कूटनीति, मोदी सरकार और दुशांबे सम्मिट ! SCO बैठक का विश्लेषण एवम् भारतीय प्रधानमंत्री का संबोधन।

पूर्व सोवियत देशों में से एक तजकिस्तन की राजधानी दुशांबे में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्चुयल भाग लेते हुए टेली संबोधन प्रसारित किया गया। भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजे इसका प्रसारण हुआ जिसकी अवधि 10 मिनिट थी।

SCO को एवम् इस सम्मेलन को समझने से पहले एक नजर गुजरे समय पर जरूर डालनी चाहिए जब दो महाशक्तियों के केंद्र होते थे और भारत उनमें से एक सोवियत संघ का सहयोगी माना जाता था यद्धपि उस कोल्ड वार के समय में भी भारत ने सोवियत संघ से निकटता बनाए रखने के बावजूद अमेरिका से दूरी नहीं बनाई थी।

चीन और पाकिस्तान के सहयोग एवम् साजिशों तथा अमेरिका की कूटनीतिक सफलता से सोवियत संघ का बिखराव हो गया और विश्व में एक ही शक्ति केंद्र बन गया जिसे अमेरिका कहा जा सकता है।

क्योंकि अमेरिकी नीतियां अपने लाभ एवम् स्वार्थों तक केंद्रित थी और अराजकता फैला कर सत्ताएं उलट पलट करना पेंटागन की कार्यशैली थी तो उसका सामना करने के लिए अपेक्षाकृत कमजोर देशों ने अपनी सुरक्षा और सर्वाइवल को देखते हुए संगठन बनाने शुरू किए जिनमें मिलट्री सहयोग के संगठन भी थे और आर्थिक विकास के लिए तथा एकजुटता के लिए भी।

उस समय की परिवर्तित स्थितियों में दक्षिण एशिया में सार्क संगठन बना जिसका लाभ सभी सदस्यों को हुआ हालांकि इसके रक्षा सहयोग नहीं था जो होना चाहिए था लेकिन शायद भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी भावनाओं के कारण ऐसा नहीं हुआ होगा।

क्योंकि सोवियत संघ का मुख्य केंद्र रूस आर्थिक रूप से बदहाल हो चुका था तो उसने ब्रिक्स की नींव रखी जिसमे भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे जिसका एकमात्र उद्देश्य आपस मे आर्थिक सहयोग बढ़ाना था हालांकि वर्तमान में यह भी लगभग महत्वहीन हो चुका है।

क्योंकि चीन ने भी आर्थिक विकास का रास्ता चुन लिया था तो उसने शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना की जिसमे मुख्यत रूस, चीन एवम् पूर्व सोवियत देश थे बेशक बाद में भारत और पाकिस्तान को भी पूर्ण सदस्यता प्राप्त हो गई किन्तु ईरान की सदस्यता पर ताजिकिस्तान को आपत्ति रहती थी तो ईरान को अभी तक पूर्ण सदस्यता नहीं मिली थी जो आज प्राप्त हुई हैं।

इसके अतिरिक्त रूस द्वारा पूर्व सोवियत देशों के साथ नाटो की तर्ज पर रक्षा संगठन भी बनाया गया जिसकी बैठक भी दुशांबे में चल रही है।

जैसे ही रूस शक्तिशाली हुआ और चीन अपनी आर्थिक शक्ति के कारण अमेरिका को चुनौती देने में सक्षम हुआ वैसे ही अमेरिका ने चीन को रोकने के लिए कवाड़ समूह बनाया जिसमे अमेरिका, भारत, जापान एवम् ऑस्ट्रेलिया शामिल थे लेकिन इस कथित संगठन का ना कोई उद्देश्य परिभाषित किया गया ना ही इसका कोई केंद्रीय ऑफिस बना।

इन्हीं बदलावों के बीच चीन ने अपने व्यापारिक भविष्य को सुरक्षित करते हुए वन रोड वन बेल्ट योजना शुरू कर दी तथा यूरोप सहित मध्य एशिया को रेल एवम् सड़क मार्ग से जोड़ लिया जिसका प्रवेश द्वार या मुख्य जंक्शन पाकिस्तान एवम् अफगानिस्तान है।

