हिन्दी दिवस! भाषा की आड में संस्कृति बदलने की कवायद।

14 सितम्बर जिसे हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है और इससे अधिक हास्यास्पद क्या होगा कि वो सभी हैप्पी हिंदी डे बोलने लगते है जिन्हे उन्यासी और नवासी का अंतर भी मालूम नहीं होता तथा जो अपने बच्चो को कॉन्वेंट स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए जमीन आसमान एक किए रहते है बेशक वहां हिंदी बोलने की सख्त मनाही हो।

अविभाजित हिंदुस्तान के इतिहास और यहां की सांस्कृतिक विविधताओं की बात करे तो सदियों से यहां किसी एक भाषा का वर्चस्व नहीं रहा, प्राचीनतम भाषाओं में सिंधू घाटी सभ्यता की अभी तक ना पढ़ी जा सकने वाली भाषा है तो पाली तथा ब्राह्मी लिपि है। 

बोलियों की बात की जाए तो इस भूभाग में तमिल, सिंधी, हिंदको एवम् सरायिकी बोलियां प्राचीनतम मानी जा सकती है। ब्राह्मी लिपि फारसी की तरह दांए से बांए लिखी जाती थी जबकि एक हजार साल पहले शारदा लिपि बनाई गई जिसे बांए से दांए लिखा गया।

इसके अतिरिक्त संस्कृत भाषा को प्राचीनतम बताया जाता हैं लेकिन कई शोध सिद्ध करते हैं कि संस्कृत मूल रूप से सीरिया ने जन्मी भाषा है जिसे तत्कालीन प्रबुद्ध वर्ग ने गोपनीय दस्तावेज रखने के लिए परिष्कृत किया और एक वर्ग विशेष तक सीमित कर दिया।

क्योंकि सदियों से गुलाम रहने के कारण या आक्रमणकारियों को भी आत्मसात करते रहने के कारण इस क्षेत्र का अपना कोई भाषाई विकास नहीं हुआ था तो तुर्क शासकों ने भाषाई विविधता को सैनिकों को आदेश देने के लिए एक भाषा का विकास किया जिसे लश्करी बोला गया।

मुग़ल शासकों के समय इसी लश्करी को हिन्दुस्तानी पुट देकर देहलवी भाषा बनी जिसे आज उर्दू का नाम प्राप्त है। इसकी लिपि फारसी थी और उस समय क्योंकि फारसी विश्व की सम्पर्क भाषा थी तथा मुगलों ने उसे सरकारी माध्यम बनाया था तो हिन्दुस्तानी भाषा बोलियों में फारसी शब्दो की बहुतायत हो गई यहां तक कि पंजाब में अक्सर बच्चों के नाम भी इसी भाषा से लिए जाने लगे जैसे इकबाल सिंह, मुख्तयार सिंह, जमींदार सिंह आदि।

आज़ादी के बाद संविधान गठन के समय यह प्रश्न खड़ा हुआ कि भारत की राजकीय भाषा क्या होनी चाहिए ? परम्परा से उस समय तक उर्दू ही प्रचलित भी थी और आधिकारिक ( अदालती ) भाषा भी थी लेकिन उसमे मुस्लिम एवम् पंजाबी समाज का वर्चस्व था तो वर्तमान समय में हिंदी भाषी ( मध्य भारत ) के नेताओ को उससे असुविधा महसूस हुई दूसरा क्योंकि धर्म के नाम पर बटवारा होना बताया जा रहा था एवम् पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रभाषा उर्दू घोषित कर दी थी तो विवाद खड़ा हो गया।

हिन्दू महासभा जैसे धर्मांध दल भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की जिद पकड़ कर बैठे थे तो नेहरू जी जैसे व्यवहारिक नेता भाषा के आधार पर किसी सम्भावित अराजकता को महसूस कर रहे थे।

इसका मध्य मार्ग तलाश किया गया और 14 सितम्बर को हिन्दुस्तानी ( उर्दू बहुल ) भाषा को देवनागरी लिपि में भारत की राजभाषा घोषित कर दिया गया जिसके कारण कालांतर में राजभाषा दिवस से हिंदी दिवस मनाया जाने लगा।

हिन्दुस्तानी से हिंदी कुछ ऐसे ही बदल गई जैसे आज टेलीफोन को दूरभाष लिखा जाता है। क्योंकि फिल्में और साहित्य समाज का आइना होता है तो यह अंतर स्पष्ट रूप से 70 के दशक से पहले की फिल्मों की भाषा और आज के एकता कपूर जैसे सीरियल देखकर महसूस किया जा सकता है कि किस प्रकार बहुत धीमा जहर देकर बाकी भाषाओं और संस्कृतियों को ख़तम किया गया जिसकी कोशिश आज भी जारी है अन्यथा शादी को विवाह कहने की परम्परा ऐसे ही नहीं आई।।

हिंदी भाषा के सम्बन्ध मे तर्क दिया जाता हैं कि यह भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है जिसके लिए व्यापक शोध की आवश्यकता है क्योंकि जिस प्रकार सिखों को भी हिन्दू धर्म का हिस्सा बताया जा रहा है और हिन्दू मैरिज एक्ट के तहत लाया गया है वैसे ही कथित हिंदी भाषी क्षेत्रों की बृज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी आदि भाषाओं को हिंदी बताया जा रहा है।

इसका सबसे बड़ा धोखा यदि किसी समाज को भुगतना पड़ा तो वो निसंदेह पंजाबी समाज रहा जिसकी भाषा और संस्कृति को राष्ट्रभाषा के नाम पर मारने की साज़िश 47 से शुरू हुई जो आजतक चल रही है।

पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) में उर्दू लाद दी गई और शाहमुखी इतिहास बन गई तो उधर से उजाड़े गए पंजाबियों को भारत आने पर अपनी मातृ भाषा हिन्दी तथा धर्म हिन्दू लिखने के लिए मजबूर किया गया जिसका नतीजा यह हुआ कि पंजाब से बाहर ( यूपी, राजस्थान या मध्य प्रदेश ) में बसने वाले पंजाबी कब हिन्दू और हिंदी भाषी बन गए उन्हे भी अहसास नहीं हुआ।

इसी साज़िश में आरएसएस का सहयोग अकाली दल जैसे धार्मिक राजनीतिक दलों ने दिया जिन्होंने एक ही झटके में गुरु घर पर आस्था रखने वाले गैर केशधारी पंजाबियों को गुरु की संगत मानने से इन्कार कर दिया जबकि इससे पहले तक अरोरा पंजाबी सहजधारी सिख कहलाते थे और सिंधी भी गुरु घर के अनुयाई होते थे।

क्योंकि कागजों में मजबूरी वश खुद को हिन्दू लिख चुके थे और स्थानीय संस्कृति से जुड़े रहे थे तो पंजाब से बाहर रहने वाले पंजाबियों की तीसरी चौथी पीढ़ी तक सब कट्टर हिन्दू बन गए तथा संघ की साज़िश सफल हो गई जिसके लिए 1947 में बकायदा मुहिम चलाई गई थी जिसमे लाला जगत नारायण जैसे लोग अग्रणी भूमिका निभा रहे थे।

इसी साज़िश को बढ़ाने की कोशिश में 60 - 70 के दशक में हिंदी, हिन्दू हिन्दुस्तान जैसे आंदोलन करने की कोशिश भी गई थी जब दुकानों के बोर्ड केवल हिंदी में लिखने के लिए हंगामे हुए किन्तु दक्षिण भारत से विपरीत प्रतिक्रिया मिलने पर तात्कालिक रूप से आंदोलन रोक दिया गया बेशक अभी भी सोच मे जिंदा है।

कुछ ऐसे ही आंदोलन महाराष्ट्र में मराठी और पंजाब में गुरमुखी को लेकर 80 के दशक में चलाए गए जो समय के साथ जरूर मर गए क्योंकि उनसे आर्थिक नुकसान ज्यादा महसूस हो रहा था। हैरानी की बात है कि अंग्रेजी को लेकर अक्सर चुप्पी साध ली जाती हैं बेशक वो भारत हो या पाकिस्तान।।

इस प्रकार से एक भाषा थोपने का प्रयास दीर्घावधि में देश को तोड़ने की बुनियाद भी बन सकता है हमे इसके प्रति भी सचेत रहना चाहिए।

पाकिस्तान में केवल 7% उर्दू भाषी है लेकिन राजभाषा उर्दू है और अब वहां सिंधी, ब्लोची, पश्तो तथा पंजाबी को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है जिसके कारण स्थानीय लोगों को अपनी संस्कृति के बचाव के लिए आवाज़ बुलंद हो रही हैं जो कभी भी अलगाव का रूप ले सकती हैं हालांकि सिंधु देश, आज़ाद बलोचिस्तान और पख्तूनिस्तान की मांग अभी भी जिंदा हैं।

भारत क्योंकि अधिक विस्तृत है एवम् अनेक संस्कृतियों वाला देश है जिसमे कुछ परंपराए तो एक दूसरे से विपरीत है तो यहां यह खतरा ज्यादा होना चाहिए। जिस प्रकार गाय को कुछ इलाकों में पूजनीय माना जाता है किन्तु गोवा, केरल या उत्तर पूर्व में भोजन का हिस्सा है। हिन्दू मैरिज एक्ट के अनुसार पंजाबी समुदाय की अधिकांश शादियां अवैध घोषित हो सकती हैं।

ऐसे में यदि एक भाषा, या श्रेष्ठ भाषा या महान संस्कृति वाली विचारधारा के फैलाव का प्रयत्न किया जाता हैं तो इसे विभाजन के लिए नई पठकथा लिखने का प्रयास समझना चाहिए।।

फिर भी हैप्पी हिंदी दिवस टू ऑल 

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