जुल्फिकार अली भुट्टो! दक्षिण एशिया का ऐसा राजनेता जिसके नाम पर आज भी राजनीति होती हैं बेशक उसकी सोच से कोई सहमत हो या न हो।

जिवें सिंध ते जीवें भुट्टो के नारे के साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी आज तक राजनीति करती हैं बेशक जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया था और बीबी बेनजीर भुट्टो को शहीद कर दिया गया था।

इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान टूटने के बाद अपने देश को भुट्टो ने नई दिशा दी और मनोबल टूटने नहीं दिया।

जनाब भुट्टो साहब जो पाकिस्तान की राजनिति के एक बड़े राजनेता रहे है जिनका अंत बड़े दर्दनाक तरीक़े से यानि फॉसी के फंदे पर लटका कर किया गया था ।

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पाकिस्तान के एक सबसे ज़्यादा शिक्षित राजनेता रहे है जिन्होंने बम्बई, कैलिफ़ोर्निया, बारकले, व ऑक्स फ़ोर्ड में शिक्षा पाई थी । इनके पिता जूनागढ़ के दीवान रहे थे और भुट्टो साहब की पैदाइश 1928 में भारत में ही हुई थी । प्रारंभ से ही भुट्टो साहब मुस्लिम लीग के समर्थक थे जो हर हाल में पाकिस्तान चाहते थे।

भुट्टो साहब बेहद तेज तर्रार व्यक्तित्व के स्वामी थे और मात्र 30 साल की आयु में ही वर्ष 1958 मे वह पाकिस्तान सरकार में कैबिनेट मन्त्री बन गये थे। यूएनओ व अन्य मंचों पर वह पाकिस्तान व कश्मीर का मुद्दा बड़े जोशीले अंदाज़ से उठाते थे।

पाकिस्तान में वर्ष 1958 में जब जनरल अयूब खान साहब ने फ़ौजी बग़ावत कर सत्ता सँभाली तो भुट्टो साहब उनके भी सबसे विश्वस्त सलाहकार बन गये थे और अयूब खान साहब ने इन्हें पाकिस्तान का विदेश मन्त्री बना दिया था ।

जनाब भुट्टो साहब की सबसे बड़ी समस्या यह रही थी कि वह ज़बरदस्त रूप से भारत विरोधी थे। एक साक्षात्कार में जनरल अयूब खान ने यह क़बूल भी किया था कि 1965 का Operation Gibraltar के रचयिता भुट्टो साहब ही थे। भुट्टो साहब का यह मुग़ालता था कि 1962 के युद्ध व नेहरूजी की मृत्यु के बाद भारत कमजोर हो गया है और पाकिस्तानी सेना बड़े आराम से कश्मीर पर क़ब्ज़ा करते हुऐ दिल्ली तक पहुँच जायेगी । 1965 के युद्ध में पाकिस्तान की कितनी दुर्गति हुई थी और लाल बहादुर शास्त्री जी के नेतृत्व में हमारी सेना लाहौर तक पहुँच गई थी यह पूरी दुनिया जानती है । पाकिस्तान की शर्मनाक पराजय के बाद और ताशकंद समझौते के बाद अयूब खान ने भुट्टो साहब को अपने मन्त्री मंडल से बाहर कर दिया था । 

मन्त्री मंडल से बाहर होने के बाद जनाब भुट्टो साहब ने पाकिस्तान में अपनी नई राजनैतिक पार्टी बनाई और जनतंत्र की मॉग करने लगे। वर्ष 1969 में अयूब खान से जनरल याहया खान ने सत्ता सँभाली और पाकिस्तान में 1970 मे चुनाव कराये । इन चुनावों में तबके पूर्वी पाकिस्तान के शेख़ मुजीब उर रहमान को इतनी अधिक सीटें मिली की वह संयुक्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन सकते थे। पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी बाहुल्य जनता को यह क़तई गवारा नहीं था कि कोई पूर्वी पाकिस्तान का व्यक्ति उनपर राज करे।यद्यपि भुट्टो साहब की पार्टी को भी अच्छी ख़ासी संख्या में सीटें मिली थी पर वह भी नहीं चाहते थे कि कोई बंगाली उनके उपर राज करे । याहया खान ने मुजीब साहब को सत्ता सौंपने के बजाये उन्हें जेल में डाल दिया और पूर्वी पाकिस्तान को फ़ौज के हवाले कर दिया । इस मामले में जनाब भुट्टो साहब का याहया खान को पूरा समर्थन था। 

