Exile of peace ! शान्ति की धुरी भारत लेकिन यदि भारत सरकार विश्व शांति की नीतियां लागू करे तो !

यदि याद हो तो पहले चाबी से चलने वाली घड़ियां होती थी जिनका अहम पुर्जा एक्सिल कहलाता था। यद्धपि एक्सिल को हिंदी में धुरी कहा जाता है लेकिन घड़ी में इसी पुर्जे से समय की गति तय होती थी और इसमें लगे स्प्रिंग को चाबी भरकर चलने की शक्ति मिलती थी।

माना जाता है कि विश्व व्यापार समुद्र के भरोसे होता है और जिसका समुद्री रास्तों पर वर्चस्व होगा विश्व व्यापार एवम् समृद्धि भी उसके हिस्से में आएगी।

1980 के बाद से चीन ने खुद को आर्थिक रूप से मजबूत करने की नीति अपनाई और दुनियां भर की आलोचनाओं एवम् धमकियों के बावजूद शांति से अपने रास्ते पर चलता रहा जिसके परिणाम स्वरूप आज अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी बहुत पीछे धकेल दिया निसंदेह इसका अफसोस तो यूएस को होना ही था।

बराक ओबामा के समय से ही अमेरिका ने निश्चय कर लिया कि यदि जीवित रहना है तो चीन की आर्थिक शक्ति और भारतीयों की बौद्धिक क्षमता पर रोक लगाना जरूरी होगा साथ ही भारत को चीन के सामने सैनिक शक्ति के रूप में खड़ा करना होगा जिससे दोनों बड़े देश आपस मे ही उलझ जाए और अमेरिका का वर्चस्व कायम रहे।

इतिहास गवाह है कि चीन की सभ्यता ने यदि कोई युद्ध जीते है तो बिना लड़े जीते है और सदैव धैर्य पूर्वक उचित समय की प्रतीक्षा की है। अमेरिका ने अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने और चीन को रोकने के लिए साउथ चाइना सी का मुद्दा उठाया तथा भारत की पहली सरकारों से सहयोग की अपेक्षा की लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने इसे भारतीय हितों के विरूद्ध समझा और युद्ध को इस क्षेत्र से दूर रखने के लिए चीन से शांति एवम् व्यापारिक समझौते किए जिसमे मुख्य विवादित सीमा को अगली पीढ़ी के लिए टालना तथा हथियार रहित पेट्रोलिंग थी।

2014 में भारत की सरकार और नीतियां बदल गई जिसके नतीजे में चीन ने न केवल भारतीय पड़ोसी देशों की मदद से भारत को चारो ओर से घेरना शुरू कर दिया अपितु भारत के अंदर तक घुस आया जो आज तक "घुसा हुआ है"

पेंटागन ने भी अपने हितों की रक्षा के लिए अधिकतम प्रयास किए लेकिन अभी तक तो सफल नहीं हुआ जिसका उदाहरण ताइवान पर राष्ट्रपति बाइडेन के बयान पर व्हाइट हाउस द्वारा सफाई पेश करना है।

क्योंकि यूएस जानता है जनसंख्या के कारण भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसे चीन से भिड़ाया जा सकता है तो क्वाड गुट बनाया गया जिसमे आर्थिक सहायता जापान ने देनी थी और सामरिक भारत ने बाकी निर्देश पेंटागन और ऑस्ट्रेलिया ने देनी थी।

क्योंकि चीन द्वारा भारतीय क्षेत्रो पर कब्जे और भूटान से संधि के बाद चीन को लगने लगा कि भारत द्वारा अब कोई कार्यवाही सम्भव नहीं है तो दूसरे लक्ष्य जापान पर ध्यान केंद्रित कर दिया जिसे कमोबेश अमेरिका का उपनिवेश ही समझना चाहिए।

गत दिनों अमेरिकी रक्षा मंत्री द्वारा जॉर्जिया और यूक्रेन का दौरा किया गया जिससे पहले ब्लैक सी के अंदर यूएस द्वारा युद्धाभ्यास किया गया था। इन घटनाओं को रूस ने गम्भीरता से लिया और उसे अपने विरूद्ध रेड लाइन क्रॉस करने की संज्ञा दी।

