भारत विश्व में सर्वाधिक फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है लेकिन तेजी और आपाधापी के युग में बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री की बुनियादों को भी याद रखना चाहिए।

भारतीय सिनेमा जगत और उसकी मुंबई फिल्म इंडस्ट्री जिसके जलवे दुनियां के कोने कोने में बिखरे पड़े हैं और आज तक भी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री लाखो लोगो को रोजगार देती हैं।

किन्तु इस उद्योग को यहां तक पहुंचाने में अनेकों प्रोड्यूसर्स, डायरेक्टर्स से लेकर लाइट मैन तक ने  अपना सहयोग दिया है । 

इसी सम्मानित सूची का एक नाम हुआ है चंदू लाल शाह जिन्हे बॉलीवुड का सरदार भी बोला जाता है। जामनगर गुजरात में जन्मे चंदू भाई की जीवन यात्रा विनोद छाबड़ा के शब्दो मे।

चंदूलाल शाह, अर्श से फर्श तक का सफ़र 

भारतीय सिनेमा सरदार चंदूलाल शाह (1898 से 1975) का सदैव ऋणी रहेगा. उन्होंने साइलेंट इरा में प्रोडक्शन शुरू किया जो बोलती फिल्मों के दौर में भी जारी रहा. वो आज़ादी की लड़ाई में भी एक्टिव रहे. सरदार बल्लभ भाई पटेल के निकटवर्ती थे. कांग्रेस पार्टी को जब भी पैसे की ज़रूरत पड़ी चंदूलाल शाह ने दिल खोल कर दिया. उन्होंने कोहिनूर फिल्म कंपनी से काम शुरू किया.

1929 में उन्होंने अपनी कंपनी बनाई, रणजीत स्टूडियो, जिसे बाद में रणजीत मूवीटोन का नाम दिया. इसके पीछे दिलचस्प बात ये है कि जामनगर के महाराजा रणजीत सिंह क्रिकेट के मशहूर बैट्समैन रहे. इंग्लैंड के लिए टेस्ट भी खेले. उनके नाम पर भारत में रणजी ट्रॉफी क्रिकेट टूर्नामेंट भी चलता है. चंदूलाल उनके बहुत बड़े फैन थे.

उनके पिता जी भी महाराजा जामनगर के कोषाध्यक्ष रहे. इसलिए चंदूलाल ने जब अपना स्टूडियो स्थापित किया तो महाराजा रणजीत के नाम पर ही रखा. उन्होंने 123 फ़िल्में प्रोडयूस की, जिनमें उन्होंने कई लिखीं और कई डायरेक्ट भी की. बताया जाता है कि उनकी कंपनी के पे रोल पर तीन सौ आर्टिस्ट थे, एक से बढ़ कर एक. कहा जाता था, जितने सितारे चंदूलाल की कंपनी में थे उतने तो आसमान में नहीं.

आर्टिस्टों को मोटी रक़म देने का चलन भी उन्होंने ही शुरू किया. कुंदन लाल सहगल को वो एक लाख से ऊपर प्रतिमाह देते रहे जबकि दूसरी कंपनी का मेहनताना तीन-चार हज़ार के बीच था. 

चंदूलाल की पसंदीदा हीरोइन थी, गोहर बानो जो न केवल ताउम्र उनके दिल में रही बल्कि उनकी कंपनी में पार्टनर भी रही. सिने दुनिया में उनके बड़े कद के मद्देनज़र उन्हें 'सरदार' का अन-ऑफिशियल ख़िताब मिला हुआ था.

जब कोई उन्हें सरदार चंदूलाल शाह कहता था तो उनका सीना गर्व से फूल जाता था. वो अपने बड़े कद के अनुरूप अपनी शाहखर्ची के लिए भी मशहूर रहे. मशहूर फ़िल्मकार केदार शर्मा उन्हें सोने के दिल वाला कहते थे. फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के पहले अध्यक्ष भी चंदूलाल थे. भारतीय सिनेमा की सिल्वर जुबली और फिर गोल्डन जुबली भी उन्हीं की सरपरस्ती में मनायीं गयीं. 

आज़ादी के बाद धीरे-धीरे चंदूलाल की कंपनी का काम मंदा होने लगा. अब स्टार्स स्टूडियो या कंपनी से बंधे नहीं रहे. किसी भी प्रोडक्शन हाउस के लिए काम करने के लिए स्वतंत्र हो गए.

चंदूलाल की राजकपूर-नरगिस वाली 'पापी'(1953) फ्लॉप हो गयी. बहुत नुक्सान हुआ उन्हें. फिर 'ऊंट-पटांग' और 'ज़मीन के तारे' (1960) भी बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं. 1963 में राजेंद्र कुमार-मीना कुमारी को लेकर बनाई 'अकेली मत जईयो' तो कफ़न में आख़िरी कील साबित हुई. उन्होंने स्टॉक मार्किट और रेस के मैदान की तरफ रुख किया. मगर वहां भी उन्हें बर्बादी इंतज़ार करती हुई मिली. स्टूडियो, बंगला, कारें आदि सब बिक गए. लम्बी और महँगी कारों पर चलने वाले सरदार चंदूलाल शाह अब खटारा बसों पर सफ़र करने लगे. वो न केवल पैसों से बल्कि जिस्म से भी टूट गए. एक मामूली अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. ये उनके जीवन का आखिरी पड़ाव था.

सिने दुनिया की सबसे बड़ी संस्था 'इम्पा' के अध्यक्ष और आर्टिस्ट चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन श्रीराम बोहरा जब उनकी आर्थिक मदद को आगे आये तो उन्होंने लेने से मना कर दिया, मैं सरदार चंदूलाल शाह हूँ, भिखारी नहीं. और 25 नवंबर 1975 को सिनेमा का ये गर्वीला 'सरदार' इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गया. उनकी अंतिम यात्रा में राजकपूर जैसी एकमात्र नामी हस्ती शामिल हुई. 

फिल्मी दुनिया के seven wonders की बात की जाए तो उसमें एक नाम घूंघट की बीनाराय का जरूर आएगा।

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