वैश्विक शक्तियों की कठपुतली बनते दक्षिण एशिया में अशांति की लहर आने की आशंका !

मिडल ईस्ट के तेल भंडार, तानाशाही सल्तनत के नाम पर काबिज परिवार और सीरिया, लेबनान, यमन से लेकर मिस्र तक फैली अशांति एवं गृह युद्ध या गृह युद्ध जैसे हालात। 

समाचार सुनते ही रोंगटे खडे हो जाते और सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या वास्तव में जनता अपना भला बुरा नहीं समझती और शांति से प्रगति नहीं चाहती ? 

बेशक आंदोलकारी या विद्रोही भी जानते होंगे कि वो गलत रास्ते पर चल रहे हैं किन्तु वापिस नहीं लौट सकते क्योंकि विश्व को संचालित करने वाली गोपनीय शक्तियों के दरवाजे वापसी के लिए नहीं होते।

निसंदेह इस सम्बन्ध मे दक्षिण एशिया तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में रहा है क्योंकि इस क्षेत्र ने दुनियां को बुद्ध, महावीर का अहिंसा दर्शन दिया और गांधी जैसा महामानव दिया जिसने अपने जीवन में अहिंसा को व्यवहारिक तौर पर अपना कर दिखाया।

1947 के गृहयुद्ध जैसे हालात को छोड़ दे तो आमतौर पर यहां वो सब नहीं हुआ जो धरती के अन्य क्षेत्रों में हुआ था यद्धपि अपवाद स्वरूप कुछ घटनाओं को याद रखा जा सकता है किन्तु उनके पीछे की ताकतों और कठपुतलियों को भी सामने लाने में देर नहीं लगाई गई।

NewsNumber.Com पर ही इससे पहले कई बार आशंका जताई गई थी कि दक्षिण एशिया को महाशक्तियों द्वारा ग्रे ज़ोन बनाकर युद्ध का अखाड़ा बनाया जा सकता है और इसके लिए जनता एवम् नेताओ का दुरुपयोग कैसे किया जाता है इसे एजेंसियां बेहतर तरीके से जानती है।

विगत रात पाकिस्तान का लाहौर वहां के कथिक धार्मिक संगठन तहरीके लब्बैक पाकिस्तान और पुलिस का रण क्षेत्र बना हुआ है जिसमे दो पुलिस कर्मियों की वाहन द्वारा कुचल कर मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है ( जिस प्रकार भारत के लखीमपुर खीरी में किसान मारे गए थे )

प्रदर्शन कर रहे लब्बैक के प्रदर्शनकारियों की व्यापक गिरफ्तारियां हुई है और यह रिपोर्ट लिखे जाने तक लाहौर के निकट शाहदरा में हालात बेकाबू है।

इससे पहले कि कोई स्वतंत्र विश्लेषण किया जाए पहले इसका इतिहास जानते है।

फ़्रांस में पैगम्बर मुहम्मद साहब के आपत्तिजनक चित्र प्रकाशित होते है जिसके विरूद्ध दुनियां भर के मुस्लिम आवाज़ बुलंद करते हैं लेकिन फ्रांस अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उस मैगजीन के विरूद्ध कोई कार्यवाही करने से मना कर देता है।

फ़्रांस की वस्तुओं के बहिष्कार की मुहिम शुरू होती हैं लेकिन केवल पाकिस्तान और तुर्की की सरकारें आधिकारिक तौर पर फ्रांस से आपत्ति दर्ज कराती हैं जबकि अन्य कथित मुस्लिम देशों में केवल जनता द्वारा विरोध किया जाता हैं और फ्रांसीसी सेंट्स को बाज़ार से बाहर निकाला जाता हैं।

फ़्रांस सरकार बैकफुट पर आ जाती हैं और मामला/ विरोध शांत हो जाता हैं लेकिन पाकिस्तान का धार्मिक / राजनीतिक संगठन लब्बैक पाकिस्तान से फ्रांसीसी राजदूत की निकासी की मांग लेकर प्रदर्शन शुरू कर देता है जो सरकार द्वारा दबा दिया जाता हैं।

