भारतीय प्रधानमन्त्री की अमेरिका यात्रा और असहज कर देने वाले दृश्य जिसके लिए घटना से अधिक रिपोर्ट करने वाले का दोष माना जा रहा है।

भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी अपनी अमेरिका यात्रा से वापस दिल्ली लौट आए जहां उनके स्वागत हेतु हवाई अड्डे पर विशेष आयोजन किया गया था।

यद्धपि चर्चा यह है कि अमेरिका में उचित सम्मान ना होने के कारण भारत के सोशल मीडिया पर बहुत ट्रोल किया जा रहा था तो असहजता या मायूसी दूर करने के लिए बीजेपी द्वारा स्वागत समारोह का आयोजन किया गया।

असहजता का कारण तो कोई विशेष नहीं है लेकिन लेकिन अपनी पहले की नियमावली के इतर इस बार प्रधानमन्त्री जी के काफिले में भारतीय पत्रकारों की टीम भी थी जिनमे से कुछ प्रिय या निकटतम टीवी एंकर ने अतिउत्साह में उल्टा देश, प्रधानमंत्री एवम् अपने संस्थान को हंसी का पात्र बना दिया तथा कई बार हास्यास्पद स्थिति पैदा हो गई। इसके अतिरिक्त उनकी रिपोर्टिंग से अधिक उनकी ट्रोलिंग की चर्चा हो रही है।

भारत में चलने वाले हिंदी भाषी सेटेलाइट चैनल्स में टुडे ग्रुप के आजतक को सदैव सम्मान की नज़रों से देखा जाता रहा है लेकिन वाशिंगटन में उनकी रिपोर्टर द्वारा लाइव रिपोर्टिंग के समय एक दर्शक द्वारा खुलासा कर देना कि वो पैसा लेकर ढोल बजाने आया है या दूसरे दर्शक द्वारा भारत में ग़रीबी बढ़ गई है कहकर देश का अपमान करना अशोभनीय था।

उसी टीवी कर्मी के संदर्भ में उसके संस्थान को भी असहजता महसूस हुई होगी जब चैनल की आईडी युक्त माइक के साथ विदेश मंत्रालय की अधिकारी ने अपने कक्ष से बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया क्योंकि वो बिना आज्ञा उसके केबिन में घुसकर बाइट लेना चाहती थी।

निसंदेह यह हैरानी और मूर्खता पूर्ण हरकत थी कि विदेश सेवा में नियुक्त संवेदनशील पोस्ट पर भारत के लिए कार्य रही किसी अधिकारी के टेबल के निकट तक बिना अनुमति के पहुंच जाए ? 

इसके अतिरिक्त भारतीय मीडिया द्वारा प्रधानमन्त्री जी का विरोध कर रहे किसान आंदोलन समर्थक भारतीय अमेरिकियों को नजरंदाज करना भी मीडिया का भरोसा खत्म करता है तथा संदिग्ध या पेडिग्री मीडिया की संज्ञा दिलवा देता है।

अक्सर महिला पत्रकारों को नेताओ से निकटता होने के कारण अति आत्मविश्वास हो जाता हैं जिसके कारण संस्थान की साख पर भी बट्टा लगता है। या ये वास्तव मे ही पत्रकार होते है जिसकी परिभाषा आज और इस तेजी के माहौल में समझना जरूरी हैं।

पत्रकार शब्द भारत में 1952 के बाद नई हिंदी थोपने के बाद ही प्रचलन में आया है अन्यथा हिन्दुस्तानी में ख़बरनवीस शब्द का इस्तेमाल होता था जिसे अंग्रेजी के journalist का पर्यायवाची शब्द तो नहीं कह सकते।

Journalist शब्द जर्नल से बना है और यह एकाउंटेंसी वाला जर्नल ही है ( जर्नल, खाता/लेजर, बलैंस शीट) जर्नल को हिन्दुस्तानी/उर्दू में रोजनामचा कह सकते हैं। नई हिंदी में दैनिंदनी शब्द पैदा किया गया है। इसी प्रकार रोजनामचा लिखने वाले को मुहर्रिर या सहाफी कह सकते हैं।

15 वीं या 16 वीं शताब्दी में चर्च के बाहर एक डायरी रखी होती थी जिसमें उस दिन के समयानुसार कार्यक्रम लिखे होते थे और उसको लिखने वाले को Journalist कहते थे तथा लिखने के काम को जर्नलिज़्म नाम दिया जाता था।

इसी को पर्सियन में सियाफी बोला गया जिसका सम्बन्ध सियाही से भी जोड़ सकते हैं अर्थात सफेद कागज पर काली स्याही से लिखने वाला जिसे नई हिंदी में पत्र कार नाम दिया गया अर्थात पत्र ( समाचार पत्र/ अखबार ) को आकार देने वाला।

वैसे तो किसी भी समाचार संस्थान की आत्मा फील्ड में दौड़ रहा रिपोर्टर ही होता हैं लेकिन रिपोर्टर के उत्साह और ऊर्जा को व्यवस्थित करने के लिए संपादक / एडिटर होना भी जरूरी है अन्यथा शर्मिंदा होकर कमरे से बाहर निकलना पड़ता है।

भारतीय पौराणिक कथाओं में रुचि रखने वाले नारद मुनि को विश्व का प्रथम पत्रकार मानते है या मानकर अपनी हीन भावना को संतुष्टि प्रदान करते हैं क्योंकि यदि वर्तमान समय में सूचना क्रांति एवम् दर्शको/पाठको की जागरूकता के स्तर पर देखा जाए तो नारद जी को इनफॉर्मर/ स्ट्रिंगर अथवा हिंदी में चुगलखोर कहना चाहिए क्योंकि अब यह समय न्यूज को सूचित करने का न होकर सूचना या घटना का विश्लेषण करके प्रस्तुत करने का है तथा वो भी सच्चाई एवम् ईमानदारी के साथ क्योंकि झूठ के पैर भी नहीं होते और झूठ की बिल्डिंग में पांच मंजिले भी नहीं होती।

भारतीय प्रधान मंत्री जी की देश वापसी पर welcome home