तेजी से बदलती भारतीय राजनीति या वैश्विक राजनीति के अनुसार नई दिशाएं एवम् नए बदलाव !

द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ही न्यू वर्ल्ड ऑर्डर लागू हुआ, दुनियां को दो हिस्सों में बांट दिया गया जिसमे जो भी मार्शल कौम थी उन्हे भी संस्कृति को नजरंदाज करते हुए टुकड़ों में बांट दिया गया बेशक वो पंजाबी हो या कुर्द, अज़री, बलोच या मुस्लिम।

इसके बाद नए देश बने, सरहदे बनी और जाने अनजाने दुनियां को दो खेमों में बांट दिया गया जिसे पूंजीवादी समाज और कम्युनिस्ट समाज के रूप में बताया जाता हैं। इसके साथ ही, जिनके लिए युद्ध एक व्यवसाय था उन्होंने विश्व युद्ध के स्थान पर एक नई वार को जन्म दिया जिसे "कोल्ड वार" का नाम दिया गया।

कोल्ड वार की आड़ में महाशक्तियों के दोनों खेमे अपने अपने गुट के देशों को लड़ाते रहे तथा हथियार बेचते रहे लेकिन कभी खुद सामने सामने नहीं आए ( केवल एक अपवाद को छोड़कर )

फिर सोवियत संघ के पतन के साथ ही दुनिया की ताकत का एक ही केंद्र बन गया जिसे अमेरिका कहते है लेकिन अमेरिका के अहंकार और चीन द्वारा चुपचाप ताकतवर बनना नजरंदाज कर दिया गया जिसका खमियाजा  अमेरिका को ही भुगतना पड़ रहा है और इसी अहंकार काल में रूस ने पुतिन के नेतृत्व में इतनी शक्ति प्राप्त कर ली कि वो आज यूएस को न केवल चुनौती देने लायक हो गया है अपितु सीरिया और अफगानिस्तान से पलायन को मजबूर कर दिया है।

लेकिन क्या इस भूमिका का और भारत की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का कोई सम्बन्ध हो सकता है ?

कई गहन विश्लेषण करने वाले बुद्धिजीवियों के अनुसार बिना किसी संदेह के इनका सम्बन्ध है क्योंकि यदि कुछ वर्ष पहले चले तो अधिकांश देशों ने SDG के नाम से एक नई विश्व व्यवस्था की न केवल कल्पना की थी अपितु इस पर अपनी सहमति बनाकर समझौते पर हस्ताक्षर भी किए थे जिनमे ब्रिटेन, फ्रांस अमेरिका के साथ साथ रूस, भारत, पाकिस्तान और चीन भी है।

इसी बीच विश्व व्यवस्था में नई खेमेबाजी शुरू हो गई तथा दुनियां के अर्थजगत पर कब्ज़ा समझे जाने वाले रोथ्चिल्ड परिवार ने माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक तथा डिजिटल संसार के माध्यम से पुनः अपनी सत्ता मजबूत करने की योजना बनाई क्योंकि पेट्रो डॉलर के युग का भी अंत समझा जाने लगा था तथा थर्ड वर्ल्ड के नेताओ द्वारा किए गए भ्रष्टाचार एवम् आतंकवाद से दुनिया में फिर से अशांति की सम्भावना बन गई।

लेकिन इसी दौरान चीन के आर्थिक जगत एवम् उद्योग जगत में बढ़े वर्चस्व एवम् एकछत्र साम्राज्य ने रोथचिल्ड के आर्थिक दर्शन को ध्वस्त कर दिया जिसमें भविष्य की मुद्रा केवल डिजिटल करेंसी होनी थी और 5G के माध्यम से पूरी दुनिया को मुट्ठी में करना था।

इसी कड़ी में वर्तमान संसदीय प्रणाली के लोकतंत्र में भी परिवर्तन की योजना बनाई गई क्योंकि वर्तमान बहू पार्टी लोकतंत्र में पैसे के अपव्यय, भ्रष्टाचार के अतिरिक्त ढेर सारे राजनेताओं को संतुष्ट करना भी कठिन काम महसूस किया गया।

सम्भावना है कि धीरे धीरे दुनिया को ऐसे लोकतंत्र की ओर ले जाया जाए जहां केवल दो दल हो तथा एक शक्तिशाली नेतृत्व हो बाकी उसके नीचे काम करने वाली व्यवस्था बहुत कुछ पुरानी गवर्नर प्रणाली या सल्तनतो जैसी सूबेदारी सिस्टम हो और बम बारूद के स्थान पर आर्थिक युद्ध किए जाएं।