किसी भी कारण से अमेरिका बीस साल बाद अफगानिस्तान से निकल गया और फिलहाल वहां चीन का प्रभुत्व साफ नजर आता है ( पाकिस्तान को भी चीन का उपनिवेश जैसा समझा जाना चाहिए ) 

क्योंकि डॉ मनमोहन सिंह जी की सरकार के समय भविष्य की आहट पहचान ली गई थी तो भारत ने भी वैकल्पिक सड़क मार्गों की योजना तैयार की तथा ईरान के साथ मिलकर चाबहार बंदरगाह, हैलमंट सड़क योजना ( नॉर्थ साउथ corridor ) बनाई जिससे भारतीय उत्पाद निर्बाध रूप से यूरेशिया के देशों में एवम् वेस्ट एशिया तक पहुंचते रहे एवम् वहां से तेल आपूर्ति बाधित ना हो।

वर्तमान सरकार की नीतियों में पाकिस्तान सभी निर्णयों का केंद्र माना जाने लगा तो विदेश नीति निर्माताओं ने भी केवल पाकिस्तान केंद्रित आक्रमक प्रयास किए जिसके नतीजे में भारत को अफगानिस्तान तक वाया पाकिस्तान जो सड़क मार्ग उपलब्ध था वो भी बंद हो गया और पाकिस्तान द्वारा भारत के विरूद्ध आरोपों के अतिरिक्त अफ़गान विद्रोहियों को मदद दी गई जिनकी अब अफगानिस्तान में सरकार बन चुकी है।

निरन्तर विश्व भ्रमण करने वाले भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा दुशांबे सम्मिट में भाग ना लेना जरूर हैरानी की बात है क्योंकि इस समय जब भारत को कॉर्नर किया जा चुका है और लगभग आइसोलेट हो गया है तो प्रधानमंत्री जी को अन्य नेताओ से आमने सामने की मुलाकात करनी जरूरी थी।

ताजिकिस्तान का महत्व भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यही एकमात्र ऐसा देश है जहां भारत के भारत से बाहर फारखोर में सैनिक अड्डे है। इसके अतिरिक्त ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से भी मुलाकात लाभप्रद हो सकती थी क्योंकि सदियों से भारत का सहयोगी रहा ईरान फिलहाल भारत से दूर होता जा रहा है जिसका कटु संकेत अभी ईरानी विदेश मंत्री की भारत यात्रा स्थगित करके दिया गया।

क्योंकि देशहित के सामने व्यक्तिगत छवि या अहंकार कोई मायने नहीं रखता तो इन स्थितियों में पाकिस्तान से भी बातचीत करने और सहयोग लेने में कोई बुराई नहीं थी और वहां इमरान खान की मौजूदगी का लाभ उठाया जा सकता था। कम से कम अफगानिस्तान के लिए रास्ता तो लिया जा सकता था।

किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ और भारत ने अपने विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रसाद को भेज दिया जिनकी छवि अमेरिकी सहयोगी की बनी हुई है जिसे कई बार अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बोला भी जा चुका है।

प्रधानमन्त्री जी के छोटे से संबोधन में ( मोदी जी द्वारा यदि केवल दस मिनिट बोला गया है तो इसे छोटा नहीं, सूक्ष्म कहना चाहिए ) पांच बार रेडिकलाईजेशन शब्द का उपयोग किया गया जिसे स्पष्ट रूप से अफगानिस्तान के सन्दर्भ में ही समझा जा रहा है यद्धपि कट्टरवाद का फैलाव भारत में भी हुआ है और जय श्री राम के युद्ध घोष जैसे नारो के साथ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगते रहे हैं।

यदि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को कट्टरवाद के नाम पर चिन्हित करके निंदा करने का प्रयास किया गया है तो यह भाषण लिखने वाले अधिकारियों की बुद्धि पर भी सवाल खड़े करने लायक है क्योंकि अमेरिका ना केवल वार अगेंस्ट टेरर की समाप्ति की घोषणा कर चुका है अपितु इन्हीं तालिबान के साथ उसने समझौते भी किए हैं और कुछ शर्तों के साथ इन्हे मान्यता देने के संकेत भी दे चुका है।