लेकिन इसके बावजूद भी अमेरिकी प्रयास कम नहीं हुए और भारतीय सैन्य अधिकारियों तथा मंत्रियों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन को धमकियां दी जाती रही बेशक चीन ने भी भारत को उलझाए रखने के लिए वार्ताएं जारी रखी जिनका कोई नतीजा नहीं निकल सकता ( 14 वें दौर की वार्ता भी होने वाली है ) हालांकि भारत द्वारा अरूणांचल प्रदेश में ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती की घोषणा कर दी गई है।

चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स एवम् साउथ चाइना पोस्ट के सन्दर्भ से समाचार है कि रूस एवम् चीन द्वारा प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में युद्धाभ्यास किया गया।

पैसिफिक ओशन या प्रशांत महासागर धरती पर सबसे बड़ा एवम् महत्वपूर्ण महासागर है जिसके पूर्वी छोर पर जापान स्थित है एवम् यहीं मेरिना द्वीप समूह है जहां विश्व का सबसे गहरा समुद्र तट स्थित है।

ग्लोबल टाइम्स के अनुसार चीन एवम् रूस के युद्धपोतों ने यहां अभ्यास करते हुए जापान को चारो ओर से घेर लिया था। इसका सीधा अर्थ जापान को धमकी भी समझा जा सकता है जिससे वो भी यूएस की चीन विरोधी नीतियों से हाथ खींच ले।

मुख्य विषय पर आते है कि कैसे भारत शांति की धुरी का उचित दिशा देने वाला एक्सिल बन सकता है ?

क्योंकि महाशक्तियां कभी भी खुद आमने सामने का युद्ध नहीं करती और अमेरिका का इतिहास रहा है कि उसने बेशक अधिकतम युद्धों में हिस्सा लिया हो लेकिन कभी खुद युद्ध नहीं किया और यदि किसी देश में सेनाए भेजी भी है तो अपने सहयोगियों को साथ लेकर गया है फिर चाहे वो अफगानिस्तान जैसा भित्ति भर का देश रहा हो।

बढ़ते ऊर्जा संकट एवम् रूस द्वारा यूरोपियन देशों को गैस सप्लाई के कारण यूरोप का नाटो संगठन भी कमजोर हो चुका है जिसमे एक बड़ा डेंट तुर्की ने लगाया है जिसने कई यूएस समर्थक देशों के राजदूतों को परसोना नॉन ग्रांटा करार दे दिया। इसके अतिरिक्त जर्मनी भी गैस के लिए रूस पर निर्भर है।

अब यदि भारत सरकार अमेरिका का अंध समर्थन ना करते हुए शांति प्रयासों को गति दे तो निसंदेह अमेरिका द्वारा रूस चीन को चुनौती देना सम्भव नहीं होगा।

और यदि अमेरिकी चुनौती या युद्ध की धमकियां ही समाप्त हो जाती हैं तो फिर कोई प्रश्न ही बाकी नहीं रहता लेकिन यूएस ऐसा कैसे कर सकता है कि वो अपनी समृद्धि को दांव पर लगा दे ?

इसका भी समाधान संभव है यदि देशों और सरहदों के स्वार्थ छोड़कर सभी इंसानी भलाई के निश्चय पर सोचने लगे। यह आज का अटूट सत्य है कि उत्पादन में चीन की बराबरी फिलहाल तो कोई नहीं कर सकता। यदि यूएस और चीन मिलकर किसी व्यापारिक समझौते तक पहुंच जाएं तो सभी विजेता होंगे बेशक इसके लिए यूएस एवम् यूरोप को अपनी मुद्रा का करेक्शन करना होगा और किसी ऐसे बिंदु को स्वीकार करना होगा जहां उत्पादन एशियाई देशों में हो तथा वितरण पश्चिमी देशों के माध्यम से।

यद्धपि यह केवल एक आदर्श स्थिति है जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद बनाए गए वर्ल्ड ऑर्डर को निरस्त करती हैं लेकिन फिर भी let us hope for the best और विश्व को किसी भी युद्ध से दूर रखने के लिए सोचना चाहिए अन्यथा इसके बाद तो पत्थरों से ही लडना पड़ेगा।

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