इसी बीच  फ्रांस के एक स्कूल में वहां का टीचर अपने स्टूडेंट्स को पैगम्बर साहब के वहीं आपत्तिजनक प्रकाशन दिखा कर अभिव्यक्ति की आज़ादी पढ़ाने लगता है जिसका व्यापक विरोध भी होता हैं और इसका अंत एक मुस्लिम युवक द्वारा उस अध्यापक की हत्या एवम् तुरन्त पुलिस द्वारा हत्यारे को गोली मारने से हो जाता हैं।

फ़्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रो इसे गम्भीरता से लेते है और इसके विरोध में उन्ही चित्रों को सरकारी स्तर पर प्रकाशित कर देते है जिसके प्रत्युत्तर में पाकिस्तान लब्बैक द्वारा पुनः फ्रांसीसी राजदूत को निकालने की मांग जोर पकड़ जाती हैं।

यहां यह भी याद रखना चाहिए कि जब पहली बार लब्बैक ने विरोध जताया था तो इमरान खान सरकार ने तात्कालिक लाभ के लिए कुछ झूठे सच्चे वायदों के साथ प्रदर्शन खत्म करा दिया था लेकिन बाद में लब्बैक के प्रमुख की मृत्यु के बाद उनके बेटे को संगठन प्रमुख बनाए जाने को मान्यता नहीं दी और साद हुसैन रिज़वी को गिरफ्तार कर लिया।

जिस प्रकार भारत में रासुका जैसा कानून है कुछ इसी प्रकार के कानून के तहत साद हुसैन रिज़वी को गिरफ्तार किया गया है बेशक अदालत ने उनके विरूद्ध कोई अपराधिक सबूत न होने के कारण उन्हें छोड़ने का आदेश दिया है।

इन परिस्थितियों में लब्बैक के हज़ारों समर्थकों ने लाहौर में प्रदर्शन शुरू किया और कोई असर न होता देखकर लाहौर से इस्लामाबाद के लॉन्ग मार्च की घोषणा कर दी जिसे पाकिस्तानी पंजाब के पुलिस प्रमुख ( डीजीपी ) ने रोकने की घोषणा के साथ ही लाहौर को छावनी बना दिया।

इस तमाम रिपोर्टिंग का उद्देश्य न्यूज देना नहीं है अपितु इसका सम्बन्ध भारत सहित अन्य दक्षिण एशिया की जनता को सचेत करना है कि कैसे वैश्विक शक्तियां साधारण व्यक्ति की भावनाए भड़काकर उसे भीड़ में बदल देती हैं और वो सब करा लेती हैं जिसकी जानकारी उसे खुद नहीं होती।

यदि थोड़ा पीछे देखे तो भारतीय पंजाब में अचानक गुरुद्वारों में बढ़ती बेअदबी की घटनाएं नजर आएंगी, छोटे पुलिस कर्मियों द्वारा धार्मिक आधार पर बदसलूकी के वीडियो नजर आएंगे और आर्यन खान जैसे पक्षपात पूर्ण निर्णय नजर आएंगे जिनका धीरे धीरे गहरा असर पड़ता है।

यदि पाकिस्तान की अशांति के पीछे फ्रांसीसी राष्ट्रपति को भी जिम्मेदार बना दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि सरकारें और नेता भी दूध के धुले नहीं होते और कई बार अपने ही समाज में दंगे फसाद, नरसंहार को अपने चुनावी हितों में देखते हुए शवो पर उत्सव मनाने से नहीं चूकते।

भारत के सन्दर्भ में समय समय पर विभिन्न नेताओ द्वारा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हेतु दिए गए बयान या एक धर्म विशेष में आस्था रखने वाले समाज को दूसरे देश में जाने / भागने की धमकियां भी बहुत सी आशंकाओं को जन्म देती हैं।

उम्मीद करनी चाहिए कि सरकारों और सरकारी एजेंसियों के नीति निर्धारकों को अपने बेटे, बेटियां या नाती पोतों को देखकर अहसास होगा कि भविष्य उनसे शांत और समृद्ध दुनियां की आशा रखता है, आंख के बदले आंख आज नहीं तो कल उनकी अपनी पीढ़ी को अंधा बना देगी और इतिहास कभी माफ नहीं करेगा जैसे रावण, कंस और हिटलर तथा मुसोलिनी को माफ नहीं किया गया।।

 

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