महाशक्तियों की प्रोक्सी के लिए ग्रे एरिया बन चुका दक्षिण एशिया अपनी ही सरकारों की मूर्खताओं के कारण भविष्य के नरक की ओर अग्रसर।

फिलीस्तीन, लेबनान, सीरिया, यमन, अफगानिस्तान और इराक़ जैसे कई देशों के नाम अक्सर सुनते हैं और आर्कायिव के चित्रों को देखकर हैरानी होती हैं कि ये कितने खूबसूरत मुल्क थे जिनके नागरिक शांतमय जीवन गुजारते थे।

लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि वही लोग आपस मे लडने लग गए और उनके बच्चो के हाथो में कलम की जगह बारूद थमा दिया गया ? 

शान्ति और विकास से हिंसा और युद्ध की ओर धकेलने के लिए केवल एक वाक्य बोला जाता है कि यदि तुमने सामने वाले को नहीं मारा तो वो तुम्हे मार देगा और फिर धर्म की रक्षा के लिए धर्म के मानने वालो की हत्याएं होने लगती हैं। इस्लाम को मानने वाले यमन के कबीले इस्लाम के केंद्र सऊदी अरब पर हमले करते है और इस्लाम को अपने देश में थोंपने वाला जिया उल हक यमन के निहत्थे मुस्लिम नागरिकों पर हवाई हमले करके इस्लाम की रक्षा करता है।

यहां इस्लाम धर्म का नाम धर्म विशेष को चिन्हित करने के लिए नहीं लिखा गया अपितु ऐसा सभी देशों में होता रहा है चाहे सलीबी जंगे हो या यहूदीयों का होलोकास्ट क्योंकि हिंसा और धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं होता।

हिंसा और गृह युद्ध या युद्ध का सम्बन्ध यदि होता है तो केवल राजनीतिक स्वार्थों से या अपने अपने आर्थिक स्वार्थों से होता है बेशक उसके लिए बस्तियां, शहर या देश के देश बर्बाद हो जाए अथवा कर दिए जाए।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद का वर्ल्ड ऑर्डर और इतिहास उठाकर देखा जाए तो कथित विकास जिन देशों में हुआ है उनके अपने यहां उत्पादन अथवा प्राकृतिक संसाधन वैसे कभी नहीं रहे जैसे थर्ड वर्ल्ड के मेहनत कश देशों के पास थे लेकिन विकास उनका हुआ जिन्होंने युद्ध के मैदान सजाए और विकासशील देशों को विकसित नहीं होने दिया।

लेकिन कोई भी महाशक्ति कोल्ड वार के बावजूद खुद कभी युद्ध को अपने आंगन तक लाने से परहेज़ करती रही क्योंकि गरीब देशों के प्राकृतिक संसाधनों को लूटना भी जरूरी था तो उन्ही को युद्ध के अखाड़े बना कर रखा।

समय के साथ साथ युद्ध के तौर तरीके भी बदल गए और अब प्रोक्सी का समय है जिसके लिए रेगुलर आर्मी रखने की जरूरत नहीं होती केवल कुछ मूर्ख आबादी, बिके हुए नेता और आत्महत्या की शौकीन भीड़ चाहिए होती हैं।

जिसके बाद शत्रु देश को यदि वहां का नेतृत्व या रियासत समझदार ना हो तो उसे ब्लीड करने के लिए कट करते रहना होता है जो युद्ध से जीतने की तुलना में बहुत कम खर्च पड़ता है और सफलता की गारंटी।

भारत के उत्तर पूर्वी हिस्से की सेवन सिस्टर स्टेटस भारत के लिए हमेशा सामरिक एवम् आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। कभी स्वतंत्र रहे इस क्षेत्र को औरंगजेब के समय में सल्तनत ए हिन्द का हिस्सा बनकर दिल्ली के अंतर्गत लाया गया जिसके बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने भी इसका महत्व समझते हुए इसके साथ जुड़े बर्मा ( वर्तमान म्यांमार ) को भी हिंदुस्तान में मिला लिया।

क्योंकि लंबे समय तक ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम रहे है तो दक्षिण एशिया या अविभाजित हिंदुस्तान के नागरिकों का ध्यान यूरोप और पश्चिम की ओर अधिक रहा है जबकि विश्व की अधिकांश आबादी भारत के उत्तर पूर्व या पूर्व की ओर रहती हैं।

वैसे भी चीन से बढ़ते विवाद को देखते हुए भारत सरकार को उत्तर पूर्वी राज्यों की सुरक्षा एवम् शांति पर अतिरिक्त ध्यान देना चाहिए था किन्तु कश्मीर की तरह यहां भी छिछोरा राजनीति और ओछी सोच के कारण गम्भीर स्थिति पैदा हो गई है।

