क्रान्ति होती हैं, जनता द्वारा की जाती है लेकिन उस क्रांति को खड़ा करने और लक्ष्य तक पहुंचाने के पीछे जनता नहीं होती।

क्रांतियां होती हैं और आज के अधिकांश देशों के निर्माण के साथ किसी न किसी क्रांति का नाम जुड़ा हुआ है तथा साथ ही क्रांति लाने वाले नेता का भी।

किन्तु उन क्रांतियों के पीछे कोई सार्थक उद्देश्य रहे थे और उनका नेतृत्व किसी सक्षम व्यक्ति के हाथ में था। परन्तु यदि भीड़ के लिए कोई अराजकता खड़ी करनी हो तो योजनाकार क्या करते ?

गत कुछ वर्षो से या देखा जाए तो लगभग दस वर्षो से दक्षिण एशिया में विभिन्न राजनीतिक दलों या संगठनों ने अपनी पहचान के साथ कोई ना कोई रंग जोड़ लिया है जैसे भारत में केजरीवाल, जनरल वीके सिंह, रामदेव, आदि ने लोकपाल तथा भ्रष्टाचार के नाम पर आंदोलन किया और उसे भारत के राष्ट्र ध्वज तिरंगे के साथ जोड़ दिया।

फ़िर पहली बार इतने बड़े बहुमत से बीजेपी ने सरकार बनाई लेकिन हमेशा संदेश देते रहे कि उनकी सरकार "भगवा" सरकार है यद्धपि धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश की सरकार का किसी रंग विशेष से क्या सम्बन्ध हो सकता है या होना चाहिए हालांकि भगवा रंग का कथित हिन्दू धर्म से भी कोई सम्बन्ध नहीं है और यह रंग धार्मिक दृष्टिकोण से सूफीज्म का पसंदीदा कलर रहा है।

इसी के विपरीत कुछ दल एवम् संगठन हरा रंग लेकर आ गए और अपने अपने वोटों का ध्रुवीकरण करने लगे। माना जा सकता है कि केवल अपनी पहचान बनाने के लिए रंगो के पटके/ गमछो का प्रचलन किया गया किन्तु इसके पीछे की भावना को सभी जानते है।

सोवियत देशों में कलर रेवोल्यूशन क्यों लाया गया तथा किन कारणों से असफल हो गया इस विषय पर बहुत से विद्वानों ने विस्तार से विश्लेषण किया है एवं कई पुस्तकें भी उपलब्ध हैं इसे सरल शब्दो में समझने का प्रयत्न करते है।

क्योंकि लंबे समय से कम्युनिस्ट शासन के कारण वहां की जनता एक सीमित सोच में मर्यादित की जा चुकी थी तो वहां की जनता के पास कोई वैकल्पिक विचार उपलब्ध भी नहीं था साथ ही क्योंकि समाज में धार्मिक मान्यताएं भी नहीं थी तो जनता को किसी बिंदु पर एकत्र करके आंदोलन के लिए सड़को पर लाना एवम् भीड़ को प्रदर्शन कारी के रूप में बदलना मुश्किल था।

क्योकि किसी विचारधारा को प्रचारित करने या लोकप्रिय बनाने में तर्क कुतर्क एवम् काफी समय लगता है तो बाहरी एजेंसियों ने इसका आसान रास्ता तलाश किया और विभिन्न देशों की जनता को अलग अलग रंगो से जोड़ दिया तथा एक भीड़ को दूसरे का उदाहरण देकर उकसाया जाता रहा।।

दूसरा बिंदु है कि यह असफल क्यों हो गया और असफलता के बावजूद इसे फिर भी आजमाने की कोशिश क्यों की जाती रही है विशेषकर भारत, पाकिस्तान जैसे थर्ड वर्ल्ड समाज में।

सोवियत देशों में इसकी असफलता के पीछे उस समय वहां पर आर्थिक बदहाली होना, मीडिया की उपलब्धता ना होना तथा लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन में रहने के कारण किसी विकल्प का ना होना मुख्य थे बाकी तो कहा जाता है कि पुतिन खुद इस प्रकार की क्रांतियां खड़ी करने या कुचलने की अच्छी जानकारी रखते है।

क्या दक्षिण एशिया में इस प्रकार का प्रयास सफल हो सकता है ? 

इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल तो नकारात्मक होना चाहिए क्योंकि भारत और पाकिस्तान के समाज में जनता से अधिक नेता होते है। दूसरा बहुत बड़ा माध्यम आय वर्ग किसी क्रांति और आंदोलनों में न विश्वास करता है और ना ही उसके पास समय होता है।

पाकिस्तान में भी अभी विरोधी दलों ने पीले रंग के साथ पीडीएम ( Pakistan democratic movement ) शुरू किया ही था कि मौलाना फजलुर्रहमान एवम् अन्य नेताओ के रास्ते अलग अलग हो गए।

भारत में भी भगवा आंदोलन के नाम पर एक बार तो बहुत बड़ी भीड़ जुड़ गई थी तथा कई स्थानों से जय श्री राम के नारे के साथ अराजकता के समाचार भी मिले किन्तु इतने बड़े देश को आर्थिक रूप से सुदृढ़ रखना ज्यादा बड़ी चुनौती थी तथा वहां सरकार सफल नहीं हो सकी जिसके कारण भारत का कलर रेवोल्यूशन भी सफल नहीं कहा जा सकता।

रंगों के साथ यदि सकारात्मक विचार तथा उचित संदेश भी हो तो रंग एक पहचान तो बन सकते है जिसके माध्यम से भीड़ में उपस्थित व्यक्ति खुद को एक दूसरे से जुड़ा हुआ महसूस करते है तथा एक यूनिट के रूप में पहचाने जा सकते है लेकिन यहां सिर्फ रंगो के दम पर कोई आंदोलन खड़ा हो सके इसकी सम्भावना नहीं लगती।