1971 में बांग्लादेश के उदय और पाकिस्तान की शर्मनाक पराजय के बाद याहया खान को सत्ता छोड़नी पड़ी और भुट्टो साहब पाकिस्तान के दिसंबर 1971 में अंतरिम राष्ट्रपति व मुख्य प्रशासक बन गये । 1972 के शिमला समझौते में पाकिस्तानी बंदियों को छुड़ाने व भारत द्वारा क़ब्ज़ाये गये इलाक़ों को वापस लेने के कारण पाकिस्तान में भुट्टो साहब की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई थी और उन्होंने 1973 के चुनावों में भुट्टो साहब की पार्टी को भारी जीत हासिल हुई और वह लोकतांत्रिक ढंग से प्रधानमंत्री बन गये।

प्रधानमंत्री बनते ही भुट्टो साहब ने पाकिस्तान की उन्नति के लिए काफ़ी काम किया पर भारत द्वारा 1974 मे पोखरन परमाणु विस्फोट के बाद वह तिलमिला गये और पाकिस्तान को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनाने के लिए यहॉ तक कहा कि ‘ हम घास खायेंगे पर एटम बम ज़रूर बनायेंगे। पाकिस्तान को परमाणु शक्ति देश बनाने में भुट्टो साहब का बड़ा योगदान है।

पाकिस्तान में फ़ौज पर नियंत्रण बनाये रखना हर शासक के लिये शुरू से ही एक चुनौती रहा है । भुट्टो साहब ने भी फ़ौज पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाये रखने के लिये सात वरिष्ठ फ़ौजी अफ़सरों की वरीयता को नज़र अंदाज़ कर अपने विश्वास पात्र लेफ़्टिनेंट जनरल जिया उल हक़ को वर्ष 1976 मे जनरल रैंक पर पदोन्नति कर पाकिस्तान का चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ़ नियुक्त किया था। 

भुट्टो साहब के कार्यकाल में ही बलूचिस्तान प्रांत में चुनावों में धांधली को लेकर ज़बरदस्त विद्रोह हुआ था जिसे उन्होंने सेना के दम पर कुचल दिया था । हज़ारों बलूचिस्तानी सेना की गोलियों से मारे गये थे। जनता में इसको लेकर काफ़ी रोष फैल रहा था तथा खुद भुट्टो व उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे। भुट्टो की तानाशाही, महंगाई व दूसरे मुद्दों को लेकर पूरे पाकिस्तान का विपक्ष ज़बरदस्त रूप से हमलावर हो गया था। भुट्टो साहब ने एक चाल चली कि अचानक पाकिसतान में आम चुनाव की घोषणा कर दी । 1977 के शुरुआती महीनों में चुनाव हुऐ और भुट्टो साहब की पार्टी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ । चुनावों के परिणामों से विपक्ष और हमलावर हो गया क्योंकि इन चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई थी । 

जनता के असंतोष व भुट्टो साहब की गिरती छवि से जनरल जिया हल हक़ साहब को मौक़ा मिला और उन्होंने जुलाई 1977 मे सैनिक बग़ावत कर खुद सत्ता संभाल ली और भुट्टो साहब को जेल में डाल दिया।

जनरल जिया एक शातिर व कुटिल व्यक्ति थे । वह जानते थे कि यदि भुट्टो को जीवित छोड़ा गया तो वह उन्हें नहीं छोड़ेंगे । जिया साहब ने भुट्टो पर एक राजनैतिक नेता की हत्या करवाने का मुक़दमा क़ायम कराया जिसमें कोर्ट ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाई । जिया उल हक़ साहब के पास यद्यपि भुट्टो साहब ने कोई दया याचिका दायर नहीं की थी पर दुनिया के अनेक देशों, संगठनों, व बडी हस्तियों ने जिया उल हक़ से उनकी फाँसी की सजा पर रोक लगाने का अनुरोध किया था जिसे जिया उल हक़ ने नहीं माना और दिनांक 4 अप्रेल 1979 को भुट्टो साहब को फाँसी दे दी गई। 

पाकिस्तान में उन दिनों यह चर्चा रहती थी कि फंदा एक है और गर्दन दो। यदि भुट्टो को फाँसी नहीं होती है तो फिर जिया उल हक़ की गर्दन पर फंदा कसना तय है ।

डिप्लोमेटिक नाटक का अंत जिसके कारण पाकिस्तान की सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।

दो दिन पहले दुनियां भर के राजनयिक क्षेत्रो मे हलचल मच गई जब समाचार मिला कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से अफगानिस्तान के राजदूत की बेटी का अपहरण हो गया है। ...