आतंकवाद और कट्टरवाद जैसे शब्दो का उपयोग करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्व से इस्लामोफोबिया की समाप्ति की ओर कदम उठाए जा चुके है और अब पांच साल पहले की तरह आतंक एवम् इस्लाम को नहीं जोड़ा जाता।

हो सकता है कि अफ़गान सरकार कट्टरवादी ही हो किन्तु यह उनका आंतरिक मामला है और उनके कट्टर होने या लिबरल होने से जब तक भारतीय व्यापारिक हितों को नुकसान नहीं होता तब तक हमे उस पर ध्यान भी नहीं देना चाहिए अन्यथा उनसे अधिक कट्टर इस्लामिक देश तो सऊदी अरब भी है और पर्दे की सख्ती ईरान में भी होती हैं ( ईरान में तो पुरुषों के कम कपड़े पहन कर सार्वजनिक स्थानों पर आना भी अपराध की श्रेणी में आता है ) 

इसके अतिरिक्त यूरेशिया के देशों में भारत की पहुंच बनाने के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान को नजरंदाज करना या उन्हे अपने विरोध में खड़ा करना भी कभी लाभदायक नहीं हो सकता।

इस मंच से भारत की किसी काल्पनिक सड़क परियोजना का जिक्र करना भी सीधे सीधे चीन को चुनौती समझा जा सकता है और इस अवस्था में जब चीन की सेनाए भारत के अंदर घुसकर कब्ज़ा जमाए बैठी है तो किस चमत्कार की आशा में चुनौती दी गई है इसका अंदाजा लगाना असम्भव है।

इस संगठन के अतिरिक्त पिछले दो दिनों में हुई वैश्विक राजनीति की हलचल को भी ध्यान में रखना चाहिए जिसमे अमेरिका द्वारा अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया को साथ लेकर एक सैनिक संगठन की स्थापना की घोषणा की गई है।जो चीन के कथित विस्तारवाद के विरूद्ध एकजुट होकर कार्य करेगा।

इससे पहले चीन के विरूद्ध एशिया पेसिफिक या इंडो पेसिफिक में एक क्वाड़ बनाया गया था जिससे जापान बार बार कन्नी काटता रहा क्योंकि जापान किसी परिस्थिति में भी चीन से युद्ध की सोच भी नहीं सकता। 

यदि साउथ चाइना सी में मलक्का के रास्ते चीन के व्यापार को समुद्र में बाधित भी किया जाता हैं तो भी चीन के पास वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में सड़क मार्ग है तथा तेल आपूर्ति के लिए रूस से सीधी पाइपलाइन है किन्तु यदि नेवल वार होती हैं तो भारत के पास क्या विकल्प हैं इसको भी ध्यान में रखकर नीति बनानी जरूरी है।

भारतीय विदेशमंत्री द्वारा चीन के विदेशमंत्री से साइड लाइन मीटिंग का भी जिक्र करना चाहिए जिसमे उन्होंने भारत की सीमाओं पर चीनी सेनाओं के जमावड़े की कोई चर्चा नहीं की। बाकी देखते हैं कि 24 सितम्बर को व्हाइट हाउस द्वारा बाकी तीनों क्वाड कोर कमेटी की बैठक में राष्ट्रपति बाइडेन क्या आदेश देते है ?

क्योंकि नेतृत्व के निर्णयों पर उंगली नहीं उठानी चाहिए तो इसीलिए वर्तमान भारत सरकार द्वारा लिए गए निर्णय उचित ही समझे जा सकते क्योंकि कोई भी अपनी समझ और आई क्यू के अनुसार ही सोचने के लिए बाध्य होता है।

तजाकिस्तान के दुशांबे में होने वाले हार्ट ऑफ़ एशिया सम्मेलन में विश्व की नजरे भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की सम्भावित औपचारिक बैठक पर है जो दक्षिण एशिया को शांति और समृद्धि के नए रास्ते की ओर ले जा सकती हैं।

2011 में तुर्की द्वारा अफगानिस्तान में शांति प्रयासों को दिशा देने एवम् सम्बन्धित देशों को सहयोग के लिए साथ जोड़ने हेतु हार्ट ऑफ़ एशिया नामक समूह बनाया गया जिसका अगला वार्षिक सम्मेलन तजाकिस्तान स्थित दुशांबे में 30 एवम् 31 मार्च को होना तय हुआ है। ...