भगतसिंह ! साजिशों का शिकार रहा अद्भुत व्यक्तित्व।

लेनिन, चे ग्वेरा, मार्क्स से लेकर किसी भी क्रांतिकारी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए बिना किसी किसी परंतु के कहा जा सकता है कि भगत सिंह के विचार और कुर्बानी इनसे सबसे बहुत ऊंची थी क्योंकि भगत सिंह वो विराट नाम है जिसमे गांधी भी बसता था और गांधी को भी अपने दिलों दिमाग में भगत सिंह को बसाना पड़ा।

लेकिन यह  दुखद ही नहीं अपितु आज तक एक शर्मिंदगी का कारण होना चाहिए कि भगत सिंह अपनी शहादत से लेकर आज तक साजिशों का शिकार बनाए रखें गए। उनका नाम अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल जरूर हुआ लेकिन उनके लिए भारत पाकिस्तान के राजनेताओं ने अपनी जिम्मेदारी तथा उनके प्रति हक अदा नहीं किया।

भगत सिंह के विरूद्ध साजिशों की शुरुआत उनके चित्रों से शुरू होती हैं और जो फोटोग्राफ्स प्रचलन में हैं उनमें से कुछ पर संदेह व्यक्त किया जाता रहा है। उनकी एक फोटो चारपाई पर बैठे हुए हैं जिसे अंग्रेज़ो ने प्रचारित किया था क्योंकि इसके माध्यम से वो सिख समुदाय को नीचा दिखाना चाहते थे या मनोबल तोड़ना चाहते थे।

इस चित्र में भगत सिंह नंगे सिर बैठे दिखते है जबकि सिख समुदाय में केशो का सम्मान न करना आत्महत्या जैसा है। दूसरा उन्हे नास्तिक कहकर प्रचारित किया गया जिसके लिए उनके लेखन "मै नास्तिक क्यों हूं" का सन्दर्भ दिया जाता हैं ।

वास्तव में नास्तिक होने और कर्मकांड या पाखंड का विरोधी होने के बीच इतनी महीन लकीर होती है कि कभी भी किसी को भी इधर से उधर दिखाया जा सकता है। कुछ ऐसा ही गांधी और नेहरू द्वारा भगत सिंह का समर्थन न करने का आरोप लगाया जाता हैं जबकि हकीकत यह है कि भगत सिंह के अंदर भी गांधी बसते थे और गांधी भी कभी खुद को भगत सिंह से जुदा नहीं कर पाए।

चित्रों के ही सन्दर्भ में भगत सिंह का हैट लगाकर एक फोटो बहुत प्रचलित हैं जिसे प्रोफेसर चमन लाल अंग्रेजी साम्राज्य की साज़िश मानते हुए एक मानसिक युद्ध का हिस्सा समझते है और यह ब्रिटिशर्स द्वारा भगत सिंह को अंग्रेजी सभ्यता का समर्थक होने के उद्देश्य से प्रचारित करना बताया जा सकता है।

शहीद और क्रांतिकारी हमेशा अमर रहते है इसमें कोई शक नहीं है और इसी डर से पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जिया उल हक की नींद हराम होती थी क्योंकि उसे हमेशा यह खौफ रहता था कि लाहौर से लेकर इस्लामाबाद तक का युवा भगत सिंह से प्रेरणा लेकर उसके विरूद्ध खड़ा हो सकता है।

भगत सिंह के इसी खौफ से तानाशाह जिया ने उस जेल को ही ज़मींदोज़ करने का हुक्म सुना दिया जहां आज़ादी के दीवानों पर ज़ुल्म किए जाते थे और क्रांति के तीर्थ उस फांसी की कोठरी पर सड़क बना दी जिस फांसी घाट में शहीद ए आजम शहीद हुए थे तथा उस चौक का नाम सादमान चौक रख दिया जिसे एक लंबे संघर्ष के बाद लाहौर के भगत सिंह समर्थको ने भगत सिंह चौक रखवाया।

क्योंकि यह सिद्ध हो चुका है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को झूठे मुकदमों में फांसी दी गई थी और अंग्रेज़ सरकार मानती थी ये व्यक्ति नहीं क्रांति है तो 2015 - 16 में लाहौर हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई जिसमे तमाम सबूतों के आधार पर अदालत से दरख्वास्त की गई कि भगत सिंह तथा साथियों को बेगुनाह साबित करते हुए उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाए।

लाहौर हाई कोर्ट ने फिलहाल यह रिट ठंडे बस्ते में डाल दी है और इसके लिए तर्क दिया गया है कि उनकी फांसी के समय सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली था या लंदन स्थित हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के पास यह शक्तियां थी तो इसका फैसला या तो नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट कर सकती हैं या लंदन से हो सकता है।

यह दुर्भाग्य है कि भारत सरकार से आजतक किसी ने इसी अपील नहीं की क्योंकि कहीं ना कहीं भारत के राजनेता भी हक के लिए उठने वाली क्रांति से खौफ खाते है शायद इसीलिए अस्सी के दशक के बाद से भगत सिंह को धीरे धीरे पंजाब के स्कूलों से कॉर्नर किया जाने लगा।

उसी दौरान भगत सिंह का एक चित्र बहुत प्रचारित हुआ था जिसमे वो पीली पगड़ी सजाए नजर आते है जिससे भारत की गुप्तचर एजेंसियों को खासी दिक्कत महसूस हुई थी और इसे भी एक मानसिक युद्ध समझा गया।

वर्तमान पाकिस्तान के जिला लायलपुर ( फैसलाबाद ) के बंगा पिंड में जन्मे क्रांति और शहादत के ध्रुव तारे भगत सिंह का आज जन्मदिन है और NewsNumber परिवार उन्हे सादर स्मरण करता है।

लेकिन यकीनन कुछ तो ऐसा है जो हमे सोचने के लिए मजबूर करता है कि उपमहाद्वीप द्वारा सम्मानित किए जाने वाली शख्सियत को क्यों वो स्थान प्राप्त नहीं हुआ जिसके वो हकदार है।

यदि भारतीय मीडिया में कोई शहीद भगत सिंह पर उनके जन्मदिन पर कोई चर्चा नजर आए तो समझ लें कि उपर लिखा सब ग़लत है।

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