अबकी बार ट्रंप सरकार ! लेकिन यदि कोई प्रवासी भारतवंशी अपने माता पिता या भाई बहन के लिए सरकार की आलोचना करेगा तो स्वीकार्य नहीं होगा।

वसुधैव कुटुंबकम् का मंत्र जाप करते करते यदि कोई सरकार अपनी ही मिट्टी के बेटे बेटियां को सबक सिखाने पर आ जाए तो उसे क्या कहना चाहिए ?

भारत सरकार द्वारा कनाडा में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों के विरूद्ध अमानवीय व्यवहार करने का समाचार भारतीय मीडिया द्वारा प्रकाशित किया गया है और यहां यह भी सर्वविदित है कि आजकल अधिकांश भारतीय मीडिया हाउस सरकारी विचारधारा को प्रचारित करने का आरोप झेल रहे हैं।

न्यूज़ 18 नामक मीडिया हाउस द्वारा प्रकाशित यह समाचार एवम् ट्वीट देख कर किसी भी प्रवासी भारतीय के दिल की धड़कने तेज हो सकती हैं जिसके अनुसार कनाडा में रह रहे भारतीय मूल के निवासियों को भारत का वीजा या ओवरसीज सिटिज़न ऑफ़ इंडिया कार्ड निरस्त किया जा रहा है।

इसके पीछे कारण यह बताया गया है कि कनाडा के भारतीय आर्थिक एवम् नैतिक रूप से भारत सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन का समर्थन करते हैं।

जिनको ओवरसीज सिटिज़न ऑफ़ इंडिया कार्ड के विषय में जानकारी नहीं है उन्हे इसकी जानकारी जरूर लेनी चाहिए। 1991 में तत्कालीन सरकार की आर्थिक नीतियों या गलतियों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि रोजमर्रा के खर्चों के लिए भारत सरकार को अपना रिजर्व गोल्ड गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

क्योंकि चंदशेखर सरकार की साख भी ख़तम हो चुकी थी तो भारत में विदेशी निवेश भी नहीं आ रहा था और सम्भावना जताई जा रही थी कि भारत फेल्ड स्टेट / दिवालिया घोषित हो सकता है।

इसके बाद डॉक्टर मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री बने और भारतीय बैंकिंग एवम् मुद्रा की साख के लिए उन्होंने सबसे पहले विदेशो में रह रहे भारतीय मूल के भारतीयों की ओर आशा की नजर से देखा और उन्हे उनके प्यार के बदले एक व्यवहारिक सम्मान देने का निर्णय लिया जिसे प्रवासी भारतीय नागरिक कार्ड या ओवरसीज सिटिज़न ऑफ़ इंडिया कार्ड कहते है।

यह कार्ड उन भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को दिया जाता हैं जो स्वयं या उनके माता पिता 1952 के बाद विदेशो में बसे हो और उससे पहले भारतीय नागरिक रहे हो चाहे जन्म के आधार पर या माता पिता के आधार पर। ओसीआई कार्ड धारकों को मुख्य रूप से जो सुविधा प्राप्त होती हैं उसमे वो कभी भी बिना कोई वीजा लिए उस कार्ड के आधार पर भारत की यात्रा कर सकते है।

ओसीआई कार्ड धारकों में अधिकांश संख्या ब्रिटेन और कनाडा के भारतीय मूल के नागरिकों की होती हैं और उसमे भी विशेष रूप से पंजाब के निवासियों की।

वैसे तो पंजाबियों द्वारा सदियों से हिजरत करते रहना सामान्य बात रही है जिसके पीछे इस संस्कृति का मेहनती होना तथा समयानुसार अपने को ढाल लेना है। लेकिन 1984 के हादसों के बाद बड़ी संख्या में पंजाब से युवकों ने कनाडा के लिए पलायन किया ।

उस समय में कनाडा सरकार को भी वर्क फोर्स की जरूरत थी तो मेहनती पंजाबी युवकों का स्वागत हुआ तथा बड़ी संख्या में भारत सरकार द्वारा धार्मिक/ राजनीतिक  रूप से प्रताड़ित होने एवम् अल्पसंख्यक होने के कारण धार्मिक भेदभाव की आड़ में भी वहां राजनीतिक शरण मिली थी।

