जलेबी का सिरा और वर्तमान भारत सरकार की विदेश नीति एकदम सीधी होती हैं लेकिन नजर नहीं आती।

दक्षिण एशिया में शायद सबसे अधिक बिकने वाली मिठाई का नाम "जलेबी" हैं जिसे फनल स्वीट भी कहा जाता है और फ़नल का अर्थ यदि गलत नहीं है तो पाइप जैसा कुछ होता है जिसमे घुसने के बाद वापिस मुड़ना आसान नहीं होता और निकलने के लिए दूसरे सिरे तक खुद को धकेलना मजबूरी होती हैं।

वैसे आम बोलचाल में जब किसी की धूर्तता की आलोचना करनी होती हैं तो कहा जाता है कि फलाना बंदा एकदम जलेबी की तरह सीधा है शायद इसीलिए कि जलेबी बेशक बहुत मीठी होती हैं किन्तु एक तो इसका आदि अंत मालूम नहीं पड़ता कि कहां से शुरू होती हैं और कहां खत्म तथा दूसरा यदि खाते समय जरा सी भी चूक हो जाए तो कपड़े गंदे होने की संभावना रहती हैं।

वर्तमान सरकार की विदेशनीति को भी कई आलोचक जलेबी की तरह मानते है जिसमे सावधानी हटी, दुर्घटना घटी के साथ साथ हलवाई की कारीगरी भी अहमियत रखती हैं क्योंकि अक्सर गंदगी का साम्राज्य घर कर जाता हैं।

विगत सात साल में भारतीय विदेश नीति जिस दिशा में चली उसका विश्लेषण न करते हुए अफगानिस्तान और तीन दिन पहले मॉस्को में हुई बैठक की बात करते है।

यूएस तथा नाटो फोर्सेज द्वारा अफगानिस्तान छोड़ने के बाद तालिबान ने कदम बढ़ाए तथा पूर्व की अशरफ गनी सरकार काबुल से भाग खड़ी हुई बेशक अंतिम कोशिश के तौर पर तत्कालीन उप राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया और निर्वासित सरकार की भी घोषणा कर दी लेकिन तालिबान को मदद कर रही ताकतें शायद ज्यादा कामयाब रही ।

इसी दौरान अफगानिस्तान की पंच शीर वैली में तालिबान को चुनौती दी गई किन्तु उसमे भी तालिबान ने फतह हासिल की हालांकि इस झडप में पाकिस्तान पर तालिबान को मदद देने और तजाकिस्तान तथा भारत पर विद्रोहियों को मदद देने के आरोप भी लगे।

अभी तक मोदी सरकार के कई नेताओ एवम् प्रवक्ताओं द्वारा तालिबान को आतंकी जैसे शब्दों से नवाजा गया एवम् कई बार तालिबान द्वारा भी वर्तमान भारत सरकार को संकेतो में चेतावनी दी गई।

भारत द्वारा विरोध का कारण शायद वर्तमान सरकार का अमेरिका परस्त होना था और अमेरिका का एकमात्र लक्ष्य चीन तथा रूस की बढ़ती ताकत को रोकना है बेशक उसके लिए हमेशा की तरह यूएस को अपने ही सहयोगियों की बलि क्यों ना देनी पड़े।

विदेश मंत्रालय रूस द्वारा एक बैठक का आयोजन किया गया जिसमें अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के उप प्रधानमंत्री सहित मध्य एशिया के पूर्व सोवियत देशों सहित चीन तथा भारत ने भी हिस्सा लिया। बैठक के बाद जारी व्यक्तव्य में स्पष्ट किया गया कि सभी उपस्थित देश अफगानिस्तान की मदद करेंगे। 

इस संयुक्त बयान पर भारतीय प्रतिनिधि जे पी सिंह ने भी दस्तखत किए हैं। जे पी सिंह काफी समय तक इस्लामाबाद में भारतीय उप उच्चायुक्त के पद पर कार्य करते रहे हैं और आजकल विदेश मंत्रालय में दक्षिण एशिया डेस्क देखते हैं।

