भारतीय पंजाब को कश्मीर बनाने की साज़िश या किसी अनहोनी की आशंका !

अचानक लिए गए निर्णय के अनुसार भारतीय पंजाब के सीमा से 50 किमी रेडियस में बीएसएफ को अतिरिक्त शक्तियां देते हुए अधिकार दिए गए हैं जिसके अनुसार बीएसएफ कर्मी/अधिकारी किसी को भी गिरफ्तार कर सकते है, तलाशी ले सकते हैं और जांच पड़ताल कर सकते है।

अभी तक यह क्षेत्राधिकार सीमा से 15 किमी तक ही था और उसमे भी पासपोर्ट, ड्रग ट्रेफिकिंग, आतंकवाद या उससे सम्बन्धित हथियारों का भंडारण एवम् जासूसी ( जिसमे इलेक्ट्रॉनिक सरविस्लांस भी शामिल है ) से सम्बन्धित अपराध ही शामिल थे। सामान्य नागरिक अपराध ( चोरी, डकैती, लूट झगड़ा ) आदि के लिए नागरिक पुलिस को ही जांच पड़ताल का अधिकार प्राप्त था।

भारतीय संविधान के अनुसार स्पष्ट है कि भारत एक गणतंत्र है जिसे राज्यों का संगठन ( यूनियन ऑफ इंडिया ) कहते है। इसमें साफतौर से राज्यों और केन्द्र सरकार की शक्तियों का विभाजन किया गया है जिसके अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि तथा कानून व्यवस्था ( पुलिसिंग ) राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है अर्थात बिना राज्य की अनुमति के केंद्र सरकार अपनी फोर्सेज भी तैनात नहीं कर सकती ( केवल NIA की जांच अपवाद है क्योंकि वो आतंकवाद के विरूद्ध होती हैं ) इसके अतिरिक्त राज्य की जानकारी में ही केंद्रीय एजेंसियां अपने अधिकारी नियुक्त कर सकती हैं ( आईबी, या रॉ )

केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्णय के अनुसार उत्तर पूर्व के तीन राज्यों की बीएसएफ टेरिटरी पावर्स कम कर दी गई जिसमे त्रिपुरा, मेघालय मिजोरम में 80 किमी से 10 किमी की गई है लेकिन पंजाब में 15 से 50 किमी करने का अर्थ है कि लगभग आधा पंजाब केंद्र सरकार के सीधे शासन में आ गया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज़ादी के बाद से ही पंजाब का एक वर्ग भारत सरकार से अपने विशेष अधिकारों को लेकर संघर्ष करता रहा है जिसके पीछे आज़ादी के समय सिख समुदाय से किए गए कुछ वायदे बताए जाते है।

यहां याद रखना चाहिए कि अंग्रेज़ो ने जब मुस्लिम्स के नाम पर अलग पाकिस्तान बनाकर हिंदुस्तान का विभाजन किया था तो सिखों को भी अलग देश के लिए प्रेरित किया था लेकिन तत्कालीन सिख नेताओ ने ब्रिटिशर्स का सुझाव ठुकरा कर भारत का हिस्सा बनना स्वीकार किया था और साथ ही देश के निर्माण में सबसे ज्यादा बलिदान देकर भारत को अखंड एवम् मजबूत भी रखा।

क्योंकि 47 के बाद कुछ हिन्दुत्व वादी संगठनों ने अपनी साजिशें तेज कर दी तो आशंकाओं ने अस्सी के दशक में अलगाव वाद को बढ़ावा दिया तथा अलग खालिस्तान की मांग भी सुनाई देने लगी।

निसंदेह उस समय में बहुत सी दुखद घटनाए देखनी पड़ी किन्तु यदि खालिस्तान आंदोलन असफल रहा तो उसके पीछे सबसे बड़ा योगदान उन सिखों का ही था जो भारत को एक अखंड और सुदृढ़ देश देखना/रखना चाहते है बेशक इसके लिए उन्हे कुर्बानियां देनी पड़ी।

अभी भी विदेशों से कभी कभी अलगाव वाद के स्वर सुनाई देते है किन्तु भारतीय सिख समुदाय में उन्हे कभी उनकी आशानुरूप तवज्जो नहीं दी गई। 

2014 के बाद मोदी सरकार ने अपनी सोच के अनुसार जो भी नीतियां लागू की उनसे जनता को राहत के स्थान पर कष्ट अधिक हुए और इसी दौरान किसानों द्वारा भी किसान कानूनों के विरोध में आंदोलन शुरू किया गया जिसकी शुरुआत पंजाब के किसानों ने की तथा पहला मोर्चा हरियाणा के गुरनाम सिंह चढूनी ने कुरुक्षेत्र से शुरू किया ( चढूनी का नाम इसलिए लिया गया है क्योंकि वो भी सिख है )

असफल रही सरकार ने अपने पैंतरों में से एक किसान आंदोलन को सिख बनाम गैर सिख बनाने की कोशिश की किन्तु उत्त प्रदेश तथा हरियाणा के किसानों ने इस योजना को ध्वस्त कर दिया। अभी लखीमपुर खीरी में शहीद किसानों के सम्बन्ध मे भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की गई।

लेकिन मुख्य विषय पंजाब में बीएसएफ को अधिकार दिए जाने से सम्बन्धित था तो उसी बिंदु पर आते हैं कि क्या केंद्र सरकार द्वारा आगामी चुनावों में सीधी दखल के उद्देश्य से ऐसा किया गया है जिससे आधे पंजाब पर बीएसएफ द्वारा सीधा शासन कायम करके जनता को भयभीत किया जा सके ?

क्योंकि पंजाबियों की संस्कृति या फितरत होती हैं कि वो दबाने पर ज्यादा मुखर हो जाते है तो क्या केंद्र की बीजेपी सरकार जानबूझकर सीमावर्ती राज्य में अशांति पैदा करना चाहती हैं ? यहां ध्यान रखना चाहिए कि लखीमपुर नरसंहार के बाद बीजेपी नेताओं द्वारा एकाधिक बार खालिस्तान का जिक्र करते हुए कई अलगाववादी संगठनो को याद दिलाया गया।

पंजाब के मुख्य मंत्री एवं अन्य नेताओ ने भी केंद्र सरकार के इस निर्णय की आलोचना करते हुए इसे फेडरलिज्म पर कुठाराघात बताया है जिसमे कांग्रेस के अतिरिक्त अकाली दल के नेता भी है।

यद्धपि समाचार प्रसारित किया जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बीएसएफ के अंतर्गत सुरक्षा देने का स्वागत एवम् समर्थन किया है किन्तु इसकी पुष्टि कैप्टन साहब द्वारा नहीं की गई ना ही उनके ऑफिस ने कोई बयान जारी किया है।

कुछ लोग संदेह वयक्त कर रहे है कि सरकार पूर्व में कल्पित न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के मद्देनजर भारत की संसदीय प्रणाली को समाप्त करके फेडरल स्ट्रक्चर को खत्म करना चाहती हैं और छोटे छोटे राज्य बनाकर सीधे गवर्नर के माध्यम से केंद्र द्वारा शासन करना चाहती हैं जिसमे पंजाब मुख्य रोड़ा बन सकता है इसलिए अभी बीएसएफ को अधिकार दिए जा रहे हैं जिससे कुछ समय बाद कश्मीर की तरह यहां भी कोई एकतरफा निर्णय लिया जा सके अथवा पंजाब को अशांत क्षेत्र घोषित किया जा सके।

यह भी संभव है कि सरकार को कुछ अन्य इनपुट प्राप्त हुए हो जिसकी चर्चा नहीं की जा रही ( हालांकि इसकी सम्भावना ना के बराबर है और सरकार प्रचारित करती हैं तो वो केवल प्रोपेगेंडा होगा क्योंकि पंजाबी जब तक नहीं चाहेंगे तब तक किसी विदेशी ताकत की हिम्मत भी नहीं होगी और जिस दिन ठान लेंगे तो कोई कुछ भी नहीं कर पाएगा )

चहुं ओर से आलोचना के साथ ही उत्तर पूर्व के राज्यों को आज़ादी देने के निर्णय को भी इससे अछूता नहीं समझा जा सकता।

बहरहाल कारण कुछ भी हो या परिणाम कुछ भी हो आशा करनी चाहिए कि भारत का सबसे मजबूत सीमावर्ती पंजाब कभी अशांति और युद्ध का अखाड़ा ना बने। सदियों से संघर्ष कर रही पंजाबी कौम को भी तो कभी शांति और स्थिरता मिलनी चाहिए।।

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