पटियाला राजघराने के कैप्टन अमरिंदर सिंह और कांग्रेस द्वारा इन्हे सम्मान दिए जाने का छुपा कारण !

1947 अंग्रेज़ो को हिंदुस्तान से जाना पड़ा और तीन शर्तो के साथ ब्रिटिश इंडिया को आज़ादी प्राप्त हुई जिसमे एक तो मुल्क का बटवारा था और दूसरा लगभग 600 प्रिंसली स्टेटस को निर्णय लेने का अधिकार कि वो चाहें तो भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बने या आज़ाद रहे।

मुस्लिम बहुल इलाकों को पाकिस्तान के नाम से एक नया देश बना दिया गया लेकिन साथ ही सिखो को भी अपना आज़ाद मुल्क बनाने के लिए प्रेरित किया जाता रहा जिसे तत्कालीन सिख नेताओ ने स्वीकार नहीं किया क्योंकि 47 से पहले सिख का अर्थ सिर्फ केश धारी सिख भी नहीं था और तब किसी ने अलग होने की कल्पना भी नहीं की थी।

राजघरानो की सूची में हैदराबाद दक्खन, बहावलपुर, नाभा रियासत और पटियाला स्टेट ऐसे थे जो आज़ाद रहने मे सक्षम भी थे और इनके पास आवश्यकता अनुसार सेना भी थी। इनमे भी केवल पटियाला राजघराने के पास तोपखाना ( आर्टलरी ) यूनिट थी।

लेकिन महाराजा पटियाला गांधी जी के विचारो एवम् नेहरू जी से न केवल प्रभावित थे अपितु गहरे मित्र भी थे हालांकि अंग्रेज़ो ने या उनके शागिर्दों ने तत्कालीन महाराजा के निजी जीवन एवम् चरित्र पर झूठे सच्चे आरोप लगाते हुए कई कहानियां फैलाई।

यहां एक गोपनीय रिपोर्ट का खुलासा है जिसका आधार पाकिस्तान के गोपनीय दस्तावेज है जिनका वहां के पूर्व राजनयिक ने खुलासा किया था और इनके आधार पर समझा जा सकता है कि किन अहसानों के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी से लेकर आजतक कांग्रेस या भारत में कभी किसी ने पटियाला राजघराने की शान में गुस्ताखी नहीं की यद्धपि बाकी सभी प्रिंसली स्टेटस को किनारे कर दिया गया।

आज भारत के अटूट अंग कहलाए जाने वाले कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाए रखने का श्रेय यदि किसी को मिलना चाहिए तो वो कैप्टन अमरिंदर सिंह के बुज़ुर्ग है।

भारत_कांग्रेस_कश्मीर_और_महाराजा_पटियाला

कुछ तो ऐसा जरूर है तो अटल बिहारी को मजबूर होना पड़ा, 

1947 पार्टिशन से पहले ही नेताओ को जानकारी थी और उसी आधार पर तैयारियां पूरी की गई थी। राजघरानो से सम्पर्क बनाए रखने के साथ साथ उनका सहयोग लिया गया था।

जब नेहरू और पटेल बाकी रियासतों को साम दाम या कैसे भी जोड़ रहे थे तो क्या वो भी संघी थे जो किसी को कश्मीर याद नहीं रहा होगा।

कुछ गोपनीय खुलासे/सबूत जो उधर के तर्कों के आधार है।

कश्मीर के मद्दनजर नेहरूजी ने रेड़कलिफ और लॉर्ड माउंटबेटन से फेवर लिया जिसमे पटियाला राजघराने का अहम योगदान रहा तथा गुरदासपुर को भारत का हिस्सा बना लिया जबकि यहां की आबादी मुस्लिम ज्यादा थी क्योंकि गुरदासपुर ही पंजाब और कश्मीर को जोड़ता था।

आज़ादी के तुरन्त बाद मेहरचंद महाजन को महाराजा हरिसिंह का प्रधानमंत्री प्लांट कर दिया साथ ही पटियाला आर्टलरी को श्रीनगर नियुक्त कर दिया। साथ ही महाराजा पटियाला ने महाराजा हरिसिंह पर व्यक्तिगत दबाव बनाए रखा।

महाराजा ने 12 अगस्त को दोनों सरकारों को पत्र लिखा और स्टैंड स्टिल (यथा स्थिति) के लिए प्रार्थना की जिसे जिन्ना ने स्वीकार कर लिया लेकिन भारत ने चुप्पी साध ली।

पटियाला फौजों की उपसथिति की भनक लगते ही पाकिस्तान ने बलोच रेजिमेंट को उतार दिया और नतीज़ा सामने है।

महाजन और माउंटबेटन ने विलय के लिए महाराजा को तैयार कर लिया क्योंकी महाराजा युएन में जाने के लिए तैयार था।

मार्च 1948 में महाजन दिल्ली बुला लिए गए और सुप्रीम कॉर्ट में जस्टिस नियुक्त हुए।

इस संदर्भ में बहुत कुछ अनकही कथाएं वी के कृष्णन और मेहरचांद महाजनकी आत्मकथाओं में मिलती हैं।

जैसे बगदादी के मरने का ट्वीट इस बात की घोषणा है कि खाड़ी से यूस बाहर निकल गया है वैसे ही क्या मोदी और शाह की डॉक्ट्रिन भारत को घाटी से बाहर करने की है ? यदि दुस्वप्न देखने के आदि हो तो नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा कैप्टन अमरिंदर सिंह के विरूद्ध उठाई गई आवाज़ों का कश्मीर कनेक्शन भी जोड़ा जा सकता है।

जैसे ट्रमप से पहले तक कोई सोच भी नही सकता था कि अमेरिका भी घुटने टेक सकता है या गोर्बाचोव से पहले सोवियत भी टूट सकता है वैसे ही भविष्य को किसने देखा है?

किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले किन्तु परंतु और सवालात जरूर किया करे।

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