बांग्लादेश से जुड़ा एक राज्य है त्रिपुरा जिसकी सीमा भारत के ही दूसरे राज्य आसाम से मिलती हैं। कभी यह भी आसाम राज्य का हिस्सा हुआ करता था लेकिन बाद में इसे अलग राज्य बना दिया गया।

गत दिनों आसाम एवम् त्रिपुरा राज्यों में सरकारी तौर पर व्यापक हिंसा हुई एवं राज्यों की पुलिस द्वारा गोलीबारी में कई जाने जाया हुई बेशक उसके बाद भी कोई सबक नहीं सीखा गया।

बांग्लादेश में लगातार अशांति पैदा करने के लिए प्रोपेगेंडा मुहिम चलाई जाती रही जिसमे भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिम के विरूद्ध बजरंग दल जैसे उग्रवादी संगठनों द्वारा किए गए हमलों/ घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर बताया गया और उसके परिणाम स्वरूप सामाज में नफरत की दीवारें मजबूत होती रही।

गत दिनों दुर्गा पूजा के समय किसी शरारती तत्व द्वारा गणेश जी की मूर्ति के पैरों में मुस्लिम समुदाय की पवित्र क़ुरआन रखकर अफवाह फैला दी गई कि हिंदुओ द्वारा कुरान पाक की बेअदबी की जा रही है।

नतीजा तो स्वाभाविक है कि भीड़ द्वारा आक्रमण ही था और हमले, दंगे में दूसरी अल्पसंख्यक भीड़ द्वारा जवाब देना था जिसके बाद सामने वाले से पहले सामने वाले पर वार करना था जिसे गृहयुद्ध कहा जाता है।

जब भारत के यूपी, बिहार, एमपी से लेकर गुजरात तक की मुस्लिमों पर अत्याचार की ख़बरें दुनियां भर में दिखाई जाती हैं तो ऐसा कैसे ना होता कि बांग्लादेश के हिन्दुओं की खबरे त्रिपुरा में ना दिखाई जाती बेशक उसमे से ज्यादातर फेक वीडियो बने हो या किसी दूसरी जगह के किसी दूसरे सन्दर्भ मे हो।

जब भारतीय मीडिया के मुख्य चैनल ही वीडियो गेम की क्लिप को पाकिस्तान पर हमला और करेंसी नोटों में माइक्रो चिप लगी होने की खबरें देते हो तो जनता से क्या उम्मीद कर सकते है एक क्लिप में बीजेपी की कोई रुचि पाठक नामक प्रवक्ता दावा करती देखी गई है कि ब्रिटिशर्स द्वारा 99 ईयर की लीज पर भारतीयों एवम् पाकिस्तानियों को कथित आज़ादी मिली हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुई हिंसा और अत्याचार का जवाब विश्व हिंदू परिषद के आतंकियों द्वारा भारतीय त्रिपुरा के मुस्लिम समुदाय से पूछा गया और तू नहीं तो तेरे नाम वाला सही के आधार पर भड़काऊ धार्मिक जलूस को बदहवास आतंकी भीड़ में बदल कर समुदाय विशेष को टारगेट करके उनके धार्मिक स्थलों को शहीद करने तथा घरों सहित अन्य भवनों में आग लगाने के समाचार भी मिले हैं।

इस भड़के गृहयुद्ध की आशंका NewsNumber.Com पर ही कई रिपोर्ट्स में जाहिर की जा चुकी हैं क्योंकि विश्व के वार मोंगर्स को दक्षिण एशिया ही अगला प्रोक्सी ग्रे एरिया बनाना निश्चित किया गया लगता है।

उसमे भी भारत का उत्तर पूर्वी क्षेत्र यदि अशांत होता है तो उसका प्रभाव भारत के साथ साथ चीन एवम् मायनमार सहित थाईलैंड, लागोस से ताइवान तक पहुंच सकता है या तीसरी ताकतों को यहां अड्डे बनाने के लिए बहाने के साथ साथ दखल देने का अवसर भी देता है।

क्योंकि अफगानिस्तान को लेकर रूस, चीन ने न केवल स्थिति स्पष्ट कर दी है अपितु पाकिस्तान एवम् उज़्बेकिस्तान, तजाकिस्तान ने भी साफ कर दिया है कि वो वहां ग्रे ज़ोन नहीं बनने देंगे।

फिलहाल आवश्यकता है कि सबसे पहले भारत सरकार एवं बीजेपी के नेताओ को अगली पीढीयों की शांति सुरक्षा के लिए अक्ल से काम लेते हुए नफरत से भरे बयान देने से परहेज़ रखना चाहिए और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले अपने ही कार्यकर्ताओं पर सख्ती से कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए जिसकी आशा फिलहाल तो नहीं लगती क्योंकि चुनाव आने वाले हैं।।

( Photo courtesy to abp news )