संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली का मेला खत्म और इसके साथ ही बदलाव होने के संकेत सामने आना शुरू।।

अल्लाह अल्लाह खैर सल्लाह और इसी के साथ 2021 का संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली का अधिवेशन सम्पूर्ण हुआ लेकिन अपने जीवन काल के अंतिम चरण में भविष्य के बहुत से संकेतो को स्पष्ट कर गया जिन्हे भारत पाकिस्तान या उपमहाद्वीप की शांति, सुरक्षा के दृष्टिकोण से समझना जरूरी हैं।

वैसे तो आमतौर पर चर्चा का विषय पाकिस्तान द्वारा आक्रमक रूप से भारत का नाम लेकर विरोध करना और कश्मीर का जिक्र ही होता हैं लेकिन इस बार इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ हुआ।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत के विरूद्ध आवाज़ उठाई यद्धपि उनका संबोधन वर्च्युल था लेकिन भारत के प्रधानमन्त्री ने व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर अपना भाषण रेकॉर्ड कराया क्योंकि बाइडेन द्वारा कथित क्वाड गुट के नेताओ को एक दिन पहले तलब किया गया था और प्रधानमन्त्री जी अमेरिका में ही उपस्थित थे।

UNGA मीटिंग से पहले भारतीय प्रधानमंत्री की वाशिंगटन हाजरी और भारत के प्रति अमेरिकी अधिकारियों द्वारा सम्मान व्यक्त "न" करते हुए प्रोटोकॉल से इतर कार्यक्रम बनाने पर कूटनीतिक क्षेत्रों में हैरानी जताई जा रही है। भारत की सरकार या नेतृत्व से सहमत/ असहमत होना अलग विषय हो सकता है किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत एक विशाल जनसमूह वाला गणतंत्र है।

प्रधानमन्त्री जी का उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को "उनके ऑफिस में जाकर" मिलना भी एक प्रकार से देश का अपमान समझा जा सकता है और उस पर भी कमला हैरिस द्वारा सार्वजनिक रूप से भारतीय प्रधान मंत्री को लोकतंत्र एवम् मानवाधिकारों की शिक्षा देने की टीस मोदी जी के भाषण में भी झलकी जब उन्होंने भारत को लोकतंत्र की मां कहा ( हालांकि मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी शब्द ग्रीक साम्राज्य के लिए उपयोग किया जाता है )

गोडसे का मंदिर और बीजेपी सांसद द्वारा गोडसे को देशभक्त मानने वाली विचारधारा के शीर्ष नेतृत्व को राष्ट्रपति बाइडेन द्वारा गांधी जी की शिक्षाओं के सम्बन्ध मे बताना भी अंडर लाइन अपमान करने जैसा ही है।

लेकिन यूरोप से फ्रांस के राष्ट्रपति यहां तक कि विदेशमंत्री का भी हिस्सा न लेना सीधे सीधे अमेरिका को चुनौती समझना चाहिए और फ्रांसीसी विदेशमंत्री द्वारा अपना रेकॉर्डेड मैसेज भेजना संकेत देता है कि संयुक्त राष्ट्र का सूर्यास्त होने वाला है और किसी नई विश्व व्यवस्था की तैयारी शुरू हो चुकी हैं।

रूस के विदेशमंत्री द्वारा भी संयुक्त राष्ट्र के लिए उचित शब्दो का उपयोग न करना एक प्रकार से इस विश्व संस्था को चुनौती समझना चाहिए।

इसके अतिरिक्त जो महत्वपूर्ण विरोधाभाषी घटना हुई है उसमे अफगानिस्तान की पूर्व सरकार के प्रतिनिधि को बोलने का अवसर न देने के साथ साथ वर्तमान तालिबान सरकार को भी अवसर ना देना इंगित करता है कि अभी अफगानिस्तान के विषय पर बहुत सोच समझ कर फैसला लिया जा रहा है लेकिन

विरोधाभास यह है कि अमेरिकी सीनेट में एक बिल पेश किया गया है जिसमे तालिबान सरकार को मान्यता देने अथवा किसी भी प्रकार से मदद करने वाले देशों के विरूद्ध प्रतिबन्ध लगाने का प्रावधान है और निसंदेह इससे सबसे पहले और सबसे ज्यादा पाकिस्तान ही प्रभावित होगा अर्थात अमेरिका और पाकिस्तान एक दूसरे के विरोधी घोषित हो जाएंगे जिससे पाकिस्तान की अर्थवयवस्था प्रभावित होगी और अशांति की सम्भावना जताई जा सकती हैं।

भारत कहां खड़ा होता है ? 

इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर है कहीं नहीं। क्योंकि जैसे की समाचार है चीन की PLA द्वारा भारत चीन सीमा पर नए गांव बसा दिए गए हैं, सैनिकों के लिए कंटेनर हाउस बना दिए गए हैं तथा उत्तराखंड में घुसपैठ करके बेसिक निर्माण ( पुल ) को नुकसान पहुंचाया गया है और इतना सब कुछ होने के बावजूद अमेरिका द्वारा भारत के सन्दर्भ मे चीन का नाम भी नहीं लिया गया किसी प्रकार का समर्थन या मदद तो बहुत दूर की कौड़ी है।।

फिर भी आशा करनी चाहिए कि कभी या हमेशा से सोवियत संघ का समर्थक रहा भारत वर्तमान रूस के नेता वल्डमीर पुतिन द्वारा किसी भी नुकसान से बचा लिया जाएगा यदि भारतीय नीति निर्माता अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को बनाए रखते है तो।

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा ! मगर कुनबा जुड़ तो गया ना, अब टूटने से बचाना एक अहम सवाल होना चाहिए।।

भारतीय उपमहाद्वीप के आंतरिक हालात और विभिन्न घटनाओं को लेकर बनाए जा रहे चुटकुलों तथा मीम्स के बीच अक्सर सामान्य नागरिकों से बहुत कुछ या तो छिपा लिया जाता है या खुद ही समझने से इंकार कर देते है क्योंकि तमाशा देखने की आदि भीड़ को बैठा कर सत्संग नहीं सुनाया जा सकता। ...

अफगानिस्तान से चीन तक बदलते हालात ! भारत के लिए चुनौती, चेतावनी या खुद को सिद्ध करने का मौका !

पिछले चार दिनों में हुई हलचल से अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर होते हुए तिब्बत तक की बदलती परिस्थितियों के बीच भारत के लिए चुनौती, चेतावनी या समझदारी से काम करने की आवश्यकता है ? ...

कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्व भारत तक फैले सीमा विवाद की हकीकत जिसे सरकारें छिपा लेती हैं।

आजादी के बाद से ही भारत का अपने पड़ोसी देशों से या पड़ोसी देशों का भारत से विवाद रहा है लेकिन सरकारों ने कभी खुले मन से अपनी अपनी जनता को इससे अवगत नहीं कराया। ...