क्या भारतीय विदेशनीति अपनी आज़ादी खो चुकी है और किसी बाहरी शक्ति के इशारों पर नाच रही है ?

शीर्षक है कि क्या भारतीय विदेशनीति अपनी आज़ादी किसी बाहरी शक्ति के इशारों पर नाचने लगी है या क्या वर्तमान सरकार विदेशी मामलों में कोई दृढ़ एवम् स्पष्ट निर्णय लेने में अक्षम साबित हो रही हैं।

यद्धपि यह बहुत गम्भीर आरोप है लेकिन यदि गत कुछ दिनों की हलचल तथा सूत्रों द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर घटनाओं की कड़ियां जोड़कर देखे तो संदेह की पुष्टि होती है।

शुरू करते हैं भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से, अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा काबुल फतह एवम् सरकार बनाने से और अमेरिकी फोर्सेज के रातो रात अपने सहयोगियों को भी बिना कोई जानकारी दिए अफगानिस्तान से निकलने से।

वैसे तो अमेरिका द्वारा तालिबान से बातचीत करने तथा समझौता करने के समय भारत को साइड लाइन किए जाते समय ही यह प्रश्न किया जाना चाहिए था लेकिन किसी भी कारण से भारत द्वारा अपना स्थान सुनिश्चित ना किया जाना मंत्रालय को संदेह के घेरे में खड़ा कर देता है।

तालिबान द्वारा काबुल में प्रवेश करने के साथ ही तत्कालीन अफ़गान राष्ट्रपति अशरफ गनी द्वारा देश छोड़कर भागने के बाद भी उनके उपराष्ट्रपति अमरूल्लाह सालेह द्वारा खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया गया और पंचशीर घाटी से तालिबान के विरूद्ध सैनिक कार्यवाही का ऐलान कर दिया गया।

उसी समय कई अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत पर आरोप लगाए गए कि भारत तालिबान विरोधी गुटों को मदद कर रहा है क्योंकि अफगानिस्तान में बड़ी मात्रा में भारतीय निवेश एवम् भारतीय हित जुड़े हुए थे।

यहां समयानुकुल निर्णय तो ये होना चाहिए था कि भारत सरकार तालिबान से भी उचित सम्पर्क रखती एवम् ऐसे किसी काल्पनिक परिदृश्य पर विश्वास ना करती जिसमे तालिबान को आत्मसमर्पण कर चुकी कथित अफ़गान फौज किसी कार्यवाही की हिम्मत कर सकती थी।

इस विषय पर राष्ट्रपति बाइडेन ने अपने हित सर्वोपरि रखे और जैसा कि पेंटागन प्रमुख ने आलोचना की है कि चीन के दबाव में राष्ट्रपति ने घुटने टेक दिए थे।

अगली कड़ी में भारत की शासित पार्टी बीजेपी के प्रवक्ताओं एवम् भारतीय मीडिया द्वारा तालिबान पर विभिन्न आरोप लगाए जाते रहे तथा अपमान जनक भाषा का उपयोग किया जाता रहा जिसका विरोध तालिबान प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने भारतीय मीडिया पर दिए गए कई इंटरव्यूज में भी किया।

अफ़ग़ निस्तान से भारतीय दूतावास बंद कर दिया गया और किसी भी प्रकार का आधिकारिक सम्पर्क समाप्त कर दिया जबकि दूसरी ओर चीन द्वारा भारतीय सीमा का लगातार उल्लंघन किया जा रहा था।

मोदी जी को वाशिंगटन बुलाया गया जिसका विवरण News Number पर पहले ही दिया जा चुका है।

वर्तमान स्थिति यह है कि यदि जानकारी दुरुस्त है तो एक या दो दिनों में ही भारत द्वारा काबुल के लिए अपनी कॉमर्शियल उड़ाने जारी होने वाली है जिसके लिए तालिबान से औपचारिक प्रार्थना पत्र ले लिया गया है।

यदि ऐसा ही है तो क्या इसे अप्रत्यक्ष रूप से तालिबान सरकार को मान्यता देना नहीं माना जाना चाहिए ? 

यदि ऐसा करना अब उचित है तो गत दिनों बीजेपी प्रवक्ताओं द्वारा तालिबान पर आरोप लगाना क्या अनुचित नहीं था ? 

अचानक प्रधान मंत्री जी की अमेरिका यात्रा के बाद परिस्थितियों में कौनसा बड़ा परिवर्तन आ गया जिसके कारण भारत को अपनी नीतियां एवम् निर्णय बदलने पर बाध्य होना पड़ रहा है ?

बहुत से अनुत्तरित प्रश्न जरूर खड़े होंगे किन्तु जवाब कौन देगा ? 

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