इसी के साथ संयुक्त राष्ट्र ने अफ़गान फंड की भी स्थापना कर दी है जिसमे भारत ने भी सहयोग देने का वायदा किया है अर्थात संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सभी देश तालिबान सरकार को आर्थिक सहायता प्रदान करेंगे जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा तालिबान सरकार को मान्यता देने के रूप में समझा जा सकता है। इसका अर्थ हुआ कि भारत समर्थक अब्दुल्लाह सालेह की कथित निर्वासित सरकार को संयुक्त राष्ट्र एवम् अन्य सभी देशों ने मानने से इन्कार कर दिया जिसे भारतीय नीति के विरूद्ध एक झटका समझा जा सकता है।

लेकिन यह यू टर्न जितना आसान और सीधा लग रहा है इतना क्या बिल्कुल भी सीधा नहीं है ( इसीलिए शुरुआत में जलेबी को उद्धत किया गया था )

क्योंकि अमेरिका और इजरायल की प्राथमिकता चीन एवम् रूस को रोकना है तो यह कल्पना भी नहीं करनी चाहिए कि यूएस आत्महत्या सरीखा कार्य करते हुए इस क्षेत्र से निकल जाएगा। अब यदि भारत यूएस के विरूद्ध जाकर रूस चीन से सहयोग बढ़ाता है या उनके साथ मिलकर तालिबान को मदद करता है तो क्या गहन सामरिक साझेदारी के समझौते करने के बाद पेंटागन शांत रहेगा और भारत को दबाव में नहीं लाएगा ? यदि अमेरिका भारत के विरूद्ध कोई प्रोक्सी करता है तो रूस एवम् चीन भारत का साथ क्यों देंगे ? वैसे भी दोनों ने पाकिस्तान तथा ईरान के साथ अपने बेहतर सम्बन्ध कायम कर लिए हैं।

क्योंकि इस समय रूस और अमेरिका लगभग आमने सामने खड़े हैं तथा फिर से कोल्ड वार जैसे हालात बन चुके है तो ब्लैक सी सहित मेडिटेरियन सी में होने वाली किसी नेवल हलचल से भारत अछूता रह जाए इसे असम्भव समझना चाहिए।

फिलहाल अमेरिकी रक्षा मंत्री ( सचिव ) रुमानिया, जॉर्जिया एवम् यूक्रेन के दौरे पर है, चीन द्वारा ताइवान के उपर आक्रमक उड़ाने, भूटान से संधि कर के भारत की चिकन नेक तक पहुंच और भारतीय क्षेत्रों पर कब्ज़ा भी ध्यान में रखना जरूरी हैं।

फिलहाल कम शब्दो मे जलेबी का शुरुआती सिरा ही अंतिम छोर समझते हुए कहा जा सकता है कि भारत को रक्षा एवम् विदेश के विषय पर व्यापक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

यदि यूएस के साथ जाते है तो पाकिस्तान, तुर्की, चीन एवम् रूस से विरोध का सामना करना होगा और यदि विरूद्ध जाते है तो अभी भी यूएस लॉबी भारतीय बिगड़ी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करते हुए भारत को failure State बना सकते की क्षमता रखता है।

क्योंकि आज भारतीय प्रधान मंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में युद्ध एवम् चीनी आयात के विरूद्ध संकेत दिए गए हैं जो किसी भी आने वाले समय में शांति और स्थिरता के विरूद्ध लगते है।

वैसे भी निकट भविष्य में यूपी में चुनाव है तो सीमा पर तनाव सम्भावित है तथा साथ ही आंतरिक हालात भी जनता की असंतुष्टि के कारण बीजेपी के पक्ष मे नहीं है तो केवल दुस्वप्न देखा जा सकता है कि किसी के इशारे पर किसी का युद्ध लडा जाएगा जैसा पड़ोसी देश ने अफगानिस्तान में लडा था तथा अरबों खरबो डॉलर के साथ साथ सत्तर हजार अपने देश के नागरिक कुर्बान कर दिए बेशक अब लानते ही मिल रही हो।

आशा करनी चाहिए कि शांति और स्थिरता के साथ समृद्धि हो।

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