क्योंकि अधिकांश युवकों ने अपनी मेहनत से और प्राप्त अवसरों का लाभ उठाते हुए खुद को वहीं स्थापित कर लिया लेकिन पीछे छूट गए मां बाप, भाई बहन और पंजाब को नहीं भुला पाए बेशक सुपर वीजा पर उन्हे दो दो साल के लिए कनाडा बुलाते रहते हो।

खुद भी भारत और पंजाब आते रहते है तथा और कुछ करे या ना करे लेकिन पुश्तैनी गावों में बेहतरीन सी कोठी ( बेशक बाद में वहां बिहारी भय्ये रहे ) बनवाते है और किसी न किसी धार्मिक स्थल में सहयोग करते है। क्योंकि ओसीआई कार्ड होने के कारण कभी भी आने की चिंता नहीं होती थी तो भारत में किसी भी रूप में निवेश करने से भी नहीं हिचकते थे ( मकान बनवाना या ट्यूबवेल लगवाना या ट्रेक्टर लेना भी निवेश ही है )

2014 में बकौल राकेश टिकैत भारत में कॉरपोरेट सरकार ने सत्ता संभाल ली तथा क्रोनी केपिटलजम का नंगा नाच शुरू हो गया जिसके आरोप कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी लगाते हैं। इन्हीं के कारण तीन कानून पास किए गए जिनके विरोध में दिल्ली बॉर्डर पर किसानों द्वारा धरना प्रदर्शन करते हुए एक साल होने को है ( आज तक विश्व में सबसे लंबा चलने वाला सामूहिक विरोध प्रदर्शन )

किसान आंदोलन को कुचलने के लिए सरकारी तंत्र द्वारा कुप्रयास जारी रहे जिसकी हद लखीमपुर खीरी में केंद्रीय मंत्री के भाषण के बाद किसानों को गाड़ी से कुचले जाने तक पहुंच चुकी है।

सर्दी, गरमी, बरसात के अतिरिक्त नरम गद्दो और कोठियों में रहने वाले प्रवासी भारतीय बच्चो के बूढ़े मां बाप सड़क पर ट्रॉलियों में वक्त गुजारने के साथ साथ खालिस्तानी, मवाली, ठलुए जैसी गालियां भी सुनने को मजबूर हुए जिसका दर्द अपने ही खून को ना होता तो इतिहास उन्हे हराम करार देता।

उसी दर्द को महसूस करते हुए विदेशों में भी आवाज़ बुलंद हुई जिससे भारत सरकार को मानवाधिकारों से लेकर लोकतंत्रिक व्यवस्था तक कई असहज सवालों का सामना करना पड़ा।

संवैधानिक अधिकार प्राप्त अभिव्यक्ति की आज़ादी का उपयोग करते हुए यदि कैनेडियन भारतीयों के वीजा एवम् ओसीआई कार्ड रद्द करने के निर्णय को मूर्खता पूर्ण एवम् भारत की अखंडता पर डेंट मारने वाला फैसला करार दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसके कुप्रभाव क्या हो सकते है ? 

यदि भारत सरकार यह सोचती है कि कनाडा में रह रहे भारतीय पंजाबियों को भारत आने से रोककर उनकी सोच बदली जा सकती है तो यह मूर्खता ही है क्योंकि बेशक कनाडा में भी सिख बड़ी संख्या में रहते हो किन्तु उनके परिवार, नाते रिश्तेदार एवम् धार्मिक स्थल भारत में ही है जिसके कारण उनका नाता कभी नहीं टूट सकता।

यदि इस प्रकार के भावनात्मक ज़ुल्म किए गए तो निसंदेह एक बड़ा वर्ग अपने लिए भारत से किसी अलग स्वतंत्र हिस्से की मांग कर सकता है !

जैसा कि न्यूज 18 ने समाचार दिया है उसके आधार पर यदि भारत सरकार ने कोई ऐसा निर्णय लिया है या लेने वाली है तो यह सावरकर - जिन्ना थियरी का पुनर्जन्म होगा यदि बीजेपी या आरएसएस ऐसा ही चाहती है तो किसी प्रकार का सुझाव अथवा विश्लेषण बीन बजाने जैसा ही होगा।

इसके अतिरिक्त यह हैरानी का विषय है कि तालिबान, नागा विद्रोहियों और विभिन्न देश विरोधी ताकतों से सरकार बातचीत और समझौते कर सकती हैं किन्तु जब किसानों और पंजाबियों का सवाल आता है तो हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान