भारत एक गणराज्य ! विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता तथा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला देश .

विश्व का दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश जिसे उसके लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता एवम् सॉफ्ट पॉवर के कारण उदाहरण के रूप में प्रतीत किया जाता था अचानक कैसे बदल गया ?

क्योंकि 1948 में महात्मा गांधी के शरीर की हत्या करने वालो के गिरोह को अवसर मिला और आपदा में अवसर उठाते हुए उन्होंने गांधी के दर्शन तथा विचारो की हत्या शुरू कर दी।

गत दिनों एक घटना में आसाम राज्य की पुलिस ने एक मुस्लिम नागरिक को गोली मार दी तथा अमानवीयता की हदे पार करते हुए पुलिस पार्टी के फोटोग्राफर द्वारा गिरे हुए मृत/घायल बुज़ुर्ग के उपर कूदने की वीडियो वायरल हुई जिसको अरब देशों में गम्भीरता से लिया गया और भारतीय उत्पादों के बायकॉट की मुहिम शुरू हो गई है यद्धपि कतर स्थित भारतीय दूतावास द्वारा इसे प्रोपेगेंडा करार दिया गया है।

इस घटना के अतिरिक्त भी अन्य बहुत सी घटनाए सामने आई है जिन्हे शासकीय आतंक की  संज्ञा दी जा सकती है तो ऐसे में महात्मा गांधी कैसे याद नहीं आएंगे ? मनीष सिंह ने महात्मा गांधी के जीवन का एक अंश लिखा है क्योंकि दो दिन बाद गांधी जयंती पर राजनेताओं द्वारा अहिंसा और सभ्याचार पर औपचारिक भाषण भी करने है। गांधी काल के इतिहास की एक झलक।

आप खुद से सबसे बेहतरीन आशा क्या रखते हैं?? जिंदगी से क्या चाहते है। कैसा दिखना और याद किया जाना चाहते है। ये प्लेनेट आपको मौका देती है। धरती पर जहाँ हिन्द महासागर और एटलांटिक मिलते हैं, उसे "केप ऑफ गुड होप" कहा जाता हैं। 

अफ्रीका महाद्वीप के सबसे दक्षिणी हिस्सा है वो, और धरती के उस टुकड़े पर बसे देश का नाम भी दक्षिण अफ्रीका है। सवा सौ साल पहले, जब सदी के पलटने का वक्त था, और दो इंसान दक्षिण अफ्रीका की धरती पर अपनी उम्मीदें, और अपनी शख्सियत को परिभाषित करने उतर रहे थे। 

--दक्षिण अफ्रीका व्यापार के रास्ते उपनिवेश बनाने की शुरुआत, "डच ईस्ट इंडिया कम्पनी" ने की थी। यूरोपियन गोरे, आकर अफ्रीका में बसे। तब स्वेज नहर तो बनी नही थी, इसलिए दक्षिण अफ्रीका ही समुद्री व्यापार का हाइवे था। और केप ऑफ गुड होप इस हाइवे का चौराहा। 

ऐसे चौराहे पर तो पर तो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी को कब्जा चाहिए था। 

तो संघर्ष हुआ, अंग्रेज विजयी हुए, डच हार गए। हारे हुए मूल के गोरे, दक्षिण छोड़, उत्तर में बढ़कर खेती किसानी में लग गए थे। उन इलाकों में काबिज थे। अफ्रीका में बस गए, डच मूल के ये गोरे किसान ही लोकल लैंग्वेज में बोअर कहलाते थे। 

फिर हुआ ये की बोअर लोगो के इलाके में सोने चांदी की खदानें मिली। अब अंग्रेजो को वो खदानें चाहिये थी। तो अंग्रेजो ने हमला कर दिया, युद्ध शुरू हो गया। युद्ध 2 बार हुआ , इन्हें ही बोअर युध्द कहते है। 

--मार्लबोरो के ड्यूक, ब्रिटेन के पूर्व रक्षामंत्री के बेटे, शानदार वक्ता और मस्तमौला विंस्टन चर्चिल 1899 में दक्षिण अफ्रीका की धरती पर अपनी स्कॉच की बोतलों और फरफराती कलम के साथ उतरे। वे अफगानिस्तान सहित कई मोर्चो में सैनिक रह चुके थे। पर अच्छे लिक्खाड़ थे, तो छद्म नाम से वार डिस्पेच लिखते रहे। बोअर युध्द में प्योर पत्रकार बनकर उतरे थे। 

एक दिन की बात है। जनाब चर्चिल एक रेलगाड़ी में ब्रिटिश फ़ौज के साथ सवार थे। उसे बोअर मिलिशिया ने पलट दिया। तमाम हीरोगिरी के बाद चर्चिल बंदी हुए। 

बोअर जेल में प्रिजनर ऑफ वॉर हुए। 

--वहीं कुछ सौ किलोमीटर दूर मोहनदास एम्बुलेंस में घायलों को ढो रहे थे।मोहन ने बैरिस्टरी इंगलैण्ड से की थी, पर प्रेक्टिस कभी न की। एक प्राइवेट एसाइनमेंट में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे। फिर वहीं सेटल हो गए। पर बाहर से आये अप्रवासियों पर अंग्रेज सरकार के अत्याचार देखे तो जनाब आन्दोलनजीवी हो गए। संगठन बनाये, विरोध किया। 

लेकिन जब बोअर युध्द का वक्त आया, तो अपनी टीम के साथ समाजसेवा करने की सूझी। युध्द के दौरान एक एम्बुलेंस कोर्प्स बनाई। और लगे पीड़ित मानवता की सेवा करने। जान जोखिम में डालकर फ्रंटलाइन से घायलों को हस्पताल पहुंचाते। दक्षिण अफ्रीका की ब्रिटिश सरकार ने इस कदम की सराहना की। मान दिया। 

और दिया कैसरे हिन्द का पदक। 

--और चर्चिल। उनके नाम पर इनाम उठा - 25 पाउंड। हांजी, चर्चिल को जिंदा या मुर्दा पकड़ने वाले को 25 पाउंड दिये जाने का पर्चा दक्षिण अफ्रीका में बिखरा था। ये बोअर्स ने निकाला था। 

हुआ ये था कि महाशय, जेल फांद कर गायब हो गए थे। बोअर्स के इलाके में, अपनी फौजो के कब्जे वाले इलाके से 600 किलोमीटर दूर। भूखा, गोरा, स्थानीय भाषा न समझने वाला विंस्टन, तमाम चैलेंज और जान के खतरे के बीच , सिर्फ इंस्टिक्ट के आधार पर वो इलाका पार कर गया। अपनो से आ मिला। 

और कुछ माह बाद, उसी शहर में जहाँ कैद किया गया था, अपनी फ़ौज के साथ घुसा। साथ बन्द किये गए साथियों को आजाद कराया। बोअर हारे, और विंस्टन के किस्से ब्रिटिश अखबारों में छपे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद को एक हीरो, एक रक्षक मिल गया था। 

--इसी युद्ध मे लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद वो एक घोर भी विरोधी मशहूरियत पा चुका था। कैसरे हिन्द मोहन, अहिँसा, सत्य, सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह के हथियार ईजाद करने वाला था। कोई चार दशक बाद, वो आदमी अंग्रेजी साम्राज्यवाद की आंखों में आंखे डालकर गुर्राया- 

"अंग्रेजों, भारत छोड़ो"

और दस हजार मील दूर बैठे प्रधानमंत्री चर्चिल ने मेज पर मुक्का मारा - "वाय हैजन्ट गांधी डाइड येट ???"

 

 

 

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