यदि ऐसा ही है तो आज सामने एक गुट है जिसमे ब्रिटेन, अमेरिका एवम् इजरायल है तो दूसरे गुट में रूस, चीन तथा उसके समर्थक देश है ( यहां समर्थक से उनका आश्रित समझना चाहिए )

ऐसे में किसी भी देश में या तो right center पार्टी सत्ता में है या left center क्योंकि अब extremely right or left का युग समाप्त हो चुका है यहां तक कि चीन तथा रूस जैसे कम्युनिस्ट के अलम्बरदार भी बीच का रास्ता लेकर विकास कर रहे है।

इन परिस्थितियों में left oriented विचारधारा का कांग्रेस से जुड़ना स्वाभाविक ही है इसीलिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी के नेतृत्व में पूर्व वामपंथी विचारधारा वाले युवाओं को प्राथमिकता दी है इसीलिए कन्हैया कुमार का कांग्रेस से जुड़ना कोई हैरानी की बात नहीं है।

पंजाब राज्य में नवजोत सिंह सिद्धू के मन की हलचल बेशक भारतीयों के मन में ना आई हो या जानकर भी चुप रहे हो लेकिन सरहद पार पड़ोसी देश में जरूर चर्चा चल रही थी और इमरान खान द्वारा कभी भी अपनी संसद भंग करके चुनाव कराने की सम्भावना पर विचार से जोड़कर चर्चित किया जा रहा है ( इसी विषय पर News Number पर ही एक रिपोर्ट कल प्रकाशित हुई थी ) 

सिद्धू का बीजेपी छोड़कर कांग्रेस से जुड़ना ( इससे पहले वो बीजेपी छोड़कर आम आदमी पार्टी के केजरीवाल से नेगोशिएट करने गए थे लेकिन उनकी शर्तें अरविंद केजरीवाल ने स्वीकार नहीं की थी ) कांग्रेस से जुड़ने के बाद मुख्य मंत्री के विरूद्ध सार्वजनिक बगावत, उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन होना और चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा पंजाब राजनीति का मीरासी पन या कपिल शर्मा शो ही माना जा रहा है।

रामायण में कुदरत ने राम को वनवास दिलवाना था जिसके लिए कैकेई को माध्यम बनाना था लेकिन क्योंकि कैकेई का मन कभी कलुषित भी नहीं हो सकता था तो उसके मन में कलह के बीज डालने के लिए मंथरा दासी को चुना गया बेशक वो भी राम को बहुत प्यार करती थी किन्तु उसके मन मस्तिक में थोड़ी सी गुंजाइश बाकी थी जिसके सहारे से उसके माध्यम से साज़िश को वस्तिवक स्वरूप दिया गया।

याद रखना चाहिए कि कॉरपोरेट सेक्टर में किसी को नौकरी देने से पहले एचआर मैनेजर यह भी ध्यान रखता है कि व्यक्ति की स्थिरता कितनी है इसलिए यदि किसी को लगता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस छोड़कर मंत्री पद के लालच में बीजेपी जॉइन कर लेंगे तो यह उनका day dream होगा और यदि ऐसा हो गया तो यह राजशाही पर कलंक लगाने जैसा हो जाएगा जिसे कैप्टन साहब कभी नहीं करेंगे।

लेकिन यदि नवजोत सिंह सिद्धू अब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में वापस जाते है तो उनकी स्थिति धोबी घाट वाली हो जाएगी जिसे सिद्धू साहब भी समझते हैं और यदि झाड़ू वालो की  झाड़ू पकड़ते हैं तो यह उनकी राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा होगा।।

बहरहाल पंजाब में राजनीतिक उठापटक का बुद्धिमानी भरा राजनीतिक समाधान कांग्रेस आला कमान ने निकाला है जिसके लिए केवल दो शब्द "ठोको ताली"

पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान और सिद्धू साहब की रहस्यमय समानता !

पंजाब दो हिस्सों में बटा हुआ है और दोनों ओर के पंजाबी दिलखुश तो है ही साथ भी प्रत्येक हलचल तथा घटनाओं के प्रति सचेत भी रहते है। 3 साल पुरानी इमरान खान की तब्दीली हकूमत का विश्लेषण वहां की जनता ने शुरू कर दिया है लेकिन इस बार आइने के दूसरी ओर नवजोत सिंह सिद्धू को दिखाया जा रहा। बेशक यह ऐतिहासिक तथ्य है या नहीं लेकिन निसंदेह अर्थपूर्ण तो है ही। ...