ज्यूं ज्युं तेरा हुक्म है ......

ਜਿਉ ਜਿਉ ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਤਿਵੈ ਤਿਉ ਹੋਵਣਾ ॥

Jio Jio Thaeraa Hukam Thivai Thio Hovanaa ||

जिउ जिउ तेरा हुकमु तिवै तिउ होवणा ॥

As is the Hukam of Your Command, so do things happen.

ਜਹ ਜਹ ਰਖਹਿ ਆਪਿ ਤਹ ਜਾਇ ਖੜੋਵਣਾ ॥J

eh Jeh Rakhehi Aap Theh Jaae Kharrovanaa ||

जह जह रखहि आपि तह जाइ खड़ोवणा ॥

Wherever You keep me, there I go and stand.

1923 का हिंदुस्तान और जबर ब्रिटिश साम्राज्य ! रियासत नाभा के रीपुदमन सिंह को गद्दी से हटाने के विरूद्ध गंगसर जैतो में मोर्चा लगा और सरकारी ट्रेन से अहिंसक आंदोलन कर रहे सिखो को कुचल दिया गया कुछ ऐसे ही जैसे थार और फॉर्चूनर गाड़ियों के नीचे लखीमपुर के किसानों को कुचला गया है।

किसानों द्वारा किया जा रहा आंदोलन और लखीमपुर का नरसंहार यदि सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री या कार्यकर्ता द्वारा आवेश में लिया गया निर्णय मान लिया जाए तो यह भारत की अखंडता के विरूद्ध किसी देशद्रोही कार्यवाही से कम नहीं होगा लेकिन ऐसा क्यों हुआ इसके लिए इतिहास और शहीद किए गए किसानों की पृष्ठभूमि को भी देखना जरूरी होगा।

निसंदेह हिंदुस्तान बहुत बड़ा देश रहा है और आज़ादी से पहले यह अंग्रेज़ो द्वारा शासित था उससे पहले मुग़ल शासक थे जिन्होंने अपनी शासन व्यवस्था के अनुसार अपने प्रियजनों को जागीरें एवम् जमिदारियां बांटी हुई थी। क्योंकि लंबे समय तक मुस्लिम शासक थे और मुस्लिम्स के बीच ही शिक्षा का प्रसार था तो अधिकांश जागीरें ज़मीदारी भी मुस्लिम समाज के पास थी जो शायद उच्च वर्ग के गैर मुस्लिम को चुभती रहती थी।

इसके अतिरिक्त 1857 की असफल क्रांति के बाद ब्रिटिशर्स ने भी मुस्लिम एवम् गैर मुस्लिम के बीच फूट डालो राज करो की नीति पर काम शुरू कर दिया जिसके लिए गैर मुस्लिम को हिन्दू या हिंदुत्व के नाम पर ध्रुवीकरण शुरू कर दिया जिसमे आरएसएस, हिन्दू महासभा एवम् मुस्लिम लीग ने अंग्रेज़ो का साथ दिया बेशक उसके पीछे उनके नेताओ के निजी स्वार्थ रहे होंगे या किसी डर और दबाव के कारण वो साथ जुड़े होंगे।

इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए सावरकर और गोलवरकर जैसे नेताओ ने two nation theory दी जिसे मुस्लिम लीग ने अपना लक्ष्य बना लिया। नतीजतन मुल्क के टुकड़े हो गए तथा पाकिस्तान का निर्माण हो गया। क्योंकि आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने वाली कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया था कि वो आज़ादी के बाद ज़मीदारी प्रथा समाप्त कर देगी एवम् पंजाब के बंदा सिंह बहादुर के फार्मूले पर खेती की जमीन काश्तकारों के हक में कर देगी तो मुस्लिम नवाबो में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई जिससे अधिकांश जमीदार पाकिस्तान पलायन कर गए।

किन्हीं भी कारणों से पश्चिमी पंजाब से गैर मुस्लिम आबादी को अपनी पुश्तैनी जमीन जायदाद छोड़कर आना पड़ा तो जवाहरलाल नेहरू सरकार के सामने विस्थापित शरणार्थियों को स्थापित करने का प्रश्न खड़ा हो गया क्योंकि वो जानते थे कि यदि आने वाले पंजाबी शरणार्थियों को टुकड़ों टुकड़ों में बांट कर ना बसाया गया तो भारत में शांति, अखंडता स्थापित रखना असम्भव होगा।।

क्योंकि मुस्लिम नवाब दिल्ली के आसपास रहना ज्यादा पसंद करते थे और सुरक्षित भी समझते थे इसलिए सुदूर भारत में उनकी जमीनों का उचित विकास भी नहीं होता था, उत्तर प्रदेश और नेपाल सीमा के आसपास के क्षेत्र को विकसित करने के लिए अंग्रेज़ो ने भी कभी रुचि नहीं दिखाई शायद इसके पीछे एंग्लो गोरखा युद्ध के बाद नेपाली गोरखाओ का डर भी रहा होगा।

कुलमिलाकर अविकसित तराई क्षेत्र को शरणार्थी पंजाबियों को बसाने के लिए सामरिक दृष्टि से भी उचित लगा और नेहरू जी भी जानते थे कि पंजाबी कौम की कर्मठता एवम् मेहनत बंजर भूमि को भी हरा भरा बना सकती हैं।

यही सब सोचते हुए लायलपुर इलाके के किसान शरणार्थियों को बाजपुर, खटीमा, बनबासा, रुद्रपुर वाली बेल्ट में बसा दिया गया और कुछ को लखीमपुर खीरी, गोरखपुर वाली बेल्ट में जमीनें दे दी गई जो उस समय बंजर तथा नाबाद थी। 

कालांतर में मेहनत और खून पसीने से तराई की भूमि सोना उगलने वाली बन गई तथा 70 के दशक में पूर्वी पंजाब से भी पंजाबी किसानों ने वहां बड़े बड़े फार्म लेने शुरू कर दिए क्योंकि तब तक भी तराई की जमीनें पंजाब से बहुत सस्ती थी लेकिन संस्कृति लगभग पंजाब जैसी थी वैसे भी पंजाबी जहां बसते है वहां पंजाब बसा लेते है।

समय अपनी गति से चलता रहा और 70 - 75 साल गुजर गए, तीसरी पीढ़ी बड़ी होती है तथा जिन मिट्टी के पुतले नुमा सरदारों को मिट्टी में मिट्टी होते देखा था उनके नाती पोते पढ़ने लिखने के बाद विदेशो तक धावा मारने लगे वैसे भी पंजाबी दरिद्रता से जीना नहीं जानते तो उनको चमक धमक से कुछ कथित स्वंभू सामंतों को कष्ट होना शुरू हो गया।

क्योंकि भारत का लोकतंत्र वोट आधारित हैं तो नेताओ का लक्ष्य वोटो के माध्यम से सत्ता प्राप्त करना तथा सत्ता के माध्यम से जायज़ नाजायज फायदा उठाना रह गया जिसके लिए जरूरी होता है कि जाति, धर्म या किसी भी आधार पर वोटरों का ध्रुवीकरण किया जाए, विशेषकर उत्त प्रदेश जैसे हिंदी पट्टी क्षेत्र में जहां आज भी जनता विकास से अधिक जाति, टोले को महत्व देती हैं।

उत्तर प्रदेश में पिछले चुनावों से पहले मुज़फ्फ़रनगर के सांप्रदायिक दंगे को भी ध्यान रखना चाहिए जिसके बाद गैर मुस्लिम आबादी का सफलता पूर्वक ध्रुवीकरण हुआ और बीजेपी को बंपर जीत प्राप्त हुई।

पुनः वापिस मुख्य विषय पर लखीमपुर खीरी आते है और स्थानीय नेता गृहराज्य मंत्री के 25 सितम्बर को याद करते हैं जिसमे वो कहता है कि "लखीमपुर छोड़कर जाना पड़ेगा"

इसी के साथ विभिन्न भारतीय चैनल्स में कथित डिबेट्स में बीजेपी प्रवक्ताओं के शब्दों पर भी ध्यान दे तो 40 साल से भूल चुके खालिस्तान शब्द और बब्बर खालसा जैसे संगठनों का नाम उन्हीं के द्वारा दोहराया गया या जानबूझकर याद दिलाने की कोशिश की गई।

संत जरनैल सिंह भिंडरावाला की टी शर्ट पहने किसी बच्चे का उदाहरण देना भी किसी छिपी साज़िश वाली सोच का संदेह पैदा करती है। कल यदि किसी ने चे ग्वेरा के फोटो वाली टी शर्ट पहन रखी होगी तो उसे भी किसी अन्य सन्दर्भ में बताया जा सकता है।

क्या इनसे यह संशय पुख्ता नहीं होता कि किसी भी बहाने से सत्ता में बैठे शक्तिशाली व्यक्तियों की मैली नजर अल्पसंख्यक पंजाबियों की मेहनत से जंगल में मंगल बने क्षेत्र पर है ?

इस संदेह के पीछे एक कारण कच्छ भुज क्षेत्र के सिख किसानों की स्थिति भी है जहां 1966 में सीमा को सुरक्षित रखने और घुसपैठ रोकने के लिए तत्कालीन भारत सरकार द्वारा पंजाबी समुदाय को लेकर बसाया गया था लेकिन अब जब वहां हरियाली लहलहा रही है तो गुजरात सरकार ने उनकी जमीन छीनने की साज़िश रची और मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने हाई कोर्ट से किसानों के हक में फैसला होने के बाद उसकी अपील सुप्रीम कोर्ट में कर दी।

नरसंहार के आरोपी बेटे का पिता भारत सरकार का स्टेट इंटरनल अफैयर मिनिस्टर है किन्तु अपने आरोपी बेटे के पक्ष मे खुलकर बयान दे रहा है फिर भी मंत्री मंडल में बना हुआ है ! यह क्या संकेत देता है ? यहां तीन उदाहरण याद करने जरूरी है एक तो जैकी चेन का बेटा पकड़ा गया था तो जैकी ने उसके लिए कोई लॉबिंग नहीं की बेशक उसे तीन साल की जेल हो गई, सुनील दत्त का बेटा संजय दत्त पकड़ा गया था लेकिन सुनील दत्त ने अपने प्रभाव का कोई इस्तेमाल नहीं किया और उसे भी सजा सुनाई गई।

अभी शाहरुख खान के बेटे पर आरोप लगे हैं लेकिन कोई सबूत न होने के बावजूद शाहरुख खान ने अपने बेटे के पक्ष मे कोई बयान नहीं दिया किन्तु मंत्री जी बारबार विभिन्न प्लेटफॉर्म्स से अपने बेटे के पक्ष मे बयान दे रहे हैं और जिस सरकार में वो मंत्री है उन्हे यह अनैतिक नहीं लग रहा है।

कल्पना करे कि यदि भारत भर के किसान नेता, विपक्षी दल के नेताओ एवम् विश्व के मानवाधिकार संस्थाओं द्वारा पीड़ित परिवारों के पक्ष मे आवाज़ न उठाई जाती तो सम्भव था कि लखीमपुर के आसपास के क्षेत्रों के पंजाबी किसानों को असुरक्षित महसूस कराने में वो लोग सफल हो जाते जो ऐसा चाहते थे।

शायद किसी ने सोचा होगा कि जब भी सामूहिक पलायन होता है तो जमीन जायदाद औने पौने भाव में मिलती हैं किन्तु ऐसा सभी के साथ नहीं होता और यदि ऐसा हुआ होता तो विश्व के 120 देशों में पंजाब ना बसा होता।

इस समय गाड़ी के टायरों से शहीद किए गए पांचों शहीदों की आत्मा की शांति के लिए अंतिम अरदास चल रही है और News Number परिवार भी उनके लिए प्रार्थना करता है कि वाहे गुरु दिवंगत आत्माओं को अपने चरणों में स्थान दे एवम् पीछे परिवार को ईश्वर इच्छा स्वीकार करने की ताकत दे।।