बुजुर्गो की देखभाल एवम् सम्मान के लिए अलग से मंत्रालय बनाया हुआ है।

दिल्ली की कुड़ी को सात समुंदर पार जाकर दिल्ली दा नां रोशन करन ते लोकां दा दिल जित्तन लई असि दिली मुबारकबाद देने आँ।।

 

 

 

 

 

भारत तो क्या हिंदुस्तान ( अविभाजित हिंदुस्तान ) की जनता के बारे में ऐसा सोचना भी कल्पना से उपर की बात है लेकिन तर्को के आधार पर झुठलाया भी नहीं जा सकता।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला हिन्दुस्तानी समाज बुद्ध, महावीर, नानक, गांधी और अपने पीर पैगम्बर की शिक्षाएं भुलाकर रवांडा की तरह अपने ही बहन भाइयों और बच्चो के खून से रंगे हाथ लेकर उत्सव मनाने की मानसिकता रख सकता है ? ...

शहीदों की चिताओं पर भी खड़े होंगे झमेले, ये तो कभी सोचा भी ना था !

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यहीं आखिर निशान होगा ! बहुत सुनते थे हाल ए दिल मगर काटा तो कतरा ए खू ना निकला। कुछ ऐसे ही शब्दो के साथ अपनी आबरू के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक शहीदों की आत्मा चीत्कार रही होगी जब मालूम पड़ेगा कि 1972 से उनके बलिदान के सम्मान में निरन्तर जल रही अमर जवान ज्योति को भारत सरकार ने बुझाने का निर्णय लिया है। ...

नेजेबंदी अर्थात टेंट पेगिंग ! घोड़े की पीठ पर बैठकर खेला जाने वाला प्राचीन खेल जो पंजाब में आज भी लोकप्रिय है।

यद्धपि विश्व में घोड़े की पीठ पर बैठकर खेले जाने वाले खेलों में पोलो अधिक प्रसिद्ध हैं लेकिन आज भी पंजाब विशेषकर पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) में नेजेबंदी अपनी लोकप्रियता कायम रखे